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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

अष्टादशः परिच्छेदः ४४३ सकुशेन स्वहस्तेन दक्षिणं चरणं गुरोः । अवलम्ब्य समास्ते वै स्पर्शनाद्येकतात्मना ॥ १५७ ॥ बीजेनाङ्घ्रेः शिखान्तं च स्मरेत् तेजोमयं विभुम् । विश्लेषयन्तं सहसा ह्यनाद्युत्थमविग्रहम् ॥ १५८ ॥ संस्कारचक्रं विविधं प्रेरकं दुःखवर्त्मनि । नाड्यैक्यमभिसन्धानमभिसन्धानचेतसा ॥ १५९ ॥ विश्लेषं कर्मणां तद्वद् वर्मणास्त्रेण होमयेत् । क्रमेण सघृतानां च तिलानां द्वादशाहुतीः ॥ १६० ॥ तदनन्तर शिष्य के साथ अग्नि के सन्निधान में जावे । तीन-तीन याग से ऊपर अग्नि देव का ध्यान करे । फिर चक्रमन्दिर में अपने दक्षिण स्थापित दर्भ विष्टर पर, अपने हाथ में कुशा लेकर, गुरु के दक्षिण चरण का अवलम्बन लेकर, उसका स्पर्श करते हुए एकतापन्न (सावधान) होकर बैठे । बीज मन्त्र से पैर से लेकर शिखान्त न्यास करे, तेजोमय उस विभु का स्मरण करे । जो अनादि काल से उत्पन्न शरीर वाले दुख मार्ग में विविध रूप से प्रेरक संसार चक्र को साधक से अलग कर रहे हैं, जिसका एक ही नाड़ी में अभिसंधान है और मन्त्र चित्त में भी अभिसंधान है, ऐसे सभी कर्म चक्र का विश्लेष करते हुए और उन विभु का दर्शन करते हुए देखे । फिर कवच के अस्त्र मन्त्र से घृत मिश्रित तिलों द्वारा क्रमशः बारह आहुती अग्नि में देवे ॥ १५६-१६० ॥ अनुसन्धाय सम्पाद्यो मयाऽयं वै परात्मनि । दद्यादष्टावाहुतीश्च मूलेन सघृताः पुरा ॥ १६१ ॥ तदनन्तर मै यह आहुति परमात्मा में दे रहा हूँ, ऐसा विचार कर मूल मन्त्र से घृत युक्त आठ आहुति प्रदान करे ॥ १६१ ॥ तदुत्तमाङ्गं संस्पृष्ट्वा स्रुवेणाज्यान्वितेन च । हुत्वा ज्ञानपदेनैव भूयः सर्वगुणात्मना ॥ १६२ ॥ प्राक्संख्यमाचरेद् होममन्तरान्तरयोगतः । आ चेश्वरपदात् सम्यङ्नेत्रान्तं होममेव हि ॥ १६३ ॥ इति सम्पातहोमो वै सम्पन्ने सति जायते । कर्तव्यो मन्त्रमाहात्म्यात् संस्कारैर्निखिलैर्युतः ॥ १६४ ॥ फिर गुरु स्रुवा में आज्य आहुति लेकर शिष्य का उत्तमाङ्ग (शिर) का स्मरण कर सर्वगुणात्मक ज्ञानपर से होम करे । बीच-बीच में पूर्व में कही गयी संख्या (८) के अनुसार होम करता जावे । ईश्वर पद से लेकर नेत्र मन्त्र पर्यन्त इस प्रकार

४४४ सात्वतसंहिता होम द्वारा सम्पात होम सम्पन्न होता है। यह सम्पात-होम मन्त्र माहात्म्य से अखिल संस्कार युक्त होकर करे ॥ १६२-१६४ ॥ साम्प्रतं चाणिमादीनां गुणानामुत्तरत्र तु। विभोराराधनात् सम्यग् योगाभ्यासाच्च भाजनम् ॥ १६५ ॥ कृते सम्पातभवने आज्येनाथ सकृत् सकृत् । मन्त्राणां तर्पणं कृत्वा सार्चनं श्रावयेद् विभुम् ॥ १६६ ॥ अस्य कर्मात्मतत्त्वस्य कर्मपिण्डं सवासनम् । यदनेकप्रकारं तु त्वच्छक्त्या स्तम्भितं मया ॥ १६७ ॥ प्रायश्चित्तनिमित्तं तु जुहुयात् तदनन्तरम् । बीजेनान्तर्निरुद्धेन स्वाङ्गेनाकृतिकाष्ठकम् ॥ १६८ ॥ तत्काल अणिमादिकों के, उसके बाद गुणों के, उसके बाद विभु के योगाभ्यास से शिष्य मन्त्र के योग्य पात्र बनता है। घृत द्वारा सकृत् सकृत् सम्पात होम कर लेने पर तर्पण करे। फिर अर्चन कर विभु परमात्मा को सुनावे। हे प्रभो! इस शिष्य के अनेक प्रकार के कर्म तत्त्वों के जो वासना सहित कर्म पिण्ड थे, उसको मैंने आपकी शक्ति से रोक दिया है। इसके बाद प्रायश्चित्त के लिये स्वाङ्ग अन्तर्निरुद्ध बीज से काष्ठ का होम करे ॥ १६५-१६८ ॥ एतावता महाबुद्धेर्जन्तर्जन्माश्रितस्य च। याति व्यामिश्ररूपस्य हेयरूपस्य संक्षयः ॥ १६९ ॥ हे महाबुद्ध! केवल इतने मात्र से जीव के जन्म-जन्म से आश्रित उसमें मिला हुआ समस्त हेयरूप दोष नष्ट हो जाता है ॥ १६९ ॥ मोक्षैकफलदो धर्म उपादेयस्त्वनन्तरम् । योऽसौ साम्मुख्यमायाति विविधस्तस्य वाच्युतः ॥ १७० ॥ येनान्तर्लीनमभ्येति ह्यज्ञानं सहसा क्षयम् । अथादायारुणं सूत्रं कृत्वा नैकगुणं पुरा ॥ १७१ ॥ निरीक्षितं दृशा चास्त्रवारिणा परिशोधितम् । तदङ्गुष्ठावधिं यावत् शिखान्तात् सम्प्रधार्य च ॥ १७२ ॥ संस्मरेत् सर्वदुःखानां सम्बन्धानां तदास्पदम् । संविश्य देवयानेन शिशुचैतन्यसन्निधिम् ॥ १७३ ॥ हुंफडन्तं च शिरसि नाम च प्रणवादिकम् । हन्मन्त्रसम्पुटस्थं च कृत्वा वै पितृवर्त्मना ॥ १७४ ॥

अष्टादशः परिच्छेदः ४४५ उसके बाद मोक्ष रूप एक फल देने वाला धर्म ग्रहण करे । जिससे विविध रूप वाले अच्युत का साक्षात् दर्शन होता है और जिससे भीतर छिपा हुआ समस्त अज्ञान विनष्ट हो जाता है । इसके अनन्तर लाल वर्ण का सूत्र लेकर उसको अनेक गुणित करे और नेत्र मन्त्र से उसका निरीक्षण करे, अस्त्रमन्त्र से अभिमन्त्रित जल से उसका परिशोधन करे । फिर उस परिगुणित सूत्र से अंगूठे से लेकर शिखा के अन्त तक पहनावे । उसी को सभी दुःखों तथा सभी प्रकार के सम्बन्धों का आस्पद समझे । फिर देवयान से शिशु के चेतना के सम्बन्ध तक पहुँचे । फिर पितृवर्त्म से ‘हुँ फट्’ इस मन्त्र से शिर में न्यास करे तथा प्रणवादि नाम को पितृवर्त्म से एवं हन्मन्त्र से सम्पुटित करे ॥ १७०-१७४ ॥ आनीय सह सूत्रेण नयेन्नेत्रेण साम्यताम् । अभ्यर्च्यर्घ्यादिनावेष्ट्य कवचेन महात्मना ॥ १७५ ॥ फिर सूत्र लाकर नेत्र के बराबर उसे नापे उसका अर्चन कर अर्घ्यादि से तथा कवच से आवेष्टित करे ॥ १७५ ॥ ॐ हं अदन्यै हं स्वाहेत्यनेनाकृतिसप्तकम् । हुत्वास्त्रमन्त्रजप्तेन सितेन रजसा ततः ॥ १७६ ॥ सन्ताड्य शैशवं कायं विशेत् तदवधिं तथा । विश्लेषयाऽमुकं ब्रूयात् पदं वीर्यपदानुगम् ॥ १७७ ॥ फिर ‘ॐ हं अदन्यै हं स्वाहा’ इस मन्त्र से सातों आकृतियों का हवन करे, तदनन्तर अस्त्र मन्त्र के जप से अभिमन्त्रित सफेद रज से शिशु के शरीर का सन्ताडन करे और उसकी अवधि तक प्रवेश करे । फिर ‘वीर्य’ पद कहकर ‘अमुकं विश्लेषय’ ऐसा कहे ॥ १७६-१७७ ॥ तं ज्ञानवाचकेनाथ त्वाद्यन्तेन विकृष्य च । स्वबुद्ध्याऽनुगतं कृत्वा ध्यात्वा नक्षत्रगोलवत् ॥ १७८ ॥ फिर उसे ज्ञानवाचक शब्द से आदि तथा अन्त में विकर्षण कर अपने बुद्धि के अनुगत कर नक्षत्रगोलक के समान ध्यान करे ॥ १७८ ॥ सन्धायाभ्यन्तरे सूत्रे हंसार्णेन सबिन्दुना । नतिप्रणवगर्भेण रूढशक्तिं च विग्रहे ॥ १७९ ॥ वासनामयमित्येवमातिवाहिकसंज्ञकम् । सूत्रात्मकं वपुः कृत्वा आत्मशक्त्या विभावितम् ॥ १८० ॥ फिर बिन्दु सहित हंस मन्त्र (हं) से भीतर के सूत्र में उसे स्थापित करे । विग्रह में ‘नमः’ और ‘प्रणव’ के बीच उसे रूढ़ शक्ति बनावे । यही अतिवाहिक

