सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशः परिच्छेदः ४४१ तत्कारणाश्रितं कृत्वा परिधानसमन्वितम्। उसके बीज में सुवर्ण कमल के सामन क्षमातत्त्व का ध्यान करे। फिर उनमें तत्कारणाश्रित वाराहदेव को संयुक्त कर साङ्ग सावरण परिधान समन्वित उनका यजन करे ॥ १४०-१४१ ॥ अथ क्षमामण्डलोर्ध्वस्थमर्धेन्दुसदृशं स्थितम् ॥ १४१ ॥ पुरं पद्माङ्कितं स्मृत्वा सितपद्मोदरं महत्। सरश्मयं तदन्तःस्थमभिसन्धाय संयजेत् ॥ १४२ ॥ फिर उस क्षमामण्डल के ऊपरी भाग में अर्धेन्दु के सदृश स्थित पद्म के चिन्ह से संयुक्त महान् श्वेत कमल का स्मरण कर उसके भीतर सरःशायी का ध्यान कर उनका यजन करे ॥ १४१-१४२ ॥ तेजोमयं तदूर्ध्वे तु त्रिकोणं भावयेत् पुरा। रत्नज्वालाकणाकीर्णं स्वस्तिकैरुपलाच्छितम् ॥ १४३ ॥ नृसिंहं पूजयेत् तत्र मध्ये रत्नारविन्दगम्। तस्योपरि सितं वृत्तं पुरं तारागणाङ्कितम् ॥ १४४ ॥ स्मृत्वा नीलाम्बुजाक्रान्तं स्मरेत् तत्र खगासनम्। नीरूपं खं तदूर्ध्वे तु स्मरेच्छब्दैकलक्षणम् ॥ १४५ ॥ उसके ऊपर साधक तेजोमय त्रिकोण की भावना करे जो रत्नज्वाला से व्याप्त है और स्वस्तिक चिह्न से परिलक्षित होता है। वहाँ मध्य में रत्नमय अरविन्द पर स्थित श्रीनृसिंह की पूजा करे। उसके ऊपर सफेद वृत्त वाला पुर, जिसमें अनेक तारागण विद्यमान हैं, वहाँ नीले कमल के समान गरुड़ के आसन का स्मरण करे। उसके ऊपर एक मात्र शब्द लक्षण वाला रूप रहित आकाश का स्मरण करे ॥ १४३-१४५ ॥ ध्यायेत् तदन्तः सूर्याभं प्राग्वर्णं तु सपङ्कजम्। तत्र वागीश्वरं देवमभ्यर्च्य विधिवत् ततः ॥ १४६ ॥ उसके भीतर सूर्य के समान चमकीला नीलवर्ण के पङ्कज के समान वागीश्वर का ध्यान करे। पुनः उनका विधिवत् पूजन करे ॥ १४६ ॥ तत्कर्णिकोदराकाशे नानारत्नरुचिं ततः। संस्मरेत् कमलाकारं चित्तवृत्तिमयं तु यत् ॥ १४७ ॥ यजेत् तन्मध्यगं विश्वरूपं तु मनसस्पतिम्। तदूर्ध्वेऽमृतगर्भं तु शीतांशुकरकोटिवत् ॥ १४८ ॥ पद्मं स्वेनात्मनात्मानं धारयन्तं विभाव्य च। सा० सं० - 32