सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४८ सात्वतसंहिता मनस्यवस्थितं ह्येवं शक्तीशात् त्रितयं हि यत् ॥ १९७ ॥ बुद्धौ कमलनाभात्मा देवः सर्वेश्वरः प्रभुः । पुनः स्वसिद्धिर्युक्तानां सर्वेषां पार्थिवे पदे ॥ १९८ ॥ द्विसप्तभेदभिन्ने तु बोद्धव्या संस्थितिः शुभा । तीव्रमन्दादिकं बुद्ध्वा भावं भक्तिसमन्वितम् ॥ १९९ ॥ आलम्बनवशात् कुर्यात् सर्वेषां स्वपदे स्थितिम् । एष वैभवदीक्षायामधिवासनकर्मणि ॥ २०० ॥ साधक इसी में अपनी शक्ति का उपसंहार कर शाश्वती शान्ति प्राप्त करता है । पातालशयन से लेकर पद्मनाभ पर्यन्त ३८ विभव देवता है । वैष्णव साधक पातालशयनादि सात देवताओं को क्ष्मा तत्त्व में, नारायणादि सप्तक को जल तत्त्व में, लोकनाथादि सप्तक को तेजस्तत्त्व में, नारसिंहादि सप्तक को वायुतत्त्व में, क्रोडात्मादि षट्कों को आकाश तत्त्व में, शक्त्यात्मादि त्रिक को मनस्तत्त्व में तथा पद्मनाभ को बुद्धितत्त्व में देखना चाहिए । फिर स्वसिद्धि से युक्त सभी को पार्थिव तत्त्व में देखना चाहिए । इन सभी को चौदह भेद वालों से ही शुभ संस्थिति जाननी चाहिये । साधक भक्ति भाव से समन्वित हो तीव्र मन्दादि का ज्ञानकर आलम्बन वश सबकी अपने पद में स्थिति करे वैभवदीक्षा के अधिवासन कर्म में यह स्थिति कही गई ॥ १९६-२०० ॥ क्रम उक्तस्त्वथेदानीमपरायां निबोधतु । आ पादान्नाभिदेशान्तं महाभूतैर्धरादिकैः ॥ २०१ ॥ व्याप्तं चतुर्था वाय्वन्तैस्तदूर्ध्वं नभसा पुनः । पूरितं हृदयान्तं च तदुद्देशाच्छिखावधि ॥ २०२ ॥ यहाँ तक विभव देवताओं का क्रम कहा गया है । अब अन्यों के विषय में सुनिये । पैर से लेकर नाभि देश तक पृथ्व्यादि से लेकर वायु पर्यन्त चार भूतों से व्याप्त है । इसके बाद शिखा से लेकर हृदय पर्यन्त देश आकाश से व्याप्त है ॥ २०१-२०२ ॥ विभाव्य मनसा व्याप्तमनेनैव क्रमेण तु । स्थिताः सङ्कर्षणान्ताश्चाप्यनिरुद्धादयस्तु वै ॥ २०३ ॥ समाक्रम्याध्वषट्कं तु अध्वातीतस्तु बुद्धिगः । समादायात्मतत्त्वं च प्राग्वदभ्येत्य मूर्तताम् ॥ २०४ ॥ व्यापिका मूर्तयस्त्वेताः पृथग् भक्तिपरायणैः । तदाकारैरसंख्यैस्तु संवृताः क्ष्मावनीषु च ॥ २०५ ॥