४४६ सात्वतसंहिता संज्ञक, वासनामय, इस प्रकार आत्मशक्ति से विभाजित, सूत्रात्मक शरीर का निर्माण करे ॥ १७९-१८० ॥ बलमन्त्रेण संरुद्धं तदर्थं जुहुयात् ततः । उक्त्वा ओमात्मने स्वाहा द्विषट्कपरिसंख्यया ॥ १८१ ॥ बल मन्त्र से उसे संरुद्ध करे और उसके लिये होम करे । 'ओमात्मने स्वाहा' कहकर बारह बार होम करना चाहिये ॥ १८१ ॥ आदाय भाविनो बन्धान् व्यापकान् शुद्धभोगदान् । ज्ञानादयः समाश्रित्य येऽत्र तिष्ठन्ति सर्वदा ॥ १८२ ॥ स्वस्थानेषु स्वमन्त्रैभ्यस्तांस्तत्रैव च योजयेत् । यथाक्रमेणार्चितानां कृत्वा तेषां च तर्पणम् ॥ १८३ ॥ फिर शुद्ध भोग देने वाले व्यापक एवं भावी बन्धों को लेकर ज्ञानादि का आश्रय लेकर जो यहाँ सर्वदा रहते हैं, उन्हें स्व स्व मन्त्रों से स्व स्व स्थानों पर सन्निविष्ट करे । फिर यथाक्रम अर्चित देवताओं का तर्पण करे ॥ १८२-१८३ ॥ अथ संस्कारचक्रस्य तत्त्ववृन्दाश्रितस्य च । सर्वगस्यापि वै विद्धि स्थितिं नियतलक्षणाम् ॥ १८४ ॥ तदनन्तर तत्त्ववृन्द के आश्रित रहने वाले, सर्वत्र गमन करने वाले तथा संसार चक्र की नियत लक्षण वाली स्थिति का ज्ञान करे ॥ १८४ ॥ तत्त्वव्याप्तिच्छलेनैव शरीरे पाञ्चभौतिके । गुल्फजानुकटीवक्षःकर्णभ्रूकटावधि ॥ १८५ ॥ बुद्धयन्तानां धरादीनां क्रमादवनिसप्तकम् । अहङ्कारस्तदुत्थास्तु ये भेदा विविधा अपि ॥ १८६ ॥ चित्तजा अपि ये चान्ये तिष्ठन्ति मनसा सह । सकालोत्थास्तथा बौद्धास्तत्पूर्वास्त्वपरे च ये ॥ १८७ ॥ अनेकभेदभिन्नास्तु श्रिता आश्रित्य ते धियम् । द्विसप्तभुवनं विश्वमनेकरचनान्वितम् ॥ १८८ ॥ इस पाञ्चभौतिक शरीर में तत्त्व-व्याप्ति के बहाने गुल्फ, जानु, कटी, वक्ष, कान तथा भ्रुकुटि तक पृथ्वी से लेकर बुद्धयन्त क्रमशः अवनि सप्तक व्याप्त है इसी में अहङ्कार से उत्पन्न विविध भेद है, चित्त से लेकर मन तक उत्पन्न भी इसी के अन्तर्गत हैं, काल से उत्पन्न बुद्धि के आश्रित है । किं बहुना अनेक रचनाओं से युक्त यह सारा विश्व चौदह भुवनों सहित यह सारा विश्व पृथ्व्यादिक के अन्तर्गत है ॥ १८५-१८८ ॥

अष्टादशः परिच्छेदः ४४७ शतकोटिप्रविस्तीर्णमष्टयोन्यार्धसेवितम् । स्थिरं धराश्रितं भूयो बोद्धव्यं सर्वदैव हि ॥ १८९ ॥ इतना ही नहीं सौ करोड़ विस्तार वाली चौरासी योनियों से सेवित यह स्थिर जगत धरा के ही आश्रित है, ऐसा समझना चाहिये ॥ १८९ ॥ चतुष्कं जाग्रदाद्यं यत् पदानामप्सु वर्तते । मन्त्रकोटिसहस्त्राणां विविधानां महामते ॥ १९० ॥ जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति आदि चतुष्क जल तत्त्व में ही विद्यमान है । हे महामते! योग सिद्धि समेत अनेक प्रकार के करोड़ों सहस्र मन्त्रों की स्थिति तैजसतत्त्व में ही विद्यमान है ॥ १९० ॥ योगसिद्धिसमेतानां संस्थितिस्तैजसे पदे । चातुरात्मीयतत्त्वानां ज्ञेयः कैवल्यदेहिनाम् ॥ १९१ ॥ शान्तोदितस्वरूपाणां सन्निवेशो मरुत्पदे । अनेकशक्तिभूतानां ज्ञानादीनां च लाङ्गलिन् ॥ १९२ ॥ कालानामाश्रयो व्योम या सा मूर्तिर्न लक्ष्यते । संस्थिताश्चादयो वर्णाः पदे षष्ठे तु मानसे ॥ १९३ ॥ कैवल्य देह वाले चतुरात्मीय तत्त्वों की तथा शान्त उदित स्वरूपों की मरुत्पद (वायु) में समझना चाहिये । हे लाङ्गलिन् ! अनेक शक्तियों वाले ज्ञान का तथा काल का आश्रय व्योम है जिसकी मूर्ति दिखाई नहीं पड़ती । अकारादि वर्ण इन पाँचभूतों से अतिरिक्त छठें मानसतत्त्व में स्थित हैं ॥ १९१-१९३ ॥ अस्मिन् मात्रानुरक्तानि कीर्तितेऽस्मिन् षडध्वनि । क्षिपंस्तु चाहरांस्त्वेवं शुद्ध्यर्थं लीलयैव हि ॥ १९४ ॥ स स्थितः कर्मतत्त्वानि बुद्धिशक्तिपदे प्रभुः । निरस्तदोषं कृत्वा प्राक् समाविश्य तदैव हि ॥ १९५ ॥ इसी कहे गये षडध्व में मात्रादिकों का निवास है । भगवान् प्रभु इसी बहुतत्त्व पद में कर्मतत्त्व की शुद्धि के लिये लीलापूर्वक कभी ऊपर फेंक देते हैं, कभी ग्रहण करते हैं और इसे दोषरहित बनाकर फिर इसी में समाविष्ट हो जाते हैं ॥ १९४-१९५ ॥ स्वां शक्तिमुपसंहृत्य शान्तिमभ्येति शाश्वतीम् । मधुसूदनपर्यन्तं पातालशयनादथ ॥ १९६ ॥ सप्तकं सप्तकं षट्कं सम्पश्येत् क्ष्मादिपञ्चके ।

