सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५६ सात्वतसंहिता प्रादुर्भावसमूहं च तल्लाञ्छनगणश्च यः । दैवीयं वनितावृन्दं सर्वमेकमथापि वा ॥ १७ ॥ शुभाशुभस्वप्नान्याह—चतुर्मूर्तिसमूहं त्वित्यादिभिः ॥ १५-३३ ॥ चारों मूर्तियों (वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध) इनको अपनी-अपनी दिशाओं में संस्थित स्वप्न में देखे, अथवा एक पङ्क्ति में बैठा हुआ तथा खड़ा देखे, अथवा उनके मध्य में एक भगवत्तत्त्व अथवा भिन्न-भिन्न लक्षण युक्त देखे । उनके प्रादुर्भाव समूह को अथवा उनके चिह्न समूहों को देखे । सभी दैवी वनितावृन्द को अथवा किसी एक को देखे तो उसे शुभावह स्वप्न समझना चाहिये ॥ १५-१७ ॥ भवोपकरणव्रातमशेषं वा पृथक् स्थितम् । रुद्रेन्द्रचन्द्रसूर्याम्बुहुतभुग्वातलक्षणम् ॥ १८ ॥ सभी भवोपकरणों को समूह रूप में, अथवा पृथक्-पृथक् रूप में अवस्थित स्वप्न में देखे । रुद्र, इन्द्र, चन्द्र, सूर्य, जल, अग्नि तथा वात (वायु) का लक्षण देखे ॥ १८ ॥ पञ्चरात्रविदो विप्रा आराधनपरायणाः । त्रयीमुद्घोषयन्तश्च निगदन्तश्च वा द्विजाः ॥ १९ ॥ आराधन में परायण पञ्चरात्रवेत्ता ब्राह्मणों को देखे अथवा उन्हें वेद का उद्घोष करते हुए देखे, अथवा उन्हें वेदपाठ करते स्वप्न में देखे ॥ १९ ॥ यतयः शुद्धसत्त्वाश्च सद्ब्रह्मपदसंस्थिताः । नगस्रक्चन्दनाद्यानि सुगन्धानि तरूत्तमः ॥ २० ॥ विशुद्ध अन्तःकरण वाले अथवा सद् ब्रह्मपद में संस्थित यतियों को यदि स्वप्न में देखे, पर्वत, स्रक् (माला), चन्दनादि सुगन्धित पदार्थों को देखे, या माङ्गलिक अश्वत्थादि वृक्षों को देखे तो वह शुभ होता है ॥ २० ॥ उद्यानवनितारामवापीहर्म्यमहालयाः । फलबीजौषधीः साम्बुकुम्भो वा पाकनिर्गतः ॥ २१ ॥ गोगजाश्च नदी यानं कन्या सालङ्कृता शिशुः । मङ्गल्यगीतिर्मधुरा भेरी वंशश्च वल्लरी ॥ २२ ॥ उद्यान एवं महिलाओं की वाटिका, वापी, ऊँचे-ऊँचे प्रासाद, महालय, फल, बीज, औषधी, सजल घट अथवा उत्तमोत्तम पाक सामग्री, गौ, हाथी, नदी, यान, अलङ्कार युक्त कन्या, शिशु, मधुर माङ्गल्य गीत, नगाड़ा, बाँस या लता देखे तो शुभ होता है ॥ २१-२२ ॥