सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
४४८ सात्वतसंहिता मनस्यवस्थितं ह्येवं शक्तीशात् त्रितयं हि यत् ॥ १९७ ॥ बुद्धौ कमलनाभात्मा देवः सर्वेश्वरः प्रभुः । पुनः स्वसिद्धिर्युक्तानां सर्वेषां पार्थिवे पदे ॥ १९८ ॥ द्विसप्तभेदभिन्ने तु बोद्धव्या संस्थितिः शुभा । तीव्रमन्दादिकं बुद्ध्वा भावं भक्तिसमन्वितम् ॥ १९९ ॥ आलम्बनवशात् कुर्यात् सर्वेषां स्वपदे स्थितिम् । एष वैभवदीक्षायामधिवासनकर्मणि ॥ २०० ॥ साधक इसी में अपनी शक्ति का उपसंहार कर शाश्वती शान्ति प्राप्त करता है । पातालशयन से लेकर पद्मनाभ पर्यन्त ३८ विभव देवता है । वैष्णव साधक पातालशयनादि सात देवताओं को क्ष्मा तत्त्व में, नारायणादि सप्तक को जल तत्त्व में, लोकनाथादि सप्तक को तेजस्तत्त्व में, नारसिंहादि सप्तक को वायुतत्त्व में, क्रोडात्मादि षट्कों को आकाश तत्त्व में, शक्त्यात्मादि त्रिक को मनस्तत्त्व में तथा पद्मनाभ को बुद्धितत्त्व में देखना चाहिए । फिर स्वसिद्धि से युक्त सभी को पार्थिव तत्त्व में देखना चाहिए । इन सभी को चौदह भेद वालों से ही शुभ संस्थिति जाननी चाहिये । साधक भक्ति भाव से समन्वित हो तीव्र मन्दादि का ज्ञानकर आलम्बन वश सबकी अपने पद में स्थिति करे वैभवदीक्षा के अधिवासन कर्म में यह स्थिति कही गई ॥ १९६-२०० ॥ क्रम उक्तस्त्वथेदानीमपरायां निबोधतु । आ पादान्नाभिदेशान्तं महाभूतैर्धरादिकैः ॥ २०१ ॥ व्याप्तं चतुर्था वाय्वन्तैस्तदूर्ध्वं नभसा पुनः । पूरितं हृदयान्तं च तदुद्देशाच्छिखावधि ॥ २०२ ॥ यहाँ तक विभव देवताओं का क्रम कहा गया है । अब अन्यों के विषय में सुनिये । पैर से लेकर नाभि देश तक पृथ्व्यादि से लेकर वायु पर्यन्त चार भूतों से व्याप्त है । इसके बाद शिखा से लेकर हृदय पर्यन्त देश आकाश से व्याप्त है ॥ २०१-२०२ ॥ विभाव्य मनसा व्याप्तमनेनैव क्रमेण तु । स्थिताः सङ्कर्षणान्ताश्चाप्यनिरुद्धादयस्तु वै ॥ २०३ ॥ समाक्रम्याध्वषट्कं तु अध्वातीतस्तु बुद्धिगः । समादायात्मतत्त्वं च प्राग्वदभ्येत्य मूर्तताम् ॥ २०४ ॥ व्यापिका मूर्तयस्त्वेताः पृथग् भक्तिपरायणैः । तदाकारैरसंख्यैस्तु संवृताः क्ष्मावनीषु च ॥ २०५ ॥
अष्टादशः परिच्छेदः ४४९ प्राक्संख्यासु च तिष्ठन्ति सर्वाः सर्वासु सर्वदा । स्मृत्वा ह्यभेदभावेन षट्कर्मोदकवत् पुरा ॥ २०६ ॥ शिखान्तं क्ष्मादिना तेन सर्वं व्याप्तं विचिन्तयेत् । चतुरात्मानमव्यक्तं शब्दमूर्तिं निराकृतिम् ॥ २०७ ॥ गुणमात्रैर्विभिन्नं च खवत् तत्रैव भावयेत् । अग्राह्येणाथ वपुषा स्वस्वभावमयेन च ॥ २०८ ॥ इसी क्रम से सर्वत्र मन से व्याप्त होने का ध्यान करे । इसी प्रकार अनिरुद्धादि से लेकर सङ्कर्षण पर्यन्त षडध्व का संक्रमित कर स्थित है, जो अध्व से परे है, वह बुद्धिगामी है । आत्मतत्त्व से लेकर प्राग्वत् मूर्त्तता पर्यन्त ये सभी मूर्तियाँ व्यापिका हैं । जो भक्ति परायणों से पृथक् असंख्य उसी आकार में सर्वत्र पृथ्वी में व्याप्त हैं । जो पहली बार कही गई संख्या में सभी सबमें सर्वदा रहती हैं । षट् कर्मोदक भाव से शिखान्त अभेदभाव द्वारा इनका स्मरण कर उन क्ष्मादि से व्याप्त उनका स्मरण करे । फिर उसी में गुण मात्र से विभिन्न निराकृति किन्तु शब्दमूर्त्ति अव्यक्त चतुरात्मा का आकाश के समान ध्यान करे ॥ २०३-२०८ ॥ संक्रान्तेन तु वै बुद्धौ सर्वदैवोदितेन तु । स्वशक्त्या वै ह्यनिच्छातो जीवमादाय सोर्ध्वगम् ॥ २०९ ॥ स्वसामर्थ्यं स्वशक्त्या तत् शान्तात्मास्ते विलाप्य च । शुद्धाशयानां भक्तानां तत्पादैकाभिलाषिणाम् ॥ २१० ॥ तत्सामर्थ्यानुविद्धानां सर्वत्र व्यक्तिमेति च । अतस्तु यद्यत् संवेद्यं हेयं परिमितं त्वपि ॥ २११ ॥ तत्तत् तदात्मनाभ्येति सर्वदा भावितात्मनाम् । इत्यादौ सर्वसामान्यो नित्यो विद्याख्य आश्रयः ॥ २१२ ॥ बोद्धव्यः सोऽपि तदनु ह्यसामान्यतया गतः । आ मोक्षादङ्गभावं च जीवानां स्वयमेव हि ॥ २१३ ॥ वज्रवत् सूक्ष्मरूपेण सम्पूर्णेन महामते । दीक्षाकाले तु शिष्याणां परिज्ञेयं यथोदितम् ॥ २१४ ॥ इसके बाद स्व स्व भावमय अग्राह्य शरीर सर्व दैवोदित बुद्धि में संक्रान्त अपनी शक्ति के अनुसार ऊपर की ओर जाने वाले जीव को लेकर अपनी सामर्थ्य एवं अपनी शक्ति के अनुसार शान्तात्मा में विलीन करे । ऐसा करने से भगवान् के चरण कमलों की अभिलाषा रखने वाले शुद्धाशय भगवत्सामर्थ्य से अनुविद्ध भक्तों के लिये वह सर्वत्र प्रगट हो जाता है । इस कारण जो-जो संवेद्य है, हेय है,