४४८ सात्वतसंहिता मनस्यवस्थितं ह्येवं शक्तीशात् त्रितयं हि यत् ॥ १९७ ॥ बुद्धौ कमलनाभात्मा देवः सर्वेश्वरः प्रभुः । पुनः स्वसिद्धिर्युक्तानां सर्वेषां पार्थिवे पदे ॥ १९८ ॥ द्विसप्तभेदभिन्ने तु बोद्धव्या संस्थितिः शुभा । तीव्रमन्दादिकं बुद्ध्वा भावं भक्तिसमन्वितम् ॥ १९९ ॥ आलम्बनवशात् कुर्यात् सर्वेषां स्वपदे स्थितिम् । एष वैभवदीक्षायामधिवासनकर्मणि ॥ २०० ॥ साधक इसी में अपनी शक्ति का उपसंहार कर शाश्वती शान्ति प्राप्त करता है । पातालशयन से लेकर पद्मनाभ पर्यन्त ३८ विभव देवता है । वैष्णव साधक पातालशयनादि सात देवताओं को क्ष्मा तत्त्व में, नारायणादि सप्तक को जल तत्त्व में, लोकनाथादि सप्तक को तेजस्तत्त्व में, नारसिंहादि सप्तक को वायुतत्त्व में, क्रोडात्मादि षट्कों को आकाश तत्त्व में, शक्त्यात्मादि त्रिक को मनस्तत्त्व में तथा पद्मनाभ को बुद्धितत्त्व में देखना चाहिए । फिर स्वसिद्धि से युक्त सभी को पार्थिव तत्त्व में देखना चाहिए । इन सभी को चौदह भेद वालों से ही शुभ संस्थिति जाननी चाहिये । साधक भक्ति भाव से समन्वित हो तीव्र मन्दादि का ज्ञानकर आलम्बन वश सबकी अपने पद में स्थिति करे वैभवदीक्षा के अधिवासन कर्म में यह स्थिति कही गई ॥ १९६-२०० ॥ क्रम उक्तस्त्वथेदानीमपरायां निबोधतु । आ पादान्नाभिदेशान्तं महाभूतैर्धरादिकैः ॥ २०१ ॥ व्याप्तं चतुर्था वाय्वन्तैस्तदूर्ध्वं नभसा पुनः । पूरितं हृदयान्तं च तदुद्देशाच्छिखावधि ॥ २०२ ॥ यहाँ तक विभव देवताओं का क्रम कहा गया है । अब अन्यों के विषय में सुनिये । पैर से लेकर नाभि देश तक पृथ्व्यादि से लेकर वायु पर्यन्त चार भूतों से व्याप्त है । इसके बाद शिखा से लेकर हृदय पर्यन्त देश आकाश से व्याप्त है ॥ २०१-२०२ ॥ विभाव्य मनसा व्याप्तमनेनैव क्रमेण तु । स्थिताः सङ्कर्षणान्ताश्चाप्यनिरुद्धादयस्तु वै ॥ २०३ ॥ समाक्रम्याध्वषट्कं तु अध्वातीतस्तु बुद्धिगः । समादायात्मतत्त्वं च प्राग्वदभ्येत्य मूर्तताम् ॥ २०४ ॥ व्यापिका मूर्तयस्त्वेताः पृथग् भक्तिपरायणैः । तदाकारैरसंख्यैस्तु संवृताः क्ष्मावनीषु च ॥ २०५ ॥

अष्टादशः परिच्छेदः ४४९ प्राक्संख्यासु च तिष्ठन्ति सर्वाः सर्वासु सर्वदा । स्मृत्वा ह्यभेदभावेन षट्कर्मोदकवत् पुरा ॥ २०६ ॥ शिखान्तं क्ष्मादिना तेन सर्वं व्याप्तं विचिन्तयेत् । चतुरात्मानमव्यक्तं शब्दमूर्तिं निराकृतिम् ॥ २०७ ॥ गुणमात्रैर्विभिन्नं च खवत् तत्रैव भावयेत् । अग्राह्येणाथ वपुषा स्वस्वभावमयेन च ॥ २०८ ॥ इसी क्रम से सर्वत्र मन से व्याप्त होने का ध्यान करे । इसी प्रकार अनिरुद्धादि से लेकर सङ्कर्षण पर्यन्त षडध्व का संक्रमित कर स्थित है, जो अध्व से परे है, वह बुद्धिगामी है । आत्मतत्त्व से लेकर प्राग्वत् मूर्त्तता पर्यन्त ये सभी मूर्तियाँ व्यापिका हैं । जो भक्ति परायणों से पृथक् असंख्य उसी आकार में सर्वत्र पृथ्वी में व्याप्त हैं । जो पहली बार कही गई संख्या में सभी सबमें सर्वदा रहती हैं । षट् कर्मोदक भाव से शिखान्त अभेदभाव द्वारा इनका स्मरण कर उन क्ष्मादि से व्याप्त उनका स्मरण करे । फिर उसी में गुण मात्र से विभिन्न निराकृति किन्तु शब्दमूर्त्ति अव्यक्त चतुरात्मा का आकाश के समान ध्यान करे ॥ २०३-२०८ ॥ संक्रान्तेन तु वै बुद्धौ सर्वदैवोदितेन तु । स्वशक्त्या वै ह्यनिच्छातो जीवमादाय सोर्ध्वगम् ॥ २०९ ॥ स्वसामर्थ्यं स्वशक्त्या तत् शान्तात्मास्ते विलाप्य च । शुद्धाशयानां भक्तानां तत्पादैकाभिलाषिणाम् ॥ २१० ॥ तत्सामर्थ्यानुविद्धानां सर्वत्र व्यक्तिमेति च । अतस्तु यद्यत् संवेद्यं हेयं परिमितं त्वपि ॥ २११ ॥ तत्तत् तदात्मनाभ्येति सर्वदा भावितात्मनाम् । इत्यादौ सर्वसामान्यो नित्यो विद्याख्य आश्रयः ॥ २१२ ॥ बोद्धव्यः सोऽपि तदनु ह्यसामान्यतया गतः । आ मोक्षादङ्गभावं च जीवानां स्वयमेव हि ॥ २१३ ॥ वज्रवत् सूक्ष्मरूपेण सम्पूर्णेन महामते । दीक्षाकाले तु शिष्याणां परिज्ञेयं यथोदितम् ॥ २१४ ॥ इसके बाद स्व स्व भावमय अग्राह्य शरीर सर्व दैवोदित बुद्धि में संक्रान्त अपनी शक्ति के अनुसार ऊपर की ओर जाने वाले जीव को लेकर अपनी सामर्थ्य एवं अपनी शक्ति के अनुसार शान्तात्मा में विलीन करे । ऐसा करने से भगवान् के चरण कमलों की अभिलाषा रखने वाले शुद्धाशय भगवत्सामर्थ्य से अनुविद्ध भक्तों के लिये वह सर्वत्र प्रगट हो जाता है । इस कारण जो-जो संवेद्य है, हेय है,

४५० सात्वतसंहिता परिमित है, वह सभी भावितात्मा के लिये स्वयं आ जाता है । इस विद्या नामक आश्रय को जानना चाहिये । हे महामते! इस प्रकार वज्र के समान सम्पूर्ण, सूक्ष्मरूप से जीवों को स्वयं मोक्ष से अङ्गभाव प्राप्त है । जब शिष्य को दीक्षा देनी हो, तब इन सब बातों पर विचार करना चाहिये ॥ २०८-२१४ ॥ एवमेव विजानीयाद् भूयः सौत्रे तु विग्रहे । सप्तधा तु विभज्यादौ सन्धि वै कुङ्कुमादिना ॥ २१५ ॥ चित्रीकृत्य चतुर्देशात् प्रणवाद्यन्तगैस्ततः । स्वनामपदसंयुक्तो ग्रथनीयः स्वकारणैः ॥ २१६ ॥ इस प्रकार शिष्य के सौत्र विग्रह काम में भी विचार करना चाहिये । सूत्र को सात भागों में प्रविभक्त कर उसकी सन्धि को कुङ्कुमादि से चित्रित कर उसके चारों ओर आगे तथा अन्त में प्रणव लिखकर, अपने नाम से संयुक्त कर, उसके कारणों से ग्रथन करे ॥ २१५-२१६ ॥ एवं प्ताप्तिमयैर्भोगैर्हृदा पूर्णान्तिमे कृते । नीत्वा वै मण्डलस्थस्य विभोस्तं सन्निवेदयेत् ॥ २१७ ॥ इस प्रकार प्राप्तमय भोगों से हृदय पर्यन्त ग्रथनों को पूर्ण कर उसे अपने हाथ में लेकर मण्डल पर स्थित भगवान् को निवेदित करे ॥ २१७ ॥ वर्मणाच्छादितं कृत्वा निधाय कलशाग्रतः । सशिष्योऽथार्चनं कुर्यात् पुनर्विश्वात्मनो विभोः ॥ २१८ ॥ प्रदक्षिणैः प्रणामैस्तु नानास्तुतिपदैः सह । तत्रोपलिप्ते भूभागे मण्डलान्तर्गतं बहिः ॥ २१९ ॥ स्थानभेदस्थितं कृत्वा नेत्रहृन्मन्त्रमन्त्रिते । पञ्चगव्ये चरौ दन्तधावने विनियोज्य तम् ॥ २२० ॥ फिर उसे वर्म मन्त्र द्वारा आच्छादित कर, कलश के आगे रख कर, शिष्य के सहित उसका अर्चन करे । तदनन्तर विश्वात्मा विभु की प्रदक्षिण, प्रणाम एवं नाना स्तुति पदों के साथ अर्चन करे । फिर उसी उपलिप्त भू-भाग में मण्डल के भीतर किसी बाहरी स्थान में नेत्र एवं हृदय मन्त्र से अभिमन्त्रित पञ्चगव्य, चरु एवं दन्तधावन में स्थान भेद कर स्थापित करे ॥ २१८-२२० ॥ भुक्तोज्झिते दन्तकाष्ठे कुर्यात् सिद्धिविचारणम् । सौम्यवारुण ईशाने यदि पूर्वदिगाननम् ॥ २२१ ॥ तत्सिद्धिसूचकं विद्धि विपरीतमतोऽन्यथा । तद्ध्वंसनाय जुहुयाद् वीर्यमन्त्रेण वै शतम् ॥ २२२ ॥

