भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 517

४५८ सात्वतसंहिता देखना, नदियों का सूखना तथा उनका प्रतिकूल प्रवाह में प्रवाहित होना ये सब अनिष्टकारी हैं ॥ २९-३० ॥ पोत्यानध्वजच्छत्रतरुभङ्गोऽप्यसिद्धिकृत् । अवतारो नगाद् वृक्षान्नग्नत्वं प्रेतदर्शनम् ॥ ३१ ॥ जहाज का डूबना, यान का विनष्ट होना, ध्वज का टूटना, छत्र का भङ्ग होना तथा वृक्ष का गिरना । ये सभी स्वप्न असिद्धि प्रदान करने वाले होते हैं । वृक्ष से तथा पहाड़ से अपने को नीचे उतरते हुए तथा नङ्गे रूप में देखना, प्रेत दर्शन, ये सभी स्वप्न अमङ्गलकारी होते हैं ॥ ३१ ॥ वसाकज्जलतैलाज्यलेपः सत्कर्दमे स्थितिः । महिषोऽहिर्नरः कृष्णो दक्षिणाशागमः क्षुधा ॥ ३२ ॥ लुञ्चनं नखकेशानामस्थिभङ्गादिकं द्रुतम् । एवमादीनि चान्यानि अशुभानि महामते ॥ ३३ ॥ वसा (चर्बी), काजल, तेल, अथवा घृत का लेप, घोर कीचड में फँसा हुआ होना, भैंसा, साँप, काला पुरुष, दक्षिण दिशा में गमन, अर्धरात्रि में भूख का लगना, नख, केश का लुञ्चन, हड्डी का टूट जाना । इसी प्रकार के अन्य स्वप्न, हे महामते ! अशुभ होते हैं ॥ ३२-३३ ॥ अशुभ स्वप्न शान्तिः प्राप्ते शुभाशुभे स्वप्नेऽप्यभिसन्धाय वै हृदि । औत्सुक्यादशिवध्वंसि पूजाहोमं समाचरेत् ॥ ३४ ॥ अशुभस्वप्ने तच्छान्तिमाह—प्राप्त इति ॥ ३४ ॥ इस प्रकार शुभाशुभ स्वप्न देखने पर साधक अपने हृदय में विचार करे । फिर अशुभ स्वप्न देखने पर उसकी शान्ति के लिये प्रयत्नपूर्वक पूजा एवं होम का आचरण करे ॥ ३४ ॥ कुम्भादिष्वर्चनक्रमः यथोक्तविधिना देवमवतार्य क्रमाद् यजेत् । तर्पयित्वा यथान्यायं पूर्णान्तं चाचरेत् ततः ॥ ३५ ॥ पुनर्यथाक्रमं कुम्भादिष्वर्चनमाह—यथोक्तविधिनेति ॥ ३५ ॥ अथवा दुःस्वप्न शान्ति के लिये पूर्वोक्त विधि से देवाधिदेव विष्णु को कलश से नीचे उतार कर उनका पूजन करे । अथवा शास्त्रोक्त विधि से उनका तर्पण कर पूर्णाहुति करे ॥ ३५ ॥