४५० सात्वतसंहिता परिमित है, वह सभी भावितात्मा के लिये स्वयं आ जाता है । इस विद्या नामक आश्रय को जानना चाहिये । हे महामते! इस प्रकार वज्र के समान सम्पूर्ण, सूक्ष्मरूप से जीवों को स्वयं मोक्ष से अङ्गभाव प्राप्त है । जब शिष्य को दीक्षा देनी हो, तब इन सब बातों पर विचार करना चाहिये ॥ २०८-२१४ ॥ एवमेव विजानीयाद् भूयः सौत्रे तु विग्रहे । सप्तधा तु विभज्यादौ सन्धि वै कुङ्कुमादिना ॥ २१५ ॥ चित्रीकृत्य चतुर्देशात् प्रणवाद्यन्तगैस्ततः । स्वनामपदसंयुक्तो ग्रथनीयः स्वकारणैः ॥ २१६ ॥ इस प्रकार शिष्य के सौत्र विग्रह काम में भी विचार करना चाहिये । सूत्र को सात भागों में प्रविभक्त कर उसकी सन्धि को कुङ्कुमादि से चित्रित कर उसके चारों ओर आगे तथा अन्त में प्रणव लिखकर, अपने नाम से संयुक्त कर, उसके कारणों से ग्रथन करे ॥ २१५-२१६ ॥ एवं प्ताप्तिमयैर्भोगैर्हृदा पूर्णान्तिमे कृते । नीत्वा वै मण्डलस्थस्य विभोस्तं सन्निवेदयेत् ॥ २१७ ॥ इस प्रकार प्राप्तमय भोगों से हृदय पर्यन्त ग्रथनों को पूर्ण कर उसे अपने हाथ में लेकर मण्डल पर स्थित भगवान् को निवेदित करे ॥ २१७ ॥ वर्मणाच्छादितं कृत्वा निधाय कलशाग्रतः । सशिष्योऽथार्चनं कुर्यात् पुनर्विश्वात्मनो विभोः ॥ २१८ ॥ प्रदक्षिणैः प्रणामैस्तु नानास्तुतिपदैः सह । तत्रोपलिप्ते भूभागे मण्डलान्तर्गतं बहिः ॥ २१९ ॥ स्थानभेदस्थितं कृत्वा नेत्रहृन्मन्त्रमन्त्रिते । पञ्चगव्ये चरौ दन्तधावने विनियोज्य तम् ॥ २२० ॥ फिर उसे वर्म मन्त्र द्वारा आच्छादित कर, कलश के आगे रख कर, शिष्य के सहित उसका अर्चन करे । तदनन्तर विश्वात्मा विभु की प्रदक्षिण, प्रणाम एवं नाना स्तुति पदों के साथ अर्चन करे । फिर उसी उपलिप्त भू-भाग में मण्डल के भीतर किसी बाहरी स्थान में नेत्र एवं हृदय मन्त्र से अभिमन्त्रित पञ्चगव्य, चरु एवं दन्तधावन में स्थान भेद कर स्थापित करे ॥ २१८-२२० ॥ भुक्तोज्झिते दन्तकाष्ठे कुर्यात् सिद्धिविचारणम् । सौम्यवारुण ईशाने यदि पूर्वदिगाननम् ॥ २२१ ॥ तत्सिद्धिसूचकं विद्धि विपरीतमतोऽन्यथा । तद्ध्वंसनाय जुहुयाद् वीर्यमन्त्रेण वै शतम् ॥ २२२ ॥
अष्टादशः परिच्छेदः ४५१ दन्तधावन करने के पश्चात् जब उसे किसी दिशा में फेंके, तब उससे अपनी सिद्धि का विचार करे । यदि उस दन्तधावन का मुख उत्तर-पश्चिम तथा दक्षिण में हो तो उसे सिद्धि-सूचक समझना चाहिये । यदि उससे विपरीत हो तो अन्यथा फल होता है । उस अन्यथा फल को विनष्ट करने के लिये सौ की संख्या में वीर्यमन्त्र से आहुति प्रदान करे ॥ २२१-२२२ ॥ धूपानुलेपनादीनि रजांसि घटिकादयः । साज्यानि च तिलादीनि योग्यान्यन्यानि लाङ्गलिन् ॥ २२३ ॥ उद्धृत्योत्तरतः कृत्वा वर्मजप्तेन वाससा । अभुक्तेनाहतेनैव त्वाच्छाद्य सुसितेन च ॥ २२४ ॥ समभ्यर्च्यस्त्रमन्त्रेण पुष्पधूपानुलेपनः । क्षान्त्वा स्थलस्थितं देवमग्नौ व कलशे न्यसेत् ॥ २२५ ॥ फिर धूप, अनुलेपनादि चूर्ण घटिकादि (छोटे-छोटे घड़े) घृतयुक्त तिलादि और भी जो उचित हो । हे लाङ्गलिन् सङ्कर्षण ! उसे निकाल कर उत्तर की ओर स्थापित कर कवच मन्त्र से अमुक्त एवं अनाहत, जो पहना हुआ न हो और जो कहीं से कटा-फटा न हो । ऐसे श्वेत वस्त्र से पुष्प, धूप, अनुलेपन द्वारा अर्चना कर क्षमा माँगे । फिर उन सब वस्तुओं को देवता के आगे अग्नि में, अथवा कलश पर स्थापित करे ॥ २२३-२२५ ॥ अथ शुद्धे च भूभागे हृन्मन्त्रितकुशास्तरे । कृत्वा प्राङ्मस्तकं शिष्यं बलजप्ताङ्कुशेन तु ॥ २२६ ॥ हृदाऽवगुण्ठिततनुं मुख्यमन्त्रमनुस्मरन् । स्वापयेत् स्वप्नलाभाय ततो हृन्मन्त्रितैस्तिलैः ॥ २२७ ॥ सिद्धार्थकयुतैस्तस्य निदध्यात् परितो बहिः । सबर्हिः(र्हि)पक्ष्मन्त्रेण प्राग्वद् दिक्ष्वष्टकं न्यसेत् ॥ २२८ ॥ इसके बाद उपलेपनादि से संशुद्ध भू-भाग पर जहाँ हृन्मन्त्र से अभिमन्त्रित कर कुशा का शयन लगाया गया है, बल मन्त्र से जपे गये अङ्कुश के द्वारा उस शिष्य को पूर्वाभिमुख करे । वहाँ मुख मन्त्र का स्मरण करते हुए, उसके शरीर को हृन्मन्त्र से चारों ओर से घेर देवे तथा उसके स्वप्न के लिये चारों ओर बाहर हृदय मन्त्र से अभिमन्त्रित सिद्धार्थक युक्त तिल रख देवे । फिर उसके आठो दिशाओं में मन्त्र से अभिमन्त्रित मोर का पङ्ख रख देवे ॥ २२६-२२८ ॥ प्रदक्षिणेन तच्चापि सितसूत्रेण वर्मणा । चतुर्धा वेष्टयित्वा तु मण्डपान्निष्क्रमेद् बहिः ॥ २२९ ॥
४५२ सात्वतसंहिता फिर श्वेत वर्ण के सूत्र से वर्म मन्त्र के द्वारा चार बार वेष्टित कर स्वयं मण्डप से बाहर निकल आवे ॥ २२९ ॥ दन्तकाष्ठादिकं कर्म विनिष्पाद्य स्वयं स्वपेत् । भूतले दर्भशय्यायां कृत्वा दक्षिणतः शिरः ॥ २३० ॥ संस्पृशन् स्वाङ्घ्रियुग्मेन शिशुं शयनसंस्थितम् । भगवन्तं हि मनसा प्रार्थयन्नपवर्गदम् ॥ २३१ ॥ तदनन्तर स्वयं दन्तकाष्ठ आदि कर्म सम्पादन कर पृथ्वी पर कुशा की शय्या पर दक्षिण दिशा में शिर कर शयन पर सोये हुए उस (शिष्य रूप) शिशु को अपने चरण से स्पर्श करते हुए स्वयं भी शयन करे और मोक्ष देने वाले भगवान् से अपने मन से यह प्रार्थना करे ॥ २३०-२३१ ॥ ओमादिशं जगन्नाथ सर्वज्ञ हृदयेशय । तत्राहं योजयाम्येनं कर्मिणं त्वत्परायणम् ॥ २३२ ॥ हे जगन्नाथ! हे सर्वज्ञ! हे दशो दिशाओं में तथा सभी के हृदय में रहने वाले प्रभो ! मैं आपके में परायण इस कर्मकारी शिष्य को आपके कार्य में लगा रहा हूँ। आज्ञा कीजिये ॥ २३२ ॥ प्राप्तानुज्ञस्तु शिष्याणां कुर्याद् वै तत्र योजनम् । यत्र तत्र च तत् तेषामवश्यं शाश्वतं भवेत् ॥ २३३ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायामधिवासदीक्षाविधिर्नाम अष्टादशः परिच्छेदः ॥ १८ ॥ — 𑁍 — इस प्रकार आज्ञा लेकर शिष्यों को भगवत् कार्यों में योजित करे । जहाँ-जहाँ इस प्रकार शिष्यों का संयोजन किया जाता है, वहाँ-वहाँ अवश्य ही शिष्यों का शाश्वत कल्याण होता है ॥ २३३ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के अधिवासदीक्षाविधि नामक अठारहवें परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ १८ ॥ — 𑁍 —