अष्टादशः परिच्छेदः ४५१ दन्तधावन करने के पश्चात् जब उसे किसी दिशा में फेंके, तब उससे अपनी सिद्धि का विचार करे । यदि उस दन्तधावन का मुख उत्तर-पश्चिम तथा दक्षिण में हो तो उसे सिद्धि-सूचक समझना चाहिये । यदि उससे विपरीत हो तो अन्यथा फल होता है । उस अन्यथा फल को विनष्ट करने के लिये सौ की संख्या में वीर्यमन्त्र से आहुति प्रदान करे ॥ २२१-२२२ ॥ धूपानुलेपनादीनि रजांसि घटिकादयः । साज्यानि च तिलादीनि योग्यान्यन्यानि लाङ्गलिन् ॥ २२३ ॥ उद्धृत्योत्तरतः कृत्वा वर्मजप्तेन वाससा । अभुक्तेनाहतेनैव त्वाच्छाद्य सुसितेन च ॥ २२४ ॥ समभ्यर्च्यस्त्रमन्त्रेण पुष्पधूपानुलेपनः । क्षान्त्वा स्थलस्थितं देवमग्नौ व कलशे न्यसेत् ॥ २२५ ॥ फिर धूप, अनुलेपनादि चूर्ण घटिकादि (छोटे-छोटे घड़े) घृतयुक्त तिलादि और भी जो उचित हो । हे लाङ्गलिन् सङ्कर्षण ! उसे निकाल कर उत्तर की ओर स्थापित कर कवच मन्त्र से अमुक्त एवं अनाहत, जो पहना हुआ न हो और जो कहीं से कटा-फटा न हो । ऐसे श्वेत वस्त्र से पुष्प, धूप, अनुलेपन द्वारा अर्चना कर क्षमा माँगे । फिर उन सब वस्तुओं को देवता के आगे अग्नि में, अथवा कलश पर स्थापित करे ॥ २२३-२२५ ॥ अथ शुद्धे च भूभागे हृन्मन्त्रितकुशास्तरे । कृत्वा प्राङ्‌मस्तकं शिष्यं बलजप्ताङ्कुशेन तु ॥ २२६ ॥ हृदाऽवगुण्ठिततनुं मुख्यमन्त्रमनुस्मरन् । स्वापयेत् स्वप्नलाभाय ततो हृन्मन्त्रितैस्तिलैः ॥ २२७ ॥ सिद्धार्थकयुतैस्तस्य निदध्यात् परितो बहिः । सबर्हिः(र्हि)पक्ष्मन्त्रेण प्राग्वद् दिक्ष्वष्टकं न्यसेत् ॥ २२८ ॥ इसके बाद उपलेपनादि से संशुद्ध भू-भाग पर जहाँ हृन्मन्त्र से अभिमन्त्रित कर कुशा का शयन लगाया गया है, बल मन्त्र से जपे गये अङ्कुश के द्वारा उस शिष्य को पूर्वाभिमुख करे । वहाँ मुख मन्त्र का स्मरण करते हुए, उसके शरीर को हृन्मन्त्र से चारों ओर से घेर देवे तथा उसके स्वप्न के लिये चारों ओर बाहर हृदय मन्त्र से अभिमन्त्रित सिद्धार्थक युक्त तिल रख देवे । फिर उसके आठो दिशाओं में मन्त्र से अभिमन्त्रित मोर का पङ्ख रख देवे ॥ २२६-२२८ ॥ प्रदक्षिणेन तच्चापि सितसूत्रेण वर्मणा । चतुर्धा वेष्टयित्वा तु मण्डपान्निष्क्रमेद् बहिः ॥ २२९ ॥

४५२ सात्वतसंहिता फिर श्वेत वर्ण के सूत्र से वर्म मन्त्र के द्वारा चार बार वेष्टित कर स्वयं मण्डप से बाहर निकल आवे ॥ २२९ ॥ दन्तकाष्ठादिकं कर्म विनिष्पाद्य स्वयं स्वपेत् । भूतले दर्भशय्यायां कृत्वा दक्षिणतः शिरः ॥ २३० ॥ संस्पृशन् स्वाङ्घ्रियुग्मेन शिशुं शयनसंस्थितम् । भगवन्तं हि मनसा प्रार्थयन्नपवर्गदम् ॥ २३१ ॥ तदनन्तर स्वयं दन्तकाष्ठ आदि कर्म सम्पादन कर पृथ्वी पर कुशा की शय्या पर दक्षिण दिशा में शिर कर शयन पर सोये हुए उस (शिष्य रूप) शिशु को अपने चरण से स्पर्श करते हुए स्वयं भी शयन करे और मोक्ष देने वाले भगवान् से अपने मन से यह प्रार्थना करे ॥ २३०-२३१ ॥ ओमादिशं जगन्नाथ सर्वज्ञ हृदयेशय । तत्राहं योजयाम्येनं कर्मिणं त्वत्परायणम् ॥ २३२ ॥ हे जगन्नाथ! हे सर्वज्ञ! हे दशो दिशाओं में तथा सभी के हृदय में रहने वाले प्रभो ! मैं आपके में परायण इस कर्मकारी शिष्य को आपके कार्य में लगा रहा हूँ। आज्ञा कीजिये ॥ २३२ ॥ प्राप्तानुज्ञस्तु शिष्याणां कुर्याद् वै तत्र योजनम् । यत्र तत्र च तत् तेषामवश्यं शाश्वतं भवेत् ॥ २३३ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायामधिवासदीक्षाविधिर्नाम अष्टादशः परिच्छेदः ॥ १८ ॥ — 𑁍 — इस प्रकार आज्ञा लेकर शिष्यों को भगवत् कार्यों में योजित करे । जहाँ-जहाँ इस प्रकार शिष्यों का संयोजन किया जाता है, वहाँ-वहाँ अवश्य ही शिष्यों का शाश्वत कल्याण होता है ॥ २३३ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के अधिवासदीक्षाविधि नामक अठारहवें परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ १८ ॥ — 𑁍 —

एकोनविंशः परिच्छेदः दीक्षाविधिः नारद उवाच अधिवासाभिधानेयं पूर्वदीक्षाऽच्युतेन वै। कथिता सीरिणे विप्रास्तेनाऽतश्चोदितः पुनः ॥ १ ॥ अथैकोनविंशः परिच्छेदो व्याख्यास्यते। एवमधिवासदीक्षां श्रुत्वा पुनः सङ्कर्षणः पृच्छतीत्याह—अधिवासेति ॥ १ ॥ नारद जी ने कहा—हे ब्राह्मणो ! इस प्रकार दीक्षा के पूर्व की क्रिया भगवान् ने बलभद्र से कही। तदनन्तर श्री बलभद्र ने भगवान् से कहा ॥ १ ॥ सङ्कर्षण उवाच देव दीक्षाविधानं च त्वद्वक्त्रकमलादहम्। श्रोतुमिच्छामि संक्षेपाद् वैष्णवानां हिताय च ॥ २ ॥ प्रश्नप्रकारमाह—देवेति ॥ २ ॥ सङ्कर्षण ने कहा—हे देव ! अब मैं आप के मुखकमल से वैष्णवों के हित के लिये संक्षेप में दीक्षा विधान सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥ श्रीभगवानुवाच एकानेकस्वरूपां वै दीक्षां संसारिणां शृणु। आसाद्य यां समायान्ति देहान्तेऽभिमतं पदम् ॥ ३ ॥ एवं पृष्टः श्रीभगवान् परव्यूहविभवभेदभिन्नदीक्षात्रयस्य फलभेदानुक्त्वा तत्र दीक्षात्रयेऽप्याचारवतां शिष्याणामधिकारं वृद्धबालाङ्गनानां तु दुश्शकाचारविरहेऽप्य- धिकारं च दर्शयित्वा तेषां तत्तत्फलाभिसन्ध्यनसारेण दीक्षात्रयेऽन्यतमा कर्तव्येत्याह— एकानेकेत्यदिभिः। अत्राशक्तविषये लघुतरानुष्ठानमप्युक्तं जयाख्यलक्ष्मीतन्त्रयोः— महामण्डलयागेन हवनाद्वाऽथ केवलात्। वाचा केवलया वापि दीक्षैषा त्रिविधा पुनः॥

