सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधन पूर्वक ज्ञाननिष्ठ कर्म से नीरस एवं ऊसर बना देवे । ऐसा करने से चित्फल निर्मुक्त हो जायेगा फिर तो कर्मवृक्ष अपने आप नष्ट हो जायेगा ॥ १३१-१३२ ॥ शुद्ध्यर्थमात्मनस्तस्मात् सर्वज्ञस्याग्रतः स्थले। भूताधिदेवमन्त्राणां कुर्याद् वै पूजनं क्रमात् ॥ १३३ ॥ साधक अपनी शुद्धि के लिये सर्वज्ञ परमात्मा के आगे वाले स्थल पर भूतों के अधिदेव मन्त्रों का क्रमशः पूजन करे ॥ १३३ ॥ चिन्तानुविद्धं सामान्यं मन्त्रनाथैरधिष्ठितम् । क्ष्माद्यध्वानं च बुद्ध्यन्तं ध्यात्वा षट्पत्रवत् पुरा ॥ १३४ ॥ चिन्तानुविद्ध सामान्य मन्त्र के अर्थ से अधिष्ठित क्ष्मादि से लेकर बुद्ध्यन्त का ध्यान कर पहले कहे गये षट्पत्र की तरह पूजा करे ॥ १३४ ॥ तत्र मध्येऽब्जनाभं तु प्राग्भागे केसरोध्वंगम् । षट्कं च विश्वरूपाद्यं क्ष्माधरान्तं तु विन्यसेत् ॥ १३५ ॥ नीत्वा स्वनाम्न आद्यवर्णं क्ष्मान्तानां बीजतां पुरा । तेन तेषां बलान्तस्थं प्राग्वन्यासं स्मरेत् क्रमात् ॥ १३६ ॥ क्ष्माबीजं च दलाग्रेषु मूलनिष्ठेषु षट्सु च। इष्ट्वा सर्वेन्द्रियाधारमित्यभिन्नं पुरा ततः॥ १३७ ॥ उस कमल के मध्य में अब्जनाभ और पूर्व भाग में केसर के ऊपर विश्वरूप से लेकर क्ष्माधर पर्यन्त (विश्वरूप, वागीश, खगानन, नृसिंह, सरःशायी वाराह) का विन्यास करे । पहले अपने नाम का आदि अक्षर, फिर क्ष्मादि का बीज छः दलाग्रों के मूल में सभी इन्द्रियों के आधार भूत अभिन्न क्ष्मा बीज से न्यास करना चाहिए ॥ १३५-१३७ ॥ चिद्वातस्कन्धवृन्देन खस्थितेनान्तरीकृतम् । उपर्युपरि योगेन बुद्ध्यन्तं समुपस्थितम् ॥ १३८ ॥ भेददृष्ट्या यजेत् सम्यग् भूयः संहारवर्त्मना । सवज्रं स्वेन बीजेन पीतं तुर्याभिलक्षणम् ॥ १३९ ॥ पुनः आकाश स्थित चिद्वातस्कन्ध वृन्द से अन्तरीकृत ऊपर के योग से बुद्ध्यन्त उपस्थित का भेददृष्टि से संहार·क्रम द्वारा वज्र सहित अपने बीज से पीतवर्ण वाले तुर्याभिलक्षण का यजन करे ॥ १३८-१३९ ॥ हेमाब्जभूतं तद्ध्यात्वा क्ष्मातत्त्वं तत्र मध्यतः। वाराहं संयजेन्मन्त्रं साङ्गं सावरणं क्रमात् ॥ १४० ॥