एकोनविंशः परिच्छेदः दीक्षाविधिः नारद उवाच अधिवासाभिधानेयं पूर्वदीक्षाऽच्युतेन वै। कथिता सीरिणे विप्रास्तेनाऽतश्चोदितः पुनः ॥ १ ॥ अथैकोनविंशः परिच्छेदो व्याख्यास्यते। एवमधिवासदीक्षां श्रुत्वा पुनः सङ्कर्षणः पृच्छतीत्याह—अधिवासेति ॥ १ ॥ नारद जी ने कहा—हे ब्राह्मणो ! इस प्रकार दीक्षा के पूर्व की क्रिया भगवान् ने बलभद्र से कही। तदनन्तर श्री बलभद्र ने भगवान् से कहा ॥ १ ॥ सङ्कर्षण उवाच देव दीक्षाविधानं च त्वद्वक्त्रकमलादहम्। श्रोतुमिच्छामि संक्षेपाद् वैष्णवानां हिताय च ॥ २ ॥ प्रश्नप्रकारमाह—देवेति ॥ २ ॥ सङ्कर्षण ने कहा—हे देव ! अब मैं आप के मुखकमल से वैष्णवों के हित के लिये संक्षेप में दीक्षा विधान सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥ श्रीभगवानुवाच एकानेकस्वरूपां वै दीक्षां संसारिणां शृणु। आसाद्य यां समायान्ति देहान्तेऽभिमतं पदम् ॥ ३ ॥ एवं पृष्टः श्रीभगवान् परव्यूहविभवभेदभिन्नदीक्षात्रयस्य फलभेदानुक्त्वा तत्र दीक्षात्रयेऽप्याचारवतां शिष्याणामधिकारं वृद्धबालाङ्गनानां तु दुश्शकाचारविरहेऽप्य- धिकारं च दर्शयित्वा तेषां तत्तत्फलाभिसन्ध्यनसारेण दीक्षात्रयेऽन्यतमा कर्तव्येत्याह— एकानेकेत्यदिभिः। अत्राशक्तविषये लघुतरानुष्ठानमप्युक्तं जयाख्यलक्ष्मीतन्त्रयोः— महामण्डलयागेन हवनाद्वाऽथ केवलात्। वाचा केवलया वापि दीक्षैषा त्रिविधा पुनः॥
४५४ सात्वतसंहिता वित्ताढ्यस्याल्पवित्तस्य द्रव्यहीनस्य च क्रमात्। (ल० ४१।९-१०) इति ॥ ३-७ ॥ श्री भगवान् ने कहा—हे सङ्कर्षण ! संसारी मनुष्यों के लिये एक अथवा अनेक रूपों में दीक्षा का विधान है। जिसे प्राप्त कर लोग शरीर के अन्त होने पर वाञ्छित फल प्राप्त करते हैं ॥ ३ ॥ कैवल्यफलदाऽप्येका भोगकैवल्यदा परा। भोगदैव तृतीया च प्रबुद्धानां सदैव हि ॥ ४ ॥ एक दीक्षा वह है जो केवल प्रबुद्धों को कैवल्य (मुक्ति) फल प्रदान करती है और अन्य दीक्षा भोग एवं कैवल्य दोनों प्रदान करती है। इसके अतिरिक्त तृतीया दीक्षा वह है जो केवल भोग मात्र प्रदान करती है ॥ ४ ॥ आचार्यानुमताः सर्वाः कार्याः सम्यक् फलाप्तये । भक्तिभावानुविद्धानां शिष्याणां भावितात्मनाम् ॥ ५ ॥ वृद्धानामङ्गनानां च बालानां भावितात्मनाम्। विनाचारसमूहेन दुश्शकेन च ता हिताः ॥ ६ ॥ सभी दीक्षायें सम्यक् फल की प्राप्ति के लिये आचार्य की आज्ञा लेकर लेनी चाहिये । ये सभी दीक्षायें भक्तिभाव से अनुविद्ध अपना कल्याण चाहने वाले शिष्यों, वृद्धों, स्त्रियों, बालकों तथा आचार समूह के पालन में अशक्त किन्तु कल्याणેચ્છु जनों के लिये हितकारी है ॥ ५-६ ॥ पुरा धिया विचार्यैवमुपसन्नेन वै सह। तदीयमाशयं ज्ञात्वा सम्पाद्यैका महामते ॥ ७ ॥ हे महामते! आचार्य अपने सन्निकट आये हुए शिष्य को देखकर विचार करे फिर उसका आशय जानकर उसे दीक्षा प्रदान करे ॥ ७ ॥ शिष्यस्वप्नपरीक्षा अथाऽतीतेऽर्धरात्रे तु उत्थाय शयनाद् गुरुः । कमण्डलुं समादाय बहिराचम्य संविशेत् ॥ ८ ॥ अथातीतेऽर्धरात्रे आचार्यस्य शयनादुत्थानमाचमनं मन्त्रस्नानं मण्डललेखनं प्रत्यूषे नित्यकर्मानुष्ठानं शिष्यस्वप्नपरीक्षां चाह—अथातीतेऽर्धरात्रे त्वित्यादिभिः ॥ ८-१५॥ आचार्य आधी रात बीत जाने पर शयन से उठ जावे। कमण्डल लेकर शयन से बाहर आचमन करे फिर आसन पर बैठे ॥ ८ ॥ संस्मरेदग्रतश्चास्त्रं हुतभुग्राशिसन्निभम्।
एकोनविंशः परिच्छेदः ४५५ तदन्तःस्थं विशेद् देवं स्नानं मान्त्रं कृतं भवेत् ॥ ९ ॥ निद्रामोहमलं येन शश्वदायाति संक्षयम् । शङ्कून् वै घटिकास्तत्र रजांस्यस्त्रवरेण च ॥ १० ॥ समादाय च संस्मृत्य निष्षिष्यार्घ्यैर्महीतले । शुष्कगोमयसंघृष्टे मण्डलं यत् पुरोदितम् ॥ ११ ॥ तदनन्तर सर्वप्रथम प्रज्वलित अग्निराशि के समान अस्त्र मन्त्र का अन्तःकरण से स्मरण करे, फिर मन्त्र स्नान करे जिससे निद्रा मोह और समस्त पाप का संक्षय हो जाता है । फिर अस्त्र मन्त्र पढ़कर शङ्कु (काँटा), घटिका (सूत्र) तथा रंगने वाला चूर्ण उससे, फिर अर्घ्य सिञ्चित शुष्क गोमय से संघृष्ट भूमि पर उस मण्डल का, जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है, निर्माण करे ॥ ९-११ ॥ भद्रत्वपरिरक्षार्थं न्यस्याः कोणेषु शङ्कवः । कमलभ्रमसिद्ध्यर्थमेकं मध्ये निवेश्य च ॥ १२ ॥ मण्डल की रक्षा के लिये उसके चारों कोणों पर खूँटी गाड़ देनी चाहिए । मण्डल के मध्य में कमल का भ्रम उत्पन्न करने के लिये उसके मध्य में एक खूँटी गाड़ देनी चाहिए ॥ १२ ॥ ईषन्न याति वैषम्यं तद् रात्रिसमये यथा । महानूनाधिके दोषः सशिष्यस्य यतो गुरोः ॥ १३ ॥ रात्रि के समय उस मण्डल की रक्षा के लिये जिस प्रकार उसमें कोई विषमता न हो वैसा प्रयत्न करे । क्योंकि उस मण्डल के न्यून होने पर अथवा अधिक होने पर शिष्य सहित गुरु को महान् दोष लगता है ॥ १३ ॥ अतस्तद् रक्षणीयं च यत्नेन महता सदा । निर्वर्त्य नित्यं प्रत्यूषे पुरा वै स्नानपूर्वकम् ॥ १४ ॥ शिष्यमाहूय सञ्छोद्य स्वप्नप्राप्तिं शुभाशुभाम् । इसलिये महान् प्रयत्न के द्वारा मण्डल की रक्षा करे । तदनन्तर प्रातःकाल स्नान कर नित्य कर्मानुष्ठान सम्पादन कर शिष्य को अपने पास बुलावे और शिष्य की स्वप्न प्राप्ति पर शुभाशुभ विचार करे ॥ १४ ॥ शुभाशुभस्वप्नानि चतुर्मूर्तिसमूहं तु यथादिक्संस्थितं तु वै ॥ १५ ॥ पश्येत् पङ्क्तिनिविष्टं च उपविष्टं तु चोत्थितम् । तन्मध्याद् भगवत्तत्त्वमेकं वा भिन्नलक्षणम् ॥ १६ ॥