४५४ सात्वतसंहिता वित्ताढ्यस्याल्पवित्तस्य द्रव्यहीनस्य च क्रमात्। (ल० ४१।९-१०) इति ॥ ३-७ ॥ श्री भगवान् ने कहा—हे सङ्कर्षण ! संसारी मनुष्यों के लिये एक अथवा अनेक रूपों में दीक्षा का विधान है। जिसे प्राप्त कर लोग शरीर के अन्त होने पर वाञ्छित फल प्राप्त करते हैं ॥ ३ ॥ कैवल्यफलदाऽप्येका भोगकैवल्यदा परा। भोगदैव तृतीया च प्रबुद्धानां सदैव हि ॥ ४ ॥ एक दीक्षा वह है जो केवल प्रबुद्धों को कैवल्य (मुक्ति) फल प्रदान करती है और अन्य दीक्षा भोग एवं कैवल्य दोनों प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त तृतीया दीक्षा वह है जो केवल भोग मात्र प्रदान करती है ॥ ४ ॥ आचार्यानुमताः सर्वाः कार्याः सम्यक् फलाप्तये । भक्तिभावानुविद्धानां शिष्याणां भावितात्मनाम् ॥ ५ ॥ वृद्धानामङ्गनानां च बालानां भावितात्मनाम्। विनाचारसमूहेन दुश्शकेन च ता हिताः ॥ ६ ॥ सभी दीक्षायें सम्यक् फल की प्राप्ति के लिये आचार्य की आज्ञा लेकर लेनी चाहिये । ये सभी दीक्षायें भक्तिभाव से अनुविद्ध अपना कल्याण चाहने वाले शिष्यों, वृद्धों, स्त्रियों, बालकों तथा आचार समूह के पालन में अशक्त किन्तु कल्याणેચ્છु जनों के लिये हितकारी है ॥ ५-६ ॥ पुरा धिया विचार्यैवमुपसन्नेन वै सह। तदीयमाशयं ज्ञात्वा सम्पाद्यैका महामते ॥ ७ ॥ हे महामते! आचार्य अपने सन्निकट आये हुए शिष्य को देखकर विचार करे फिर उसका आशय जानकर उसे दीक्षा प्रदान करे ॥ ७ ॥ शिष्यस्वप्नपरीक्षा अथाऽतीतेऽर्धरात्रे तु उत्थाय शयनाद् गुरुः । कमण्डलुं समादाय बहिराचम्य संविशेत् ॥ ८ ॥ अथातीतेऽर्धरात्रे आचार्यस्य शयनादुत्थानमाचमनं मन्त्रस्नानं मण्डललेखनं प्रत्यूषे नित्यकर्मानुष्ठानं शिष्यस्वप्नपरीक्षां चाह—अथातीतेऽर्धरात्रे त्वित्यादिभिः ॥ ८-१५॥ आचार्य आधी रात बीत जाने पर शयन से उठ जावे। कमण्डल लेकर शयन से बाहर आचमन करे फिर आसन पर बैठे ॥ ८ ॥ संस्मरेदग्रतश्चास्त्रं हुतभुग्राशिसन्निभम्।

एकोनविंशः परिच्छेदः ४५५ तदन्तःस्थं विशेद् देवं स्नानं मान्त्रं कृतं भवेत् ॥ ९ ॥ निद्रामोहमलं येन शश्वदायाति संक्षयम् । शङ्कून् वै घटिकास्तत्र रजांस्यस्त्रवरेण च ॥ १० ॥ समादाय च संस्मृत्य निष्षिष्यार्घ्यैर्महीतले । शुष्कगोमयसंघृष्टे मण्डलं यत् पुरोदितम् ॥ ११ ॥ तदनन्तर सर्वप्रथम प्रज्वलित अग्निराशि के समान अस्त्र मन्त्र का अन्तःकरण से स्मरण करे, फिर मन्त्र स्नान करे जिससे निद्रा मोह और समस्त पाप का संक्षय हो जाता है । फिर अस्त्र मन्त्र पढ़कर शङ्कु (काँटा), घटिका (सूत्र) तथा रंगने वाला चूर्ण उससे, फिर अर्घ्य सिञ्चित शुष्क गोमय से संघृष्ट भूमि पर उस मण्डल का, जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है, निर्माण करे ॥ ९-११ ॥ भद्रत्वपरिरक्षार्थं न्यस्याः कोणेषु शङ्कवः । कमलभ्रमसिद्ध्यर्थमेकं मध्ये निवेश्य च ॥ १२ ॥ मण्डल की रक्षा के लिये उसके चारों कोणों पर खूँटी गाड़ देनी चाहिए । मण्डल के मध्य में कमल का भ्रम उत्पन्न करने के लिये उसके मध्य में एक खूँटी गाड़ देनी चाहिए ॥ १२ ॥ ईषन्न याति वैषम्यं तद् रात्रिसमये यथा । महानूनाधिके दोषः सशिष्यस्य यतो गुरोः ॥ १३ ॥ रात्रि के समय उस मण्डल की रक्षा के लिये जिस प्रकार उसमें कोई विषमता न हो वैसा प्रयत्न करे । क्योंकि उस मण्डल के न्यून होने पर अथवा अधिक होने पर शिष्य सहित गुरु को महान् दोष लगता है ॥ १३ ॥ अतस्तद् रक्षणीयं च यत्नेन महता सदा । निर्वर्त्य नित्यं प्रत्यूषे पुरा वै स्नानपूर्वकम् ॥ १४ ॥ शिष्यमाहूय सञ्छोद्य स्वप्नप्राप्तिं शुभाशुभाम् । इसलिये महान् प्रयत्न के द्वारा मण्डल की रक्षा करे । तदनन्तर प्रातःकाल स्नान कर नित्य कर्मानुष्ठान सम्पादन कर शिष्य को अपने पास बुलावे और शिष्य की स्वप्न प्राप्ति पर शुभाशुभ विचार करे ॥ १४ ॥ शुभाशुभस्वप्नानि चतुर्मूर्तिसमूहं तु यथादिक्संस्थितं तु वै ॥ १५ ॥ पश्येत् पङ्क्तिनिविष्टं च उपविष्टं तु चोत्थितम् । तन्मध्याद् भगवत्तत्त्वमेकं वा भिन्नलक्षणम् ॥ १६ ॥

