भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 516

एकोनविंशः परिच्छेदः ४५७ ससारसं सरः पद्मैः पूर्णं छत्रं सितं ततम् । हेमादिधातवो रत्नजालं गोसम्भवानि च ॥ २३ ॥ नवो नेत्रचयः शुद्धं वस्त्रवृन्दमनाहतम् । राजा पुरोधाः सामन्तो राजपत्नी च दर्पणम् ॥ २४ ॥ तुषारपातः सद्वृष्टिर्महामेघोदयो दिवि । शोणितं चार्द्रमांसानि खप्लुतिर्मदिरालयः ॥ २५ ॥ सत्पक्षिमृगसङ्घातः सुरार्चा चामरं सितम् । एवमादीनि चान्यानि विद्धि सिद्धिप्रदानि च ॥ २६ ॥ सारस युक्त तालाब, अथवा कमलपूर्ण तालाब, ऊपर लगाया गया श्वेत छत्र, सुवर्णादि धातु, रत्नसमूह, पृथिवी से उत्पन्न होने वाले पदार्थ, नवीन नेत्रचय (?), शुद्ध एवं नवीन वस्त्रसमूह, राजा, पुरोहित, मन्त्री, राजपत्नी, दर्पण, बर्फ, उत्तम वृष्टि, आकाश में उदीयमान महामेघ, शोणित आर्द्र, मांस, आकाश में उड़ना, मद्यवान का गृह, उत्तमोत्तम पक्षियों का समूह, उत्तमोत्तम वन्य मृगों का समूह, देव पूजा, श्वेत चामर इसी प्रकार के अन्य माङ्गलिक पदार्थों को स्वप्न में देखें तो वे सिद्धि प्रदान करते हैं ॥ २३-२६ ॥ स्वप्नानि यान्यनिष्टानि तानि मे लेशतः शृणु । म्लानता क्षितिकम्पश्च उपरागोऽतिभीषणः ॥ २७ ॥ नीहार उल्कापातश्च निर्घातश्चित्तभङ्कृत् । गर्तप्रवेशो दध्यन्नं स्विन्नमांसास्य भक्षणम् ॥ २८ ॥ हे सङ्कर्षण ! अब स्वप्न में जो अनिष्टकारी पदार्थ हैं उन्हे संक्षेप में सुनिये । अपने आप को मलीन देखना, भूकम्प, अत्यन्त भीषण उपराग (ग्रहण), नीहार (कुहरा) पात, उल्कापात, बिजली की कड़कड़ाहट जिससे हृदय कम्पित हो जावे, गड्ढे में पतन, दधियुक्त अन्न का भक्षण तथा स्वेद युक्त अन्न का भक्षण देखना अशुभ होता है ॥ २७-२८ ॥ नर्तनं रथविध्वंस आज्यं स्वाङ्गद्विजच्युतिः । खरोष्ट्रं चोत्कटं हास्यं कपिऋक्षाकुलं वनम् ॥ २९ ॥ स्थानं धूमाकुलं दग्धमसिताम्बरवेष्टितम् । शुष्कत्वं सरितादीनां प्रतिस्रोतस्त्वमेव च ॥ ३० ॥ नाचना, रथ का विनाश, घृत, अपने शरीर से दाँत का टूट कर बाहर हो जाना, गदहा, ऊँट, उत्कट (भयानक) हास्य, वानर, भालुओं से परिपूर्ण वन, धूम समूह से व्याप्त स्थान, अपने आप को जले हुए तथा काले वस्त्र से वेष्टित सा० सं० - ३३