४५६ सात्वतसंहिता प्रादुर्भावसमूहं च तल्लाञ्छनगणश्च यः । दैवीयं वनितावृन्दं सर्वमेकमथापि वा ॥ १७ ॥ शुभाशुभस्वप्नान्याह—चतुर्मूर्तिसमूहं त्वित्यादिभिः ॥ १५-३३ ॥ चारों मूर्तियों (वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध) इनको अपनी-अपनी दिशाओं में संस्थित स्वप्न में देखे, अथवा एक पङ्क्ति में बैठा हुआ तथा खड़ा देखे, अथवा उनके मध्य में एक भगवत्तत्त्व अथवा भिन्न-भिन्न लक्षण युक्त देखे । उनके प्रादुर्भाव समूह को अथवा उनके चिह्न समूहों को देखे । सभी दैवी वनितावृन्द को अथवा किसी एक को देखे तो उसे शुभावह स्वप्न समझना चाहिये ॥ १५-१७ ॥ भवोपकरणव्रातमशेषं वा पृथक् स्थितम् । रुद्रेन्द्रचन्द्रसूर्याम्बुहुतभुग्वातलक्षणम् ॥ १८ ॥ सभी भवोपकरणों को समूह रूप में, अथवा पृथक्-पृथक् रूप में अवस्थित स्वप्न में देखे । रुद्र, इन्द्र, चन्द्र, सूर्य, जल, अग्नि तथा वात (वायु) का लक्षण देखे ॥ १८ ॥ पञ्चरात्रविदो विप्रा आराधनपरायणाः । त्रयीमुद्घोषयन्तश्च निगदन्तश्च वा द्विजाः ॥ १९ ॥ आराधन में परायण पञ्चरात्रवेत्ता ब्राह्मणों को देखे अथवा उन्हें वेद का उद्घोष करते हुए देखे, अथवा उन्हें वेदपाठ करते स्वप्न में देखे ॥ १९ ॥ यतयः शुद्धसत्त्वाश्च सद्ब्रह्मपदसंस्थिताः । नगस्रक्चन्दनाद्यानि सुगन्धानि तरूत्तमः ॥ २० ॥ विशुद्ध अन्तःकरण वाले अथवा सद् ब्रह्मपद में संस्थित यतियों को यदि स्वप्न में देखे, पर्वत, स्रक् (माला), चन्दनादि सुगन्धित पदार्थों को देखे, या माङ्गलिक अश्वत्थादि वृक्षों को देखे तो वह शुभ होता है ॥ २० ॥ उद्यानवनितारामवापीहर्म्यमहालयाः । फलबीजौषधीः साम्बुकुम्भो वा पाकनिर्गतः ॥ २१ ॥ गोगजाश्च नदी यानं कन्या सालङ्कृता शिशुः । मङ्गल्यगीतिर्मधुरा भेरी वंशश्च वल्लरी ॥ २२ ॥ उद्यान एवं महिलाओं की वाटिका, वापी, ऊँचे-ऊँचे प्रासाद, महालय, फल, बीज, औषधी, सजल घट अथवा उत्तमोत्तम पाक सामग्री, गौ, हाथी, नदी, यान, अलङ्कार युक्त कन्या, शिशु, मधुर माङ्गल्य गीत, नगाड़ा, बाँस या लता देखे तो शुभ होता है ॥ २१-२२ ॥
एकोनविंशः परिच्छेदः ४५७ ससारसं सरः पद्मैः पूर्णं छत्रं सितं ततम् । हेमादिधातवो रत्नजालं गोसम्भवानि च ॥ २३ ॥ नवो नेत्रचयः शुद्धं वस्त्रवृन्दमनाहतम् । राजा पुरोधाः सामन्तो राजपत्नी च दर्पणम् ॥ २४ ॥ तुषारपातः सद्वृष्टिर्महामेघोदयो दिवि । शोणितं चार्द्रमांसानि खप्लुतिर्मदिरालयः ॥ २५ ॥ सत्पक्षिमृगसङ्घातः सुरार्चा चामरं सितम् । एवमादीनि चान्यानि विद्धि सिद्धिप्रदानि च ॥ २६ ॥ सारस युक्त तालाब, अथवा कमलपूर्ण तालाब, ऊपर लगाया गया श्वेत छत्र, सुवर्णादि धातु, रत्नसमूह, पृथिवी से उत्पन्न होने वाले पदार्थ, नवीन नेत्रचय (?), शुद्ध एवं नवीन वस्त्रसमूह, राजा, पुरोहित, मन्त्री, राजपत्नी, दर्पण, बर्फ, उत्तम वृष्टि, आकाश में उदीयमान महामेघ, शोणित आर्द्र, मांस, आकाश में उड़ना, मद्यवान का गृह, उत्तमोत्तम पक्षियों का समूह, उत्तमोत्तम वन्य मृगों का समूह, देव पूजा, श्वेत चामर इसी प्रकार के अन्य माङ्गलिक पदार्थों को स्वप्न में देखें तो वे सिद्धि प्रदान करते हैं ॥ २३-२६ ॥ स्वप्नानि यान्यनिष्टानि तानि मे लेशतः शृणु । म्लानता क्षितिकम्पश्च उपरागोऽतिभीषणः ॥ २७ ॥ नीहार उल्कापातश्च निर्घातश्चित्तभङ्कृत् । गर्तप्रवेशो दध्यन्नं स्विन्नमांसास्य भक्षणम् ॥ २८ ॥ हे सङ्कर्षण ! अब स्वप्न में जो अनिष्टकारी पदार्थ हैं उन्हे संक्षेप में सुनिये । अपने आप को मलीन देखना, भूकम्प, अत्यन्त भीषण उपराग (ग्रहण), नीहार (कुहरा) पात, उल्कापात, बिजली की कड़कड़ाहट जिससे हृदय कम्पित हो जावे, गड्ढे में पतन, दधियुक्त अन्न का भक्षण तथा स्वेद युक्त अन्न का भक्षण देखना अशुभ होता है ॥ २७-२८ ॥ नर्तनं रथविध्वंस आज्यं स्वाङ्गद्विजच्युतिः । खरोष्ट्रं चोत्कटं हास्यं कपिऋक्षाकुलं वनम् ॥ २९ ॥ स्थानं धूमाकुलं दग्धमसिताम्बरवेष्टितम् । शुष्कत्वं सरितादीनां प्रतिस्रोतस्त्वमेव च ॥ ३० ॥ नाचना, रथ का विनाश, घृत, अपने शरीर से दाँत का टूट कर बाहर हो जाना, गदहा, ऊँट, उत्कट (भयानक) हास्य, वानर, भालुओं से परिपूर्ण वन, धूम समूह से व्याप्त स्थान, अपने आप को जले हुए तथा काले वस्त्र से वेष्टित सा० सं० - ३३
