सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशः परिच्छेदः ४४७ शतकोटिप्रविस्तीर्णमष्टयोन्यार्धसेवितम् । स्थिरं धराश्रितं भूयो बोद्धव्यं सर्वदैव हि ॥ १८९ ॥ इतना ही नहीं सौ करोड़ विस्तार वाली चौरासी योनियों से सेवित यह स्थिर जगत धरा के ही आश्रित है, ऐसा समझना चाहिये ॥ १८९ ॥ चतुष्कं जाग्रदाद्यं यत् पदानामप्सु वर्तते । मन्त्रकोटिसहस्त्राणां विविधानां महामते ॥ १९० ॥ जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति आदि चतुष्क जल तत्त्व में ही विद्यमान है । हे महामते! योग सिद्धि समेत अनेक प्रकार के करोड़ों सहस्र मन्त्रों की स्थिति तैजसतत्त्व में ही विद्यमान है ॥ १९० ॥ योगसिद्धिसमेतानां संस्थितिस्तैजसे पदे । चातुरात्मीयतत्त्वानां ज्ञेयः कैवल्यदेहिनाम् ॥ १९१ ॥ शान्तोदितस्वरूपाणां सन्निवेशो मरुत्पदे । अनेकशक्तिभूतानां ज्ञानादीनां च लाङ्गलिन् ॥ १९२ ॥ कालानामाश्रयो व्योम या सा मूर्तिर्न लक्ष्यते । संस्थिताश्चादयो वर्णाः पदे षष्ठे तु मानसे ॥ १९३ ॥ कैवल्य देह वाले चतुरात्मीय तत्त्वों की तथा शान्त उदित स्वरूपों की मरुत्पद (वायु) में समझना चाहिये । हे लाङ्गलिन् ! अनेक शक्तियों वाले ज्ञान का तथा काल का आश्रय व्योम है जिसकी मूर्ति दिखाई नहीं पड़ती । अकारादि वर्ण इन पाँचभूतों से अतिरिक्त छठें मानसतत्त्व में स्थित हैं ॥ १९१-१९३ ॥ अस्मिन् मात्रानुरक्तानि कीर्तितेऽस्मिन् षडध्वनि । क्षिपंस्तु चाहरांस्त्वेवं शुद्ध्यर्थं लीलयैव हि ॥ १९४ ॥ स स्थितः कर्मतत्त्वानि बुद्धिशक्तिपदे प्रभुः । निरस्तदोषं कृत्वा प्राक् समाविश्य तदैव हि ॥ १९५ ॥ इसी कहे गये षडध्व में मात्रादिकों का निवास है । भगवान् प्रभु इसी बहुतत्त्व पद में कर्मतत्त्व की शुद्धि के लिये लीलापूर्वक कभी ऊपर फेंक देते हैं, कभी ग्रहण करते हैं और इसे दोषरहित बनाकर फिर इसी में समाविष्ट हो जाते हैं ॥ १९४-१९५ ॥ स्वां शक्तिमुपसंहृत्य शान्तिमभ्येति शाश्वतीम् । मधुसूदनपर्यन्तं पातालशयनादथ ॥ १९६ ॥ सप्तकं सप्तकं षट्कं सम्पश्येत् क्ष्मादिपञ्चके ।