सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 502, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशः परिच्छेदः ४४३ सकुशेन स्वहस्तेन दक्षिणं चरणं गुरोः । अवलम्ब्य समास्ते वै स्पर्शनाद्येकतात्मना ॥ १५७ ॥ बीजेनाङ्घ्रेः शिखान्तं च स्मरेत् तेजोमयं विभुम् । विश्लेषयन्तं सहसा ह्यनाद्युत्थमविग्रहम् ॥ १५८ ॥ संस्कारचक्रं विविधं प्रेरकं दुःखवर्त्मनि । नाड्यैक्यमभिसन्धानमभिसन्धानचेतसा ॥ १५९ ॥ विश्लेषं कर्मणां तद्वद् वर्मणास्त्रेण होमयेत् । क्रमेण सघृतानां च तिलानां द्वादशाहुतीः ॥ १६० ॥ तदनन्तर शिष्य के साथ अग्नि के सन्निधान में जावे । तीन-तीन याग से ऊपर अग्नि देव का ध्यान करे । फिर चक्रमन्दिर में अपने दक्षिण स्थापित दर्भ विष्टर पर, अपने हाथ में कुशा लेकर, गुरु के दक्षिण चरण का अवलम्बन लेकर, उसका स्पर्श करते हुए एकतापन्न (सावधान) होकर बैठे । बीज मन्त्र से पैर से लेकर शिखान्त न्यास करे, तेजोमय उस विभु का स्मरण करे । जो अनादि काल से उत्पन्न शरीर वाले दुख मार्ग में विविध रूप से प्रेरक संसार चक्र को साधक से अलग कर रहे हैं, जिसका एक ही नाड़ी में अभिसंधान है और मन्त्र चित्त में भी अभिसंधान है, ऐसे सभी कर्म चक्र का विश्लेष करते हुए और उन विभु का दर्शन करते हुए देखे । फिर कवच के अस्त्र मन्त्र से घृत मिश्रित तिलों द्वारा क्रमशः बारह आहुती अग्नि में देवे ॥ १५६-१६० ॥ अनुसन्धाय सम्पाद्यो मयाऽयं वै परात्मनि । दद्यादष्टावाहुतीश्च मूलेन सघृताः पुरा ॥ १६१ ॥ तदनन्तर मै यह आहुति परमात्मा में दे रहा हूँ, ऐसा विचार कर मूल मन्त्र से घृत युक्त आठ आहुति प्रदान करे ॥ १६१ ॥ तदुत्तमाङ्गं संस्पृष्ट्वा स्रुवेणाज्यान्वितेन च । हुत्वा ज्ञानपदेनैव भूयः सर्वगुणात्मना ॥ १६२ ॥ प्राक्संख्यमाचरेद् होममन्तरान्तरयोगतः । आ चेश्वरपदात् सम्यङ्नेत्रान्तं होममेव हि ॥ १६३ ॥ इति सम्पातहोमो वै सम्पन्ने सति जायते । कर्तव्यो मन्त्रमाहात्म्यात् संस्कारैर्निखिलैर्युतः ॥ १६४ ॥ फिर गुरु स्रुवा में आज्य आहुति लेकर शिष्य का उत्तमाङ्ग (शिर) का स्मरण कर सर्वगुणात्मक ज्ञानपर से होम करे । बीच-बीच में पूर्व में कही गयी संख्या (८) के अनुसार होम करता जावे । ईश्वर पद से लेकर नेत्र मन्त्र पर्यन्त इस प्रकार