४५८ सात्वतसंहिता देखना, नदियों का सूखना तथा उनका प्रतिकूल प्रवाह में प्रवाहित होना ये सब अनिष्टकारी हैं ॥ २९-३० ॥ पोत्यानध्वजच्छत्रतरुभङ्गोऽप्यसिद्धिकृत् । अवतारो नगाद् वृक्षान्नग्नत्वं प्रेतदर्शनम् ॥ ३१ ॥ जहाज का डूबना, यान का विनष्ट होना, ध्वज का टूटना, छत्र का भङ्ग होना तथा वृक्ष का गिरना । ये सभी स्वप्न असिद्धि प्रदान करने वाले होते हैं । वृक्ष से तथा पहाड़ से अपने को नीचे उतरते हुए तथा नङ्गे रूप में देखना, प्रेत दर्शन, ये सभी स्वप्न अमङ्गलकारी होते हैं ॥ ३१ ॥ वसाकज्जलतैलाज्यलेपः सत्कर्दमे स्थितिः । महिषोऽहिर्नरः कृष्णो दक्षिणाशागमः क्षुधा ॥ ३२ ॥ लुञ्चनं नखकेशानामस्थिभङ्गादिकं द्रुतम् । एवमादीनि चान्यानि अशुभानि महामते ॥ ३३ ॥ वसा (चर्बी), काजल, तेल, अथवा घृत का लेप, घोर कीचड में फँसा हुआ होना, भैंसा, साँप, काला पुरुष, दक्षिण दिशा में गमन, अर्धरात्रि में भूख का लगना, नख, केश का लुञ्चन, हड्डी का टूट जाना । इसी प्रकार के अन्य स्वप्न, हे महामते ! अशुभ होते हैं ॥ ३२-३३ ॥ अशुभ स्वप्न शान्तिः प्राप्ते शुभाशुभे स्वप्नेऽप्यभिसन्धाय वै हृदि । औत्सुक्यादशिवध्वंसि पूजाहोमं समाचरेत् ॥ ३४ ॥ अशुभस्वप्ने तच्छान्तिमाह—प्राप्त इति ॥ ३४ ॥ इस प्रकार शुभाशुभ स्वप्न देखने पर साधक अपने हृदय में विचार करे । फिर अशुभ स्वप्न देखने पर उसकी शान्ति के लिये प्रयत्नपूर्वक पूजा एवं होम का आचरण करे ॥ ३४ ॥ कुम्भादिष्वर्चनक्रमः यथोक्तविधिना देवमवतार्य क्रमाद् यजेत् । तर्पयित्वा यथान्यायं पूर्णान्तं चाचरेत् ततः ॥ ३५ ॥ पुनर्यथाक्रमं कुम्भादिष्वर्चनमाह—यथोक्तविधिनेति ॥ ३५ ॥ अथवा दुःस्वप्न शान्ति के लिये पूर्वोक्त विधि से देवाधिदेव विष्णु को कलश से नीचे उतार कर उनका पूजन करे । अथवा शास्त्रोक्त विधि से उनका तर्पण कर पूर्णाहुति करे ॥ ३५ ॥
एकोनविंशः परिच्छेदः ४५९ उपवेशन-निरीक्षणादिसंस्कारकथनम् ईशकोणेऽथवा सौम्ये पदे यागगृहस्य च । मण्डले पूर्वनिर्दिष्टे वृत्ते वा चतुरश्रके ॥ ३६ ॥ स्नातं स्रग्वस्त्रभृच्छिष्यं कृतन्यासं निवेशयेत् । निरीक्ष्य ताड्य सम्प्रोक्ष्य दर्भैरालभ्य पूर्ववत् ॥ ३७ ॥ संस्कृत्य मूर्तिवत् किन्तु अनुग्राह्यं धरागतम् । आपादान्मन्त्रहस्तेन परामृश्याऽथ मूर्धनि ॥ ३८ ॥ स्नातस्यालङ्कृतस्य कृतन्यासस्य शिष्यस्य गोमयलिप्ते मण्डले समुपवेशनं निरीक्षणादिसंस्कारांश्चाह—ईशकोणेति सार्धैस्त्रिभिः । निरीक्षणं नेत्रमन्त्रेण, ताडन- मस्त्राभिमन्त्रिततिलसिद्धार्थैः, प्रोक्षणमस्त्राम्भसा, दर्भैरालभनम्, पीठं तेनास्त्रमन्त्रेण, मूर्तिवत् संस्कारो मन्त्रन्यासैरिति ज्ञेयम् । मन्त्रहस्तेन = प्रधानमन्त्रत्वेन भावितनिज- दक्षिणहस्तेनेत्यर्थः ॥ ३६-३९ ॥ तदनन्तर यागगृह के पूर्वनिर्दिष्ट गोमयानुलिप्त गोलाकार अथवा चौकोर मण्डल के ईशानकोण में, अथवा उत्तर दिशा में स्नान किये हुए वस्त्र माला से विभूषित शिष्य को बैठावे । नेत्र मन्त्र से उसका निरीक्षण करे और अस्त्राभिमन्त्रित तिल तथा श्वेत सर्षप से उसका ताडन करे । फिर जल से प्रोक्षण करे और दर्भ से आलम्भन करे । मूर्त्ति के समान मन्त्रन्यास कर उसका संस्कार करे । फिर प्रधान मन्त्र से अभिमन्त्रित अपने दाहिने हाथ से शिष्य के पैर से लेकर मस्तक तक शरीर का स्पर्श करे ॥ ३६-३८ ॥ मन्त्रहस्तं ज्वलद्रूपं दद्याद् यो दुःखबीजजित् । तमादाय कराद् देवधामसन्त्रिकटं व्रजेत् ॥ ३९ ॥ आचार्य द्वारा ज्वलद्रूप वाले जिस मन्त्रहस्त से शिष्य का स्पर्श किया जाता है वह हाथ समस्त दुःख के बीजों को नष्ट करने वाला होता है । इसके बाद आचार्य शिष्य का हाथ पकड़कर देवधाम के सन्निकट में ले जावे ॥ ३९ ॥ शिष्यस्य वैष्णवनामकरणकथनम् कृत्वात्मनो वामभागे भूयः संछाद्य लोचने । प्रक्षेपयेत् तथा सार्घ्यमञ्जलिं मुक्तलोचनम् ॥ ४० ॥ सम्पश्येत् परमं धाम मान्त्रमच्छफलप्रदम् । तस्मिन्नवसरे कुर्यान्नाम यस्य यथोचितम् ॥ ४१ ॥ अथ शिष्य वैष्णवनामकरणविधानमाह—तमादायेत्यारभ्य दासान्तं शूद्रजन्मना- मित्यन्तम् । अस्मिन्नवसरे शिष्यस्य नामकरणात् पूर्वं सुदर्शनपाञ्चजन्यधारणमूर्ध्वपुण्ड्र-
४६० सात्वतसंहिता धारणं च कार्यम्, यतः—‘‘तापः पुण्ड्रस्तथा नाम मन्त्रो यागश्च पञ्चमः’’ (ई०सं० २१।२८४) इति तयोर्नामकरणात्प्राक्कालीनत्वमुक्तम् । किञ्च, ‘‘पञ्चलोहमयं चक्रं सशङ्खं द्वादशारकम्’’ (१८।३५) इति पूर्वं सम्भारार्जनप्रकरणोक्ताभ्यां शङ्खचक्राभ्यां तापस्त्ववसरान्तरे(न?ण) प्रतिपादितश्च । ननु सम्भारार्जनप्रकरणे चक्रशङ्खौ नहि तापार्थं प्रतिपादितौ, अपि तु— मुद्रावसानं कृत्वैवं सम्यक् तदनु चाहरेत् ।। पाणिभ्यां शङ्खचक्रे द्वे स्वमन्त्रेणाभिमन्त्रिते । भूत्वा तदात्मना पश्चात् ते निधाय धरातले ।। अवलोक्याखिलं तत्स्थं प्रवर्तेताथ कर्मणि । (१८।५९-६१) इत्येतावन्मात्रोपयोगार्थं प्रतिपादिताविति चेत्, कस्तावता भवतो विरोधः, प्रसिद्धे तापेऽप्युपयुज्येतां नाम । न च वेदविरुद्धत्वमेव मम विरोध इति वाच्यम्, तस्य वेदोक्तत्वे परश्शतप्रमाणानि सच्चरित्ररक्षायां तप्तमुद्राविद्रावणविद्राविण्यां सिद्धान्त- चन्द्रिकायां च प्रतिपादितानि । सावधानं पश्यतु भवान् । अत एव वेदमूलेऽस्मिन्नपि तन्त्रे द्वादशपरिच्छेदे— नास्त्रैर्वस्त्रैर्ध्वजैर्येषां व्यक्तिर्व्यक्ता जगत्त्रये ।। तेऽपि लाञ्छनवृन्दं तु धारयन्त्यङ्घ्रिगोचरे । ललाटे चांसपट्टे तु पृष्ठे पाणितलद्वये ।। तनूरुहचये मूर्ध्नि कर्मिणां प्रतिपत्तये । अपि संसारिणो जन्तोः स्वभावाद् वैष्णवस्य च ।। न जहात्याच्युतं लिङ्गं किं पुनर्विभवाकृतेः । (१२।