४५६ सात्वतसंहिता प्रादुर्भावसमूहं च तल्लाञ्छनगणश्च यः । दैवीयं वनितावृन्दं सर्वमेकमथापि वा ॥ १७ ॥ शुभाशुभस्वप्नान्याह—चतुर्मूर्तिसमूहं त्वित्यादिभिः ॥ १५-३३ ॥ चारों मूर्तियों (वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध) इनको अपनी-अपनी दिशाओं में संस्थित स्वप्न में देखे, अथवा एक पङ्क्ति में बैठा हुआ तथा खड़ा देखे, अथवा उनके मध्य में एक भगवत्तत्त्व अथवा भिन्न-भिन्न लक्षण युक्त देखे । उनके प्रादुर्भाव समूह को अथवा उनके चिह्न समूहों को देखे । सभी दैवी वनितावृन्द को अथवा किसी एक को देखे तो उसे शुभावह स्वप्न समझना चाहिये ॥ १५-१७ ॥ भवोपकरणव्रातमशेषं वा पृथक् स्थितम् । रुद्रेन्द्रचन्द्रसूर्याम्बुहुतभुग्वातलक्षणम् ॥ १८ ॥ सभी भवोपकरणों को समूह रूप में, अथवा पृथक्-पृथक् रूप में अवस्थित स्वप्न में देखे । रुद्र, इन्द्र, चन्द्र, सूर्य, जल, अग्नि तथा वात (वायु) का लक्षण देखे ॥ १८ ॥ पञ्चरात्रविदो विप्रा आराधनपरायणाः । त्रयीमुद्घोषयन्तश्च निगदन्तश्च वा द्विजाः ॥ १९ ॥ आराधन में परायण पञ्चरात्रवेत्ता ब्राह्मणों को देखे अथवा उन्हें वेद का उद्घोष करते हुए देखे, अथवा उन्हें वेदपाठ करते स्वप्न में देखे ॥ १९ ॥ यतयः शुद्धसत्त्वाश्च सद्ब्रह्मपदसंस्थिताः । नगस्रक्चन्दनाद्यानि सुगन्धानि तरूत्तमः ॥ २० ॥ विशुद्ध अन्तःकरण वाले अथवा सद् ब्रह्मपद में संस्थित यतियों को यदि स्वप्न में देखे, पर्वत, स्रक् (माला), चन्दनादि सुगन्धित पदार्थों को देखे, या माङ्गलिक अश्वत्थादि वृक्षों को देखे तो वह शुभ होता है ॥ २० ॥ उद्यानवनितारामवापीहर्म्यमहालयाः । फलबीजौषधीः साम्बुकुम्भो वा पाकनिर्गतः ॥ २१ ॥ गोगजाश्च नदी यानं कन्या सालङ्कृता शिशुः । मङ्गल्यगीतिर्मधुरा भेरी वंशश्च वल्लरी ॥ २२ ॥ उद्यान एवं महिलाओं की वाटिका, वापी, ऊँचे-ऊँचे प्रासाद, महालय, फल, बीज, औषधी, सजल घट अथवा उत्तमोत्तम पाक सामग्री, गौ, हाथी, नदी, यान, अलङ्कार युक्त कन्या, शिशु, मधुर माङ्गल्य गीत, नगाड़ा, बाँस या लता देखे तो शुभ होता है ॥ २१-२२ ॥

एकोनविंशः परिच्छेदः ४५७ ससारसं सरः पद्मैः पूर्णं छत्रं सितं ततम् । हेमादिधातवो रत्नजालं गोसम्भवानि च ॥ २३ ॥ नवो नेत्रचयः शुद्धं वस्त्रवृन्दमनाहतम् । राजा पुरोधाः सामन्तो राजपत्नी च दर्पणम् ॥ २४ ॥ तुषारपातः सद्वृष्टिर्महामेघोदयो दिवि । शोणितं चार्द्रमांसानि खप्लुतिर्मदिरालयः ॥ २५ ॥ सत्पक्षिमृगसङ्घातः सुरार्चा चामरं सितम् । एवमादीनि चान्यानि विद्धि सिद्धिप्रदानि च ॥ २६ ॥ सारस युक्त तालाब, अथवा कमलपूर्ण तालाब, ऊपर लगाया गया श्वेत छत्र, सुवर्णादि धातु, रत्नसमूह, पृथिवी से उत्पन्न होने वाले पदार्थ, नवीन नेत्रचय (?), शुद्ध एवं नवीन वस्त्रसमूह, राजा, पुरोहित, मन्त्री, राजपत्नी, दर्पण, बर्फ, उत्तम वृष्टि, आकाश में उदीयमान महामेघ, शोणित आर्द्र, मांस, आकाश में उड़ना, मद्यवान का गृह, उत्तमोत्तम पक्षियों का समूह, उत्तमोत्तम वन्य मृगों का समूह, देव पूजा, श्वेत चामर इसी प्रकार के अन्य माङ्गलिक पदार्थों को स्वप्न में देखें तो वे सिद्धि प्रदान करते हैं ॥ २३-२६ ॥ स्वप्नानि यान्यनिष्टानि तानि मे लेशतः शृणु । म्लानता क्षितिकम्पश्च उपरागोऽतिभीषणः ॥ २७ ॥ नीहार उल्कापातश्च निर्घातश्चित्तभङ्कृत् । गर्तप्रवेशो दध्यन्नं स्विन्नमांसास्य भक्षणम् ॥ २८ ॥ हे सङ्कर्षण ! अब स्वप्न में जो अनिष्टकारी पदार्थ हैं उन्हे संक्षेप में सुनिये । अपने आप को मलीन देखना, भूकम्प, अत्यन्त भीषण उपराग (ग्रहण), नीहार (कुहरा) पात, उल्कापात, बिजली की कड़कड़ाहट जिससे हृदय कम्पित हो जावे, गड्ढे में पतन, दधियुक्त अन्न का भक्षण तथा स्वेद युक्त अन्न का भक्षण देखना अशुभ होता है ॥ २७-२८ ॥ नर्तनं रथविध्वंस आज्यं स्वाङ्गद्विजच्युतिः । खरोष्ट्रं चोत्कटं हास्यं कपिऋक्षाकुलं वनम् ॥ २९ ॥ स्थानं धूमाकुलं दग्धमसिताम्बरवेष्टितम् । शुष्कत्वं सरितादीनां प्रतिस्रोतस्त्वमेव च ॥ ३० ॥ नाचना, रथ का विनाश, घृत, अपने शरीर से दाँत का टूट कर बाहर हो जाना, गदहा, ऊँट, उत्कट (भयानक) हास्य, वानर, भालुओं से परिपूर्ण वन, धूम समूह से व्याप्त स्थान, अपने आप को जले हुए तथा काले वस्त्र से वेष्टित सा० सं० - ३३

४५८ सात्वतसंहिता देखना, नदियों का सूखना तथा उनका प्रतिकूल प्रवाह में प्रवाहित होना ये सब अनिष्टकारी हैं ॥ २९-३० ॥ पोत्यानध्वजच्छत्रतरुभङ्गोऽप्यसिद्धिकृत् । अवतारो नगाद् वृक्षान्नग्नत्वं प्रेतदर्शनम् ॥ ३१ ॥ जहाज का डूबना, यान का विनष्ट होना, ध्वज का टूटना, छत्र का भङ्ग होना तथा वृक्ष का गिरना । ये सभी स्वप्न असिद्धि प्रदान करने वाले होते हैं । वृक्ष से तथा पहाड़ से अपने को नीचे उतरते हुए तथा नङ्गे रूप में देखना, प्रेत दर्शन, ये सभी स्वप्न अमङ्गलकारी होते हैं ॥ ३१ ॥ वसाकज्जलतैलाज्यलेपः सत्कर्दमे स्थितिः । महिषोऽहिर्नरः कृष्णो दक्षिणाशागमः क्षुधा ॥ ३२ ॥ लुञ्चनं नखकेशानामस्थिभङ्गादिकं द्रुतम् । एवमादीनि चान्यानि अशुभानि महामते ॥ ३३ ॥ वसा (चर्बी), काजल, तेल, अथवा घृत का लेप, घोर कीचड में फँसा हुआ होना, भैंसा, साँप, काला पुरुष, दक्षिण दिशा में गमन, अर्धरात्रि में भूख का लगना, नख, केश का लुञ्चन, हड्डी का टूट जाना । इसी प्रकार के अन्य स्वप्न, हे महामते ! अशुभ होते हैं ॥ ३२-३३ ॥ अशुभ स्वप्न शान्तिः प्राप्ते शुभाशुभे स्वप्नेऽप्यभिसन्धाय वै हृदि । औत्सुक्यादशिवध्वंसि पूजाहोमं समाचरेत् ॥ ३४ ॥ अशुभस्वप्ने तच्छान्तिमाह—प्राप्त इति ॥ ३४ ॥ इस प्रकार शुभाशुभ स्वप्न देखने पर साधक अपने हृदय में विचार करे । फिर अशुभ स्वप्न देखने पर उसकी शान्ति के लिये प्रयत्नपूर्वक पूजा एवं होम का आचरण करे ॥ ३४ ॥ कुम्भादिष्वर्चनक्रमः यथोक्तविधिना देवमवतार्य क्रमाद् यजेत् । तर्पयित्वा यथान्यायं पूर्णान्तं चाचरेत् ततः ॥ ३५ ॥ पुनर्यथाक्रमं कुम्भादिष्वर्चनमाह—यथोक्तविधिनेति ॥ ३५ ॥ अथवा दुःस्वप्न शान्ति के लिये पूर्वोक्त विधि से देवाधिदेव विष्णु को कलश से नीचे उतार कर उनका पूजन करे । अथवा शास्त्रोक्त विधि से उनका तर्पण कर पूर्णाहुति करे ॥ ३५ ॥

