भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 501

४४२ सात्वतसंहिता समभ्यर्च्यस्तदन्तःस्थोऽप्यब्जनाभो धियांपतिः ॥ १४९ ॥ उसके कर्णिका के भीतर आकाश में अनेक रत्नों से प्रकाशित होने वाले कमल की आकृति के सदृश चित्तवृत्तिमय मन के प्रतिरूप विश्वरूप भगवान् का यजन करे। उनके भी ऊपर अमृतगर्भ करोड़ों चन्द्रमा के समान प्रकाश करने वाले स्वयं अपनी आत्मा में पद्म धारण किये हुए का ध्यान कर उसके भीतर बुद्धि के पति अब्जानाभ का ध्यान कर उनका पूजन करे ॥ १४७-१४९ ॥ एवं गन्धरसरूपस्पर्शशब्दमनोधियाम् । क्रमेणाधीशसङ्घं तु अवतार्य पराद् यजेत् ॥ १५० ॥ इसी प्रकार गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द, मन तथा बुद्धि के भी अधीश समूहों का भी पर आत्मा से नीचे उतार कर उनका पूजन करे ॥ १५० ॥ अर्चयित्वाऽर्चयित्वा न न्यसेत् तत्रैव तं पुनः । ये वर्णा भूतयोनीनां रश्मयः कमलोपमाः ॥ १५१ ॥ संस्थितिं संस्मरेत् तेषामस्मिताशक्तौ तथागतिम् । अनादिवासनारूपां त्वभेदेनात्मनि स्थिताम् ॥ १५२ ॥ बारम्बार उनकी अर्चना करे और वहीं उनका पुनः न्यास करे। भूत योनियों के जो वर्ण हैं, जिनका प्रकाश कमल के समान है, उन वर्णों की अस्मिता शक्ति की तथा गति का स्मरण करे। उससे अभिन्न आत्मा में रहने वाली अनादि वासना रूप की संस्थिति समझे ॥ १५१-१५२ ॥ निःशेषबीजैरभ्युत्थां पद्मनाभविधारणीम् । निर्गतां वैशयात् सर्व्वाद् वियुक्तां स्वामिना कृताम् ॥ १५३ ॥ स्फुरद्रूपां परिभ्रष्टां निराधारां च संस्मरेत् । प्रणवेन समभ्यर्च्य दीक्षाकालेऽभ्युपस्थिते ॥ १५४ ॥ साधिभूताधिदैवं च इष्ट्वैवं भूतसप्तकम् । स्वयमभ्यर्चयेत् पश्चात् शिष्यमञ्जलिना च तम् ॥ १५५ ॥ उस वासना को विषय से निकली हुई वासना के स्वामी के द्वारा अलग की गई संस्फुरण करती हुई परिभ्रष्ट निराधर हुई देखे। तदनन्तर दीक्षाकाल उपस्थित देख प्रणव द्वारा उसका अभ्यर्चन करे। इसी अधिभौतिक तथा अधिदैविक सहित भूत सप्तक की भी पूजा करे। पहले स्वयं इनका अर्चन करे। फिर शिष्य की अञ्जलि से अर्चन करावे ॥ १५३-१५५ ॥ ततोऽग्नेः सन्निधिं गत्वा ध्यात्वा यामन्त्रयोपरि । दक्षिणेनात्मनो दार्भे विष्टरे चक्रमन्दिरे ॥ १५६ ॥