सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 513, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ें४५४ सात्वतसंहिता वित्ताढ्यस्याल्पवित्तस्य द्रव्यहीनस्य च क्रमात्। (ल० ४१।९-१०) इति ॥ ३-७ ॥ श्री भगवान् ने कहा—हे सङ्कर्षण ! संसारी मनुष्यों के लिये एक अथवा अनेक रूपों में दीक्षा का विधान है। जिसे प्राप्त कर लोग शरीर के अन्त होने पर वाञ्छित फल प्राप्त करते हैं ॥ ३ ॥ कैवल्यफलदाऽप्येका भोगकैवल्यदा परा। भोगदैव तृतीया च प्रबुद्धानां सदैव हि ॥ ४ ॥ एक दीक्षा वह है जो केवल प्रबुद्धों को कैवल्य (मुक्ति) फल प्रदान करती है और अन्य दीक्षा भोग एवं कैवल्य दोनों प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त तृतीया दीक्षा वह है जो केवल भोग मात्र प्रदान करती है ॥ ४ ॥ आचार्यानुमताः सर्वाः कार्याः सम्यक् फलाप्तये । भक्तिभावानुविद्धानां शिष्याणां भावितात्मनाम् ॥ ५ ॥ वृद्धानामङ्गनानां च बालानां भावितात्मनाम्। विनाचारसमूहेन दुश्शकेन च ता हिताः ॥ ६ ॥ सभी दीक्षायें सम्यक् फल की प्राप्ति के लिये आचार्य की आज्ञा लेकर लेनी चाहिये । ये सभी दीक्षायें भक्तिभाव से अनुविद्ध अपना कल्याण चाहने वाले शिष्यों, वृद्धों, स्त्रियों, बालकों तथा आचार समूह के पालन में अशक्त किन्तु कल्याणેચ્છु जनों के लिये हितकारी है ॥ ५-६ ॥ पुरा धिया विचार्यैवमुपसन्नेन वै सह। तदीयमाशयं ज्ञात्वा सम्पाद्यैका महामते ॥ ७ ॥ हे महामते! आचार्य अपने सन्निकट आये हुए शिष्य को देखकर विचार करे फिर उसका आशय जानकर उसे दीक्षा प्रदान करे ॥ ७ ॥ शिष्यस्वप्नपरीक्षा अथाऽतीतेऽर्धरात्रे तु उत्थाय शयनाद् गुरुः । कमण्डलुं समादाय बहिराचम्य संविशेत् ॥ ८ ॥ अथातीतेऽर्धरात्रे आचार्यस्य शयनादुत्थानमाचमनं मन्त्रस्नानं मण्डललेखनं प्रत्यूषे नित्यकर्मानुष्ठानं शिष्यस्वप्नपरीक्षां चाह—अथातीतेऽर्धरात्रे त्वित्यादिभिः ॥ ८-१५॥ आचार्य आधी रात बीत जाने पर शयन से उठ जावे। कमण्डल लेकर शयन से बाहर आचमन करे फिर आसन पर बैठे ॥ ८ ॥ संस्मरेदग्रतश्चास्त्रं हुतभुग्राशिसन्निभम्।