एकोनविंशः परिच्छेदः ४५९ उपवेशन-निरीक्षणादिसंस्कारकथनम् ईशकोणेऽथवा सौम्ये पदे यागगृहस्य च । मण्डले पूर्वनिर्दिष्टे वृत्ते वा चतुरश्रके ॥ ३६ ॥ स्नातं स्रग्वस्त्रभृच्छिष्यं कृतन्यासं निवेशयेत् । निरीक्ष्य ताड्य सम्प्रोक्ष्य दर्भैरालभ्य पूर्ववत् ॥ ३७ ॥ संस्कृत्य मूर्तिवत् किन्तु अनुग्राह्यं धरागतम् । आपादान्मन्त्रहस्तेन परामृश्याऽथ मूर्धनि ॥ ३८ ॥ स्नातस्यालङ्कृतस्य कृतन्यासस्य शिष्यस्य गोमयलिप्ते मण्डले समुपवेशनं निरीक्षणादिसंस्कारांश्चाह—ईशकोणेति सार्धैस्त्रिभिः । निरीक्षणं नेत्रमन्त्रेण, ताडन- मस्त्राभिमन्त्रिततिलसिद्धार्थैः, प्रोक्षणमस्त्राम्भसा, दर्भैरालभनम्, पीठं तेनास्त्रमन्त्रेण, मूर्तिवत् संस्कारो मन्त्रन्यासैरिति ज्ञेयम् । मन्त्रहस्तेन = प्रधानमन्त्रत्वेन भावितनिज- दक्षिणहस्तेनेत्यर्थः ॥ ३६-३९ ॥ तदनन्तर यागगृह के पूर्वनिर्दिष्ट गोमयानुलिप्त गोलाकार अथवा चौकोर मण्डल के ईशानकोण में, अथवा उत्तर दिशा में स्नान किये हुए वस्त्र माला से विभूषित शिष्य को बैठावे । नेत्र मन्त्र से उसका निरीक्षण करे और अस्त्राभिमन्त्रित तिल तथा श्वेत सर्षप से उसका ताडन करे । फिर जल से प्रोक्षण करे और दर्भ से आलम्भन करे । मूर्त्ति के समान मन्त्रन्यास कर उसका संस्कार करे । फिर प्रधान मन्त्र से अभिमन्त्रित अपने दाहिने हाथ से शिष्य के पैर से लेकर मस्तक तक शरीर का स्पर्श करे ॥ ३६-३८ ॥ मन्त्रहस्तं ज्वलद्रूपं दद्याद् यो दुःखबीजजित् । तमादाय कराद् देवधामसन्त्रिकटं व्रजेत् ॥ ३९ ॥ आचार्य द्वारा ज्वलद्रूप वाले जिस मन्त्रहस्त से शिष्य का स्पर्श किया जाता है वह हाथ समस्त दुःख के बीजों को नष्ट करने वाला होता है । इसके बाद आचार्य शिष्य का हाथ पकड़कर देवधाम के सन्निकट में ले जावे ॥ ३९ ॥ शिष्यस्य वैष्णवनामकरणकथनम् कृत्वात्मनो वामभागे भूयः संछाद्य लोचने । प्रक्षेपयेत् तथा सार्घ्यमञ्जलिं मुक्तलोचनम् ॥ ४० ॥ सम्पश्येत् परमं धाम मान्त्रमच्छफलप्रदम् । तस्मिन्नवसरे कुर्यान्नाम यस्य यथोचितम् ॥ ४१ ॥ अथ शिष्य वैष्णवनामकरणविधानमाह—तमादायेत्यारभ्य दासान्तं शूद्रजन्मना- मित्यन्तम् । अस्मिन्नवसरे शिष्यस्य नामकरणात् पूर्वं सुदर्शनपाञ्चजन्यधारणमूर्ध्वपुण्ड्र-

४६० सात्वतसंहिता धारणं च कार्यम्, यतः—‘‘तापः पुण्ड्रस्तथा नाम मन्त्रो यागश्च पञ्चमः’’ (ई०सं० २१।२८४) इति तयोर्नामकरणात्प्राक्कालीनत्वमुक्तम् । किञ्च, ‘‘पञ्चलोहमयं चक्रं सशङ्खं द्वादशारकम्’’ (१८।३५) इति पूर्वं सम्भारार्जनप्रकरणोक्ताभ्यां शङ्खचक्राभ्यां तापस्त्ववसरान्तरे(न?ण) प्रतिपादितश्च । ननु सम्भारार्जनप्रकरणे चक्रशङ्खौ नहि तापार्थं प्रतिपादितौ, अपि तु— मुद्रावसानं कृत्वैवं सम्यक् तदनु चाहरेत् ।। पाणिभ्यां शङ्खचक्रे द्वे स्वमन्त्रेणाभिमन्त्रिते । भूत्वा तदात्मना पश्चात् ते निधाय धरातले ।। अवलोक्याखिलं तत्स्थं प्रवर्तेताथ कर्मणि । (१८।५९-६१) इत्येतावन्मात्रोपयोगार्थं प्रतिपादिताविति चेत्, कस्तावता भवतो विरोधः, प्रसिद्धे तापेऽप्युपयुज्येतां नाम । न च वेदविरुद्धत्वमेव मम विरोध इति वाच्यम्, तस्य वेदोक्तत्वे परश्शतप्रमाणानि सच्चरित्ररक्षायां तप्तमुद्राविद्रावणविद्राविण्यां सिद्धान्त- चन्द्रिकायां च प्रतिपादितानि । सावधानं पश्यतु भवान् । अत एव वेदमूलेऽस्मिन्नपि तन्त्रे द्वादशपरिच्छेदे— नास्त्रैर्वस्त्रैर्ध्वजैर्येषां व्यक्तिर्व्यक्ता जगत्त्रये ।। तेऽपि लाञ्छनवृन्दं तु धारयन्त्यङ्घ्रिगोचरे । ललाटे चांसपट्टे तु पृष्ठे पाणितलद्वये ।। तनूरुहचये मूर्ध्नि कर्मिणां प्रतिपत्तये । अपि संसारिणो जन्तोः स्वभावाद् वैष्णवस्य च ।। न जहात्याच्युतं लिङ्गं किं पुनर्विभवाकृतेः । (१२।१६८-१७१) इति वैष्णवभगवल्लाञ्छनधारणं सुस्पष्टं प्रतिपादितम् । किञ्च, एतद्वचनस्य सहजलाञ्छनपरत्वभ्रमोऽपि सच्चरित्ररक्षायामेव (पृ० ४३) निवारितः । नन्वस्तु नाम सुदर्शनपाञ्चजन्यधारणं प्रमाणसिद्धम्, तदिदानीमेव दीक्षाप्रकरणे कार्यमिति कोऽयं नियमः । तथा नियमे नामकरणवत् तदपि भगवतैव कण्ठरवेणोक्तं भवेत् । जयाख्यलक्ष्मीतन्त्रपाद्मादिष्वपि नहि तद्दीक्षाङ्गत्वेन प्रतिपादितमिति चेत्, सत्यम् । दीक्षाङ्गमिति केनोक्तम् । पूर्वमप्राप्तशङ्खचक्रलाञ्छानानामेव, ‘‘पञ्चलोहमयं चक्रं सशङ्खं द्वादशारकम्’’ (१८।३५) इति सम्भारप्रकरणे प्रतिपादितम् । उत्तरत्रा- चार्याभिषेकानन्तरं शिष्यायाचार्यलाञ्छनप्रदानसमयेऽपि—‘‘स्रुक्स्रुवौ योगपट्टं च शङ्ख-चक्रे कमण्डलुम्’’ (२०।९६) इति वक्ष्यति । किन्तु चक्रा(ङ्क?ङ्क) नादीनां दीक्षायाः पूर्वमेव मुख्यकालत्वाद् गौणकाले दीक्षामध्ये तन्न प्रतिपादितम् । ईश्वरतन्त्रे तु गौणकाल एव प्रतिपादितम् । नहि तत्र दीक्षाकाले प्रतिपादितत्वमात्रेण तत्तदानीमेवानु- ष्ठेयमिति नियमोऽस्ति, शङ्खचक्रधारणस्य जातकर्मनामकरणादिकालेषूपनयनात् पूर्व- मुपनयनानन्तरं विवाहाद्यनन्तरं वा कर्तव्यत्वेन बहुविधसमयानां तत्र तत्र प्रतिपादि- तत्वात् । दीक्षाकालस्तु सर्वथा नोल्लङ्घनीयः । यतः पारमेश्वरे प्रतिष्ठाध्याये— एवं तदीया विप्राश्च क्षत्रिया वैश्यजातयः ।।