१६८-१७१) इति वैष्णवभगवल्लाञ्छनधारणं सुस्पष्टं प्रतिपादितम् । किञ्च, एतद्वचनस्य सहजलाञ्छनपरत्वभ्रमोऽपि सच्चरित्ररक्षायामेव (पृ० ४३) निवारितः । नन्वस्तु नाम सुदर्शनपाञ्चजन्यधारणं प्रमाणसिद्धम्, तदिदानीमेव दीक्षाप्रकरणे कार्यमिति कोऽयं नियमः । तथा नियमे नामकरणवत् तदपि भगवतैव कण्ठरवेणोक्तं भवेत् । जयाख्यलक्ष्मीतन्त्रपाद्मादिष्वपि नहि तद्दीक्षाङ्गत्वेन प्रतिपादितमिति चेत्, सत्यम् । दीक्षाङ्गमिति केनोक्तम् । पूर्वमप्राप्तशङ्खचक्रलाञ्छानानामेव, ‘‘पञ्चलोहमयं चक्रं सशङ्खं द्वादशारकम्’’ (१८।३५) इति सम्भारप्रकरणे प्रतिपादितम् । उत्तरत्रा- चार्याभिषेकानन्तरं शिष्यायाचार्यलाञ्छनप्रदानसमयेऽपि—‘‘स्रुक्स्रुवौ योगपट्टं च शङ्ख-चक्रे कमण्डलुम्’’ (२०।९६) इति वक्ष्यति । किन्तु चक्रा(ङ्क?ङ्क) नादीनां दीक्षायाः पूर्वमेव मुख्यकालत्वाद् गौणकाले दीक्षामध्ये तन्न प्रतिपादितम् । ईश्वरतन्त्रे तु गौणकाल एव प्रतिपादितम् । नहि तत्र दीक्षाकाले प्रतिपादितत्वमात्रेण तत्तदानीमेवानु- ष्ठेयमिति नियमोऽस्ति, शङ्खचक्रधारणस्य जातकर्मनामकरणादिकालेषूपनयनात् पूर्व- मुपनयनानन्तरं विवाहाद्यनन्तरं वा कर्तव्यत्वेन बहुविधसमयानां तत्र तत्र प्रतिपादि- तत्वात् । दीक्षाकालस्तु सर्वथा नोल्लङ्घनीयः । यतः पारमेश्वरे प्रतिष्ठाध्याये— एवं तदीया विप्राश्च क्षत्रिया वैश्यजातयः ।।
एकोनविंशः परिच्छेदः ४६१ मौद्गल्याद्यास्तथान्ये च न तच्चिह्नविवर्जिताः । भवेयुः सर्वथा तस्माच्छङ्खचक्रगदाम्बुजः ॥ लोहैर्नलसन्तप्तैस्तत्तन्मन्त्राधिवासितैः । पूजितैरर्घ्यगन्धाद्यैरङ्कितव्याः क्षणेन तु ॥ त्रय्यन्तज्ञानसम्पन्ना यथोक्ताचारनिष्ठिताः । विप्राद्यास्ते च शूद्राश्च यदैव कृतलक्षणाः ॥ तदा तु योग्या विज्ञेयाः समयश्रवणादिषु । (१५।१६१-१६५), इति कृतलक्षणानामेव दीक्षायां योग्यता प्रतिपादिता । नन्वेवम्— सुदर्शनं धारयित्वा वह्नितप्तं द्विजोत्तमः । उपनीय विधानेन पश्चात् कर्मसु योजयेत् ॥ इति कृतलक्षणस्यैव गायत्रीग्रहणादिकर्मयोग्यत्वं प्रतिपाद्यते, भुजे चक्रं द्विजातीनां शिरश्चक्रं तु दैवतम् । अचक्रद्विजदेवानां पूजा दानं च निष्फलम् ॥ इत्युक्त्याऽकृतलक्षणस्य कन्यादानाद्यर्हत्वमपि नास्ति, अतश्चक्रादिलाञ्छने उप- नयनविवाहकालावान्यनुलङ्घनीयाविति चेत्, कस्येष्टं तदुल्लङ्घनम् । अनुपपत्तिवशात् स्मार्तसंस्कारोल्लङ्घनेऽपि दीक्षाख्यवैष्णवसम्प्रदायकालः सर्वथाऽनुलङ्घनीय इति निर्णयः । यतः पाद्मे— "चक्रेणैवाङ्कितो विद्वान् वासुदेवं समाश्रयेत्" इति प्रतिपाद्यते । अत एवेश्वरे दीक्षाकालस्याप्युल्लङ्घनभिया तत्रकरण एव चक्राङ्कनादिकमुक्तम् । तत्पूर्वमेव कृतचक्राङ्कनानां तु दीक्षाकाले तन्न प्रकृतम् । आचारे सति पुनर्दीक्षाकाले तत्रकरणेऽपि न प्रत्यवायः, चक्रादि धारयेद् विप्रो ललाटे मस्तके भुजे । पातकादिविशुद्ध्यर्थं भवक्लेशविनाशनम् ॥ इत्यादित्यपुराणादिषु शुद्ध्यपादकत्वेन च प्रतिपादनात्, पूर्वं कृतलाञ्छनस्य देहोपचयादिना मलिनत्वे पुनः स्फुटत्वसिद्धेश्च । ननु— विष्णवागमादितन्त्रेषु दीक्षितानां विधीयते । शङ्खचक्रगदापूर्वैरङ्कनं नान्यदेहिनाम् ॥ इत्यादिवचनैर्दीक्षानन्तरमपि चक्राङ्कनमवगम्यत इति चेन्न, दीक्षितानामित्यस्य दीक्षार्हपरत्वात् । सिद्धान्तचन्द्रिकायां तु दीक्षितानामित्यस्य मुमुक्षुपरत्वमुक्तम् । तद- संगतम्, तन्त्रदीक्षाप्रवेशभिया तादृशार्थाङ्गीकरणात् । निर्निमित्तेयं भीतिः । यतो महा- भारते शान्तिपर्वणि— अवश्यं वैष्णवो दीक्षां प्रविशेत् सर्वयत्नतः । दीक्षिताय विशेषेण प्रसीदेन्नान्यथा हरिः ॥ वसन्ते दीक्षयेद् विप्रं ग्रीष्मे राजन्यमेव च । शरदः समये वैश्यं हेमन्ते शूद्रमेव च ॥
४६२ सात्वतसंहिता स्त्रियं च वर्षकाले तु पञ्चरात्रविधानतः । इति ब्राह्मणादीनां सर्वेषामप्यविशेषेण तन्त्रदीक्षाप्रवेशो विधीयते । एतद्वचना- नामधिकारिविशेषत्वे कथिते विनिगमनाविरहेण— ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैश्च कृतलक्षणैः । अर्चनीयश्च सेव्यश्च नित्युक्तैः स्वकर्मसु ॥ (द्वापरस्य युगस्यान्ते आदौ कलियुगस्य च) सात्वतं विधिमास्थाय गीतः सङ्कर्षणेन यः ॥ —(महा० भा० भीष्म पर्व ६६।