भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 514

एकोनविंशः परिच्छेदः ४५५ तदन्तःस्थं विशेद् देवं स्नानं मान्त्रं कृतं भवेत् ॥ ९ ॥ निद्रामोहमलं येन शश्वदायाति संक्षयम् । शङ्कून् वै घटिकास्तत्र रजांस्यस्त्रवरेण च ॥ १० ॥ समादाय च संस्मृत्य निष्षिष्यार्घ्यैर्महीतले । शुष्कगोमयसंघृष्टे मण्डलं यत् पुरोदितम् ॥ ११ ॥ तदनन्तर सर्वप्रथम प्रज्वलित अग्निराशि के समान अस्त्र मन्त्र का अन्तःकरण से स्मरण करे, फिर मन्त्र स्नान करे जिससे निद्रा मोह और समस्त पाप का संक्षय हो जाता है । फिर अस्त्र मन्त्र पढ़कर शङ्कु (काँटा), घटिका (सूत्र) तथा रंगने वाला चूर्ण उससे, फिर अर्घ्य सिञ्चित शुष्क गोमय से संघृष्ट भूमि पर उस मण्डल का, जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है, निर्माण करे ॥ ९-११ ॥ भद्रत्वपरिरक्षार्थं न्यस्याः कोणेषु शङ्कवः । कमलभ्रमसिद्ध्यर्थमेकं मध्ये निवेश्य च ॥ १२ ॥ मण्डल की रक्षा के लिये उसके चारों कोणों पर खूँटी गाड़ देनी चाहिए । मण्डल के मध्य में कमल का भ्रम उत्पन्न करने के लिये उसके मध्य में एक खूँटी गाड़ देनी चाहिए ॥ १२ ॥ ईषन्न याति वैषम्यं तद् रात्रिसमये यथा । महानूनाधिके दोषः सशिष्यस्य यतो गुरोः ॥ १३ ॥ रात्रि के समय उस मण्डल की रक्षा के लिये जिस प्रकार उसमें कोई विषमता न हो वैसा प्रयत्न करे । क्योंकि उस मण्डल के न्यून होने पर अथवा अधिक होने पर शिष्य सहित गुरु को महान् दोष लगता है ॥ १३ ॥ अतस्तद् रक्षणीयं च यत्नेन महता सदा । निर्वर्त्य नित्यं प्रत्यूषे पुरा वै स्नानपूर्वकम् ॥ १४ ॥ शिष्यमाहूय सञ्छोद्य स्वप्नप्राप्तिं शुभाशुभाम् । इसलिये महान् प्रयत्न के द्वारा मण्डल की रक्षा करे । तदनन्तर प्रातःकाल स्नान कर नित्य कर्मानुष्ठान सम्पादन कर शिष्य को अपने पास बुलावे और शिष्य की स्वप्न प्राप्ति पर शुभाशुभ विचार करे ॥ १४ ॥ शुभाशुभस्वप्नानि चतुर्मूर्तिसमूहं तु यथादिक्संस्थितं तु वै ॥ १५ ॥ पश्येत् पङ्क्तिनिविष्टं च उपविष्टं तु चोत्थितम् । तन्मध्याद् भगवत्तत्त्वमेकं वा भिन्नलक्षणम् ॥ १६ ॥