एकोनविंशः परिच्छेदः ४६१ मौद्गल्याद्यास्तथान्ये च न तच्चिह्नविवर्जिताः । भवेयुः सर्वथा तस्माच्छङ्खचक्रगदाम्बुजः ॥ लोहैर्नलसन्तप्तैस्तत्तन्मन्त्राधिवासितैः । पूजितैरर्घ्यगन्धाद्यैरङ्कितव्याः क्षणेन तु ॥ त्रय्यन्तज्ञानसम्पन्ना यथोक्ताचारनिष्ठिताः । विप्राद्यास्ते च शूद्राश्च यदैव कृतलक्षणाः ॥ तदा तु योग्या विज्ञेयाः समयश्रवणादिषु । (१५।१६१-१६५), इति कृतलक्षणानामेव दीक्षायां योग्यता प्रतिपादिता । नन्वेवम्— सुदर्शनं धारयित्वा वह्नितप्तं द्विजोत्तमः । उपनीय विधानेन पश्चात् कर्मसु योजयेत् ॥ इति कृतलक्षणस्यैव गायत्रीग्रहणादिकर्मयोग्यत्वं प्रतिपाद्यते, भुजे चक्रं द्विजातीनां शिरश्चक्रं तु दैवतम् । अचक्रद्विजदेवानां पूजा दानं च निष्फलम् ॥ इत्युक्त्याऽकृतलक्षणस्य कन्यादानाद्यर्हत्वमपि नास्ति, अतश्चक्रादिलाञ्छने उप- नयनविवाहकालावान्यनुलङ्घनीयाविति चेत्, कस्येष्टं तदुल्लङ्घनम् । अनुपपत्तिवशात् स्मार्तसंस्कारोल्लङ्घनेऽपि दीक्षाख्यवैष्णवसम्प्रदायकालः सर्वथाऽनुलङ्घनीय इति निर्णयः । यतः पाद्मे— "चक्रेणैवाङ्कितो विद्वान् वासुदेवं समाश्रयेत्" इति प्रतिपाद्यते । अत एवेश्वरे दीक्षाकालस्याप्युल्लङ्घनभिया तत्रकरण एव चक्राङ्कनादिकमुक्तम् । तत्पूर्वमेव कृतचक्राङ्कनानां तु दीक्षाकाले तन्न प्रकृतम् । आचारे सति पुनर्दीक्षाकाले तत्रकरणेऽपि न प्रत्यवायः, चक्रादि धारयेद् विप्रो ललाटे मस्तके भुजे । पातकादिविशुद्ध्यर्थं भवक्लेशविनाशनम् ॥ इत्यादित्यपुराणादिषु शुद्ध्यपादकत्वेन च प्रतिपादनात्, पूर्वं कृतलाञ्छनस्य देहोपचयादिना मलिनत्वे पुनः स्फुटत्वसिद्धेश्च । ननु— विष्णवागमादितन्त्रेषु दीक्षितानां विधीयते । शङ्खचक्रगदापूर्वैरङ्कनं नान्यदेहिनाम् ॥ इत्यादिवचनैर्दीक्षानन्तरमपि चक्राङ्कनमवगम्यत इति चेन्न, दीक्षितानामित्यस्य दीक्षार्हपरत्वात् । सिद्धान्तचन्द्रिकायां तु दीक्षितानामित्यस्य मुमुक्षुपरत्वमुक्तम् । तद- संगतम्, तन्त्रदीक्षाप्रवेशभिया तादृशार्थाङ्गीकरणात् । निर्निमित्तेयं भीतिः । यतो महा- भारते शान्तिपर्वणि— अवश्यं वैष्णवो दीक्षां प्रविशेत् सर्वयत्नतः । दीक्षिताय विशेषेण प्रसीदेन्नान्यथा हरिः ॥ वसन्ते दीक्षयेद् विप्रं ग्रीष्मे राजन्यमेव च । शरदः समये वैश्यं हेमन्ते शूद्रमेव च ॥

४६२ सात्वतसंहिता स्त्रियं च वर्षकाले तु पञ्चरात्रविधानतः । इति ब्राह्मणादीनां सर्वेषामप्यविशेषेण तन्त्रदीक्षाप्रवेशो विधीयते । एतद्वचना- नामधिकारिविशेषत्वे कथिते विनिगमनाविरहेण— ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैश्च कृतलक्षणैः । अर्चनीयश्च सेव्यश्च नित्युक्तैः स्वकर्मसु ॥ (द्वापरस्य युगस्यान्ते आदौ कलियुगस्य च) सात्वतं विधिमास्थाय गीतः सङ्कर्षणेन यः ॥ —(महा० भा० भीष्म पर्व ६६।३९-४०) इति महाभारतभीष्मपर्ववचनानामप्यधिकारिविशेषपरत्वमेव संभवति । संभवतु नाम, तावताऽस्माकं का हानिरिति चेत्, आचार्योक्तिविरुद्धं वचो मा वोचः, पञ्चरात्ररक्षायां ह्येतद्भीष्मपर्ववचनान्युदाहृत्य—‘‘एवमविशेषेण सर्वेषां ब्राह्मणादीनां श्रीमत्पञ्चरात्रोक्तमार्गेण भगवदर्चनादिकं कर्तव्यम्’’ (पृ० २१) इत्यभिहितत्वात् । ‘‘सर्वसूत्रनिष्ठानामपि भगवच्छास्त्रोक्तप्रक्रियया समाराधनादिकं प्रशस्ततमम् । तथा च शिष्टैरनुष्ठीयते’’ (पृ० २१) इति सिद्धान्तितम् । तत्रैव द्वितीयाधिकारेऽपि (पृ० ५६) श्रीमद्भाष्यकार-प्रभृतिभिः श्रीपाञ्चरात्रे यत्किञ्चित् सिद्धान्तस्थां काञ्चित् संहितां प्रधानीकृत्य नित्याराधनं संगृहीतमित्यपि प्रतिपादितम् । अतस्त्वेकत्र निर्णीतोऽर्थः सर्वत्रेति न्यायेन दीक्षाप्रवेशविधायकशान्तिपर्ववचनानामप्यविशेषेण सर्वजनविषयत्वं बोध्यम् । एतादृशे पञ्चमवेदवचने जागरूके सति भवतां तत्र दीक्षाप्रवेशे का भीतिः । तन्त्रदीक्षामन्तरा तदुक्तभगवदर्चनादौ भवतामधिकारः कथं सिद्ध्यति? अन्येषां ब्राह्मणादीनां वर्णानां दीक्षया क्रमात् । अधिकारोऽनुलोमानापि नान्यस्य कस्यचित् ॥ पूजाविधौ भगवतस्तेऽनुकल्पाधिकारिणः । इति पाद्मादिषु दीक्षितानामेव हि भगवदर्चनाधिकारः श्रूयते । किञ्च, अत्रापि द्वितीये परिच्छेदे—‘‘चतुर्णामधिकारो वै वृत्ते दीक्षाक्रमे सति’’ (२।९२) इति प्रतिपादितम् । इदं परार्थयजनविषयमिति मावोचः, चतुर्वर्णानामविशेषेणाधिकार- वर्णनात् । यद्यपि भवद्भिरपि सिद्धान्तचन्द्रिकायाम्—‘‘वैखानसाद्यागमोक्तदीक्षां प्राप्तो हि वैष्णवः’’ इत्यत्र, तन्त्रदीक्षां विना यस्तु शङ्खचक्रादिलाञ्छनम् । बिभर्ति स तु पाषण्डो विज्ञेयस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ इत्यत्र च तन्त्रदीक्षाऽङ्गीकृतैव, तथापि यावदर्थानुष्ठानभिया दीक्षाशब्दस्य देवतान्तरपरित्यागरूपनियमपरिग्रहमात्रपरत्वमुक्तम् । महाभारतादिवचनपर्यालोचनया दीक्षाप्रवेशे मा भीति भजन्तु भवन्तः । अलं प्रसक्तानुप्रसक्त्या । प्रकृतमनुसरामः । एषां चक्राङ्कनादिसंस्काराणां दीक्षाकालेऽनुष्ठानक्रम ईश्वरसंहितायां सम्यक् प्रतिपादितः । पृथक्कालेऽनुष्ठानेऽपि स एव क्रमोऽनुसरणीयः । तदानीमग्निस्तु— विष्णोरायतनाग्नौ वा गुरोरात्मनः एव वा ।