३९-४०) इति महाभारतभीष्मपर्ववचनानामप्यधिकारिविशेषपरत्वमेव संभवति । संभवतु नाम, तावताऽस्माकं का हानिरिति चेत्, आचार्योक्तिविरुद्धं वचो मा वोचः, पञ्चरात्ररक्षायां ह्येतद्भीष्मपर्ववचनान्युदाहृत्य—‘‘एवमविशेषेण सर्वेषां ब्राह्मणादीनां श्रीमत्पञ्चरात्रोक्तमार्गेण भगवदर्चनादिकं कर्तव्यम्’’ (पृ० २१) इत्यभिहितत्वात् । ‘‘सर्वसूत्रनिष्ठानामपि भगवच्छास्त्रोक्तप्रक्रियया समाराधनादिकं प्रशस्ततमम् । तथा च शिष्टैरनुष्ठीयते’’ (पृ० २१) इति सिद्धान्तितम् । तत्रैव द्वितीयाधिकारेऽपि (पृ० ५६) श्रीमद्भाष्यकार-प्रभृतिभिः श्रीपाञ्चरात्रे यत्किञ्चित् सिद्धान्तस्थां काञ्चित् संहितां प्रधानीकृत्य नित्याराधनं संगृहीतमित्यपि प्रतिपादितम् । अतस्त्वेकत्र निर्णीतोऽर्थः सर्वत्रेति न्यायेन दीक्षाप्रवेशविधायकशान्तिपर्ववचनानामप्यविशेषेण सर्वजनविषयत्वं बोध्यम् । एतादृशे पञ्चमवेदवचने जागरूके सति भवतां तत्र दीक्षाप्रवेशे का भीतिः । तन्त्रदीक्षामन्तरा तदुक्तभगवदर्चनादौ भवतामधिकारः कथं सिद्ध्यति? अन्येषां ब्राह्मणादीनां वर्णानां दीक्षया क्रमात् । अधिकारोऽनुलोमानापि नान्यस्य कस्यचित् ॥ पूजाविधौ भगवतस्तेऽनुकल्पाधिकारिणः । इति पाद्मादिषु दीक्षितानामेव हि भगवदर्चनाधिकारः श्रूयते । किञ्च, अत्रापि द्वितीये परिच्छेदे—‘‘चतुर्णामधिकारो वै वृत्ते दीक्षाक्रमे सति’’ (२।९२) इति प्रतिपादितम् । इदं परार्थयजनविषयमिति मावोचः, चतुर्वर्णानामविशेषेणाधिकार- वर्णनात् । यद्यपि भवद्भिरपि सिद्धान्तचन्द्रिकायाम्—‘‘वैखानसाद्यागमोक्तदीक्षां प्राप्तो हि वैष्णवः’’ इत्यत्र, तन्त्रदीक्षां विना यस्तु शङ्खचक्रादिलाञ्छनम् । बिभर्ति स तु पाषण्डो विज्ञेयस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ इत्यत्र च तन्त्रदीक्षाऽङ्गीकृतैव, तथापि यावदर्थानुष्ठानभिया दीक्षाशब्दस्य देवतान्तरपरित्यागरूपनियमपरिग्रहमात्रपरत्वमुक्तम् । महाभारतादिवचनपर्यालोचनया दीक्षाप्रवेशे मा भीति भजन्तु भवन्तः । अलं प्रसक्तानुप्रसक्त्या । प्रकृतमनुसरामः । एषां चक्राङ्कनादिसंस्काराणां दीक्षाकालेऽनुष्ठानक्रम ईश्वरसंहितायां सम्यक् प्रतिपादितः । पृथक्कालेऽनुष्ठानेऽपि स एव क्रमोऽनुसरणीयः । तदानीमग्निस्तु— विष्णोरायतनाग्नौ वा गुरोरात्मनः एव वा ।
एकोनविंशः परिच्छेदः ४६३ हुते होमादिभिस्तप्तैः सुरूपैरर्चितैः क्रमात् ॥ दासभूतं यदात्मानं बुद्ध्येत परमात्मनः । तदैव गात्रं कुर्वीत शङ्खचक्रादिलाञ्छितम् ॥ (३।६२-६३) इति भारद्वाजसंहितोक्तो ग्राह्यः । तत्र विष्ण्वायतनाग्निवैष्णव एव । गुरोरा- त्मनो वाऽग्निश्चेत्, स्वगृह्योक्तप्रतिष्ठापूर्वकमीश्वरतन्त्रोपबृंहितवैष्णवीकरणप्रक्रियया संस्कार्यः । ऊर्ध्वपुण्ड्रधारणमपि चक्राङ्कनानन्तरमेव कार्यम् । नाममन्त्रयागाख्य- संस्कारत्रयं तु दीक्षाकाल एवानुष्ठेयम्, तस्य दीक्षाङ्गत्त्वेनैव प्रतिपादितत्वात् । ननु तर्हि पञ्चसंस्काराणां यौगपद्येनानुष्ठानं न संभवतीति चेत्, किं तावता प्रत्यवायः । जातस्य कुमारस्य द्वादशेऽहनि नामकरणप्रकरणे शङ्खचक्राङ्कनं शास्त्रे- षूच्यते । तथैव शिष्टैरनुष्ठीयते, द्वादशेऽहनि पुत्रस्य केशवो बन्धुभिः सह । तेन श्रीशैलपूर्णेन गुरुणाऽमिततेजसा ॥ शङ्खचक्राङ्कनं पूर्वं कारयित्वाऽथ लीलया । लोके रामानुज इति नाम चक्रे सुमङ्गलम् ॥ (२।३८-३९) इति प्रपन्नामृतादिषु श्रीभाष्यकारादिशिष्टाचारोऽप्युद्घुष्यते च । अतो न पञ्च- संस्काराणां यौगपद्येनानुष्ठाननियमोऽस्ति । ननु तदानीं तेषां यौगपद्येनानुष्ठानासंभवेऽपि पुनरुपनयनानन्तरं विवाहानन्तरं वा पञ्चसंस्काराणां यौगपद्येनानुष्ठानं संभवति, तथैव भाष्यकारादिशिष्टाचारश्च प्रतिपादित इति चेत्, सत्यम् । अत एव हि दीक्षाकाले तेषां पुनःकरणे हेतुः पूर्वमस्माभिरपि प्रति- पादितः ॥ ३९-४६ ॥ फिर उसे अपनी बाईं ओर स्थापित कर उसके दोनों नेत्रों को वस्त्र से आच्छादित करे । फिर उसकी आँखे खोलकर उसके हाथों से अर्घ्य युक्त पुष्पाञ्जलि प्रक्षिप्त करावे । फिर वह शिष्य उन परमधाम भगवान् का दर्शन करे, जो मन्त्र के द्वारा सर्वोत्तम फल प्रदान करने वाले हैं । उसी समय आचार्य उस शिष्य का, वह जैसा जिस वर्ण का है उसका, वैसा ही उसी वर्ण के अनुसार यथोचित नामकरण करे ॥ ४०-४१ ॥ रहस्यसंज्ञं मुख्यं च गौणं वास्य यथास्थितम् । सामान्यं वासुदेवाद्यं नाम स्वाङ्गाच्चतुर्ष्वपि ॥ ४२ ॥ सर्वेषां सविशेषं वा यथा चानुक्रमेण तु । द्विषट्कमूर्त्यङ्कितं च स्वाम्यन्तं ब्राह्मणेषु च ॥ ४३ ॥ रहस्य संज्ञा वाला, अथवा मुख्य, अथवा गौण, अथवा यथास्थित (जैसा है) वैसा नामकरण करे, अथवा चारों वर्णों का वासुदेवादि सामान्य नामकरण करे । अथवा क्रमानुसार सभी चारों वर्णों का विशेषता युक्त नामकरण करे । ब्राह्मण शिष्य को १२ मूर्तियों से अङ्कित कर स्वाम्यन्त नामकरण करे ॥ ४२-४३ ॥
४६४ सात्वतसंहिता देवान्तं क्षत्रियाणां च कुर्याद् द्वादशधा पुनः । पाण्यन्तं धारनिष्ठं वा लाञ्छनास्त्रपुरस्सरम् ॥ ४४ ॥ ध्वजलाञ्छनसंज्ञं च यथावस्थं नृपेषु च । एवं वर्धननिष्ठं च मूर्तिलाञ्छनपूर्वकम् ॥ ४५ ॥ विहितं चापि वैश्यानां दासान्तं शूद्रजन्मनाम् । फिर क्षत्रियों को भी १२ मूर्त्तियों से लाञ्छित कर देवान्त नामकरण करे, अथवा अस्त्र लाञ्छन पुरस्सर पाण्यन्त, अथवा धारनिष्ठ नामकरण करे । राजाओं का यथावस्थ ध्वज लाञ्छन संज्ञक नामकरण करे । इसी प्रकार मूर्त्ति लाञ्छनपूर्वक वैश्य का 'वर्धन' निष्ठ नामकरण करे (आनन्दवर्धनादि) । शूद्र का दासान्त नामकरण करे ॥ ४४-४६ ॥ भूतशोधनकथनम् अथोत्थाय नमस्कृत्य मण्डलं कलशं गुरुम् ॥ ४६ ॥ यायात् कुण्डसमीपे तु शिशुना सह देशिकः । कृतस्य कर्मणोऽच्छिद्रसिद्धये च हुते सति ॥ ४७ ॥ सन्ताड्यास्त्रात्मको भूत्वा प्राग्वत् तद्धृदयं विशेत् । प्राणशक्तिवियुक्तं च कृत्वानीय समासतः ॥ ४८ ॥ सम्प्रवेश्य स्वकं स्थानं तत्राग्निकणवच्च तम् । नीत्वा सम्यक् पृथग्भावं विरेच्य सह वायुना ॥ ४९ ॥ स्वभूमौ वाममार्गेण हृदाद्यन्तं निरोधितम् । जन्मग्रहमनेनैव मन्त्रयुक्तेन कर्मणा ॥ ५० ॥ भावध्यानानुविद्धेन पितृमातृमयं त्यजेत् । ततो मण्डलसमीपादुत्थाय गुरुदेवनमस्कारं कृतवता शिष्येण सह कुण्ड- समीपं गत्वा प्रायश्चित्तहोमानन्तरमस्त्राभिमन्त्रितसिद्धार्थादिभिः शिष्यसन्ताडनं दहना- प्यायनाख्यधारणाद्वयेन तद्भूतशोधनं च कुर्यादित्याह—अथोत्थायेति पञ्चभिः श्लोकैः ॥ ४६-५१ ॥ इसके बाद शिष्य मण्डल, कलश, तथा गुरु को नमस्कार करे । तदनन्तर आचार्य उस अपने शिष्य के साथ कुण्ड के समीप में जावे और किये हुए कर्म की निर्दोषता सिद्धि के लिये प्रायश्चित्त हवन करने के पश्चात् अस्त्राभिमन्त्रित तिल एवं श्वेत सर्षप से शिष्य का सन्ताडन करे । फिर अस्त्रात्मक होकर उसके हृदय में प्रवेश करे । उसको प्राणशक्ति से विमुक्त कर बाहर निकाल कर अपने स्थान में प्रविष्ट कराकर अग्निकण से उसे जला देवे । फिर वायु के द्वारा उसके भस्म को उड़ा देवे । तदनन्तर वाममार्ग से हृदय स्थान में ले जाकर उस अपने स्थान
एकोनविंशः परिच्छेदः ४६५ पर स्थापित करा देवे । इस प्रकार मन्त्र से युक्त कर्म द्वारा उसका पुर्नजन्म करा देवे ॥ ४६-५० ॥ फिर शिष्य भावना के ध्यान से युक्त होकर अपने पितृ मातृ युक्त इस जगत् का त्याग कर देवे । (यहाँ तक शिष्य के भूतशोधन की प्रक्रिया कही गई) ॥ ५१ ॥ ततः कवचमन्त्रेण दद्यात् सप्ताभिमन्त्रितम् ॥ ५१ ॥ तस्योपवीतमपरमुदितं चापि यस्य यत् । उपवीतधारणार्हस्य त्रैवर्णिकस्य शिष्यस्य नूतनोपवीतधारणमाह—तत इति ॥ ५१-५२ ॥ सर्वदा दासभावत्वमापन्नस्य च तत्त्वतः ॥ ५२ ॥ अमद्यापाऽन्योत्यस्य लोकधर्मोज्झितस्य च । आप्तवद् ब्रह्मनिष्ठस्य कर्मतन्त्ररतस्य च ॥ ५३ ॥ गोदानं शूद्रजातेर्वै विहितं चैव नान्यथा । योग्यस्य शूद्रस्य तु गोदानं विहितमित्याह—सर्वदेति द्वाभ्याम् ॥ ५२-५४ ॥ वौषट्स्वाहावषट्कारनिष्ठानां तु प्रतिक्रिया ॥ ५४ ॥ नमस्कारेण मन्त्राणां कार्ये प्राप्ते ह्यनुग्रहे । तदीयमर्घ्यपुष्पाद्यं यत्किञ्चिद् यागसाधनम् ॥ ५५ ॥ सुसंस्कृतमसिद्धं वा भक्त्या कर्मण्यतां व्रजेत् । शूद्रस्य वषकाराद्यनर्हत्वान्मन्त्रशरीरे तत्प्रतिनिधित्वेन नमस्कारो योज्य इत्याह— वौषडिति । पाद्मे तु— द्वादशाक्षरमादौ तु पश्चादष्टाक्षरात्मकम् । मूर्तिमन्त्रांश्च तदनु समध्याप्य यथाविधि ॥ केवलं वैष्णवं नाम नमःप्रणववर्जितम् । हुंफडादिवषट्स्वाहावर्जितं केशवादिकम् ॥ अध्याप्य स्त्रीषु शूद्रेषु तद्देवानुलोमजे । सावित्रीं येऽनुतिष्ठन्ति तेषां विप्रवदिष्यते ॥ इति शूद्रादीनां प्रणवनमस्कारावपि निषिद्धौ । अन्यत्र— न स्वरः प्रणवोऽङ्गानि नाप्यन्यविधयः स्मृताः । स्त्रीणां च शूद्रजातीनां मन्त्रमात्रोक्तिरिष्यते ॥ इति प्रणवमात्रं निषिद्धम् । अतः संहिताभेदेन व्यवस्था ज्ञेया । पुष्पाञ्जल्यादि- समर्पणार्थं शूद्राहृतं पुष्पादिकमपि तद्भक्तिवशेन कर्मार्हं भवतीत्याह—तदीय- मिति ॥ ५४-५६ ॥
४६६ सात्वतसंहिता
इसके बाद आचार्य उपवीत धारण करने योग्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन
तीन वर्णों को नूतन यज्ञोपवीत धारण करावे । यतः तत्त्वतः दास भाव को प्राप्त
होने वाले, मद्यपान रहित वंश में उत्पन्न हुए, लोकधर्म से बाहर हुए, किन्तु आप्त
के समान ब्रह्मनिष्ठ होने वाले कर्मतन्त्र में निरत शूद्र को दक्षिणा दान की विधि
नहीं है इसलिये वह गोदान का अधिकारी है । दक्षिणादि दान का अधिकारी नहीं
है । उसे वौषट्, स्वाहा, वषट्कार का अधिकार भी नहीं है इसलिये वह कार्य
प्राप्त होने पर मन्त्रों को नमस्कार मात्र करे । शूद्र द्वारा लाया गया पुष्पादिक भक्ति
युक्त होने के कारण कर्मार्ह हो जाता है ॥ ५१-५६ ॥
अतोऽन्येषां तु भक्तानां विहिता यागसाधने ॥ ५६ ॥
सम्यक् सत्त्वनिवृत्तिः प्राग् दर्शनप्रोक्षणान्वितम् ।
एवं त्रैवर्णिकानामपि यागसाधनद्रव्येषु स्वीयत्वाभिमाननिवृत्तिर्विहितेत्याह—
अतोऽन्येषामिति त्रिभिः पादैः ॥ ५६-५७ ॥
इसी प्रकार त्रैवर्णिकों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) द्वारा लाये गये यज्ञ साधन
द्रव्यों के दर्शन एवं प्रोक्षण से युक्त हो जाने पर उनके द्वारा स्वत्वाभिमान की
निवृत्ति भी विहित है ॥ ५६-५७ ॥
पुष्पाञ्जलिसमर्पणम्
मूर्तौ वा मण्डलाग्रे तु पुष्पक्षेपं महामते ॥ ५७ ॥
नक्तं वा परिपीडं च व्रतार्थं त्वेकमेव हि ।
शिष्यैः पुष्पाञ्जलिसमर्पणं बिम्बाग्रे मण्डलाग्रे वा कार्यमित्याह—दर्शनेति त्रिभिः
पादैः । दर्शनं नेत्रमन्त्रेणावलोकनमित्यर्थः । अनेन दीक्षाकाले मण्डलबिम्बयोरन्य-
तरार्चनं सूच्यते ॥ ५७ ॥
हे महामते ! शिष्य को पुष्पाञ्जलि समर्पण बिम्ब के अग्रभाग में अथवा मण्डल
के अग्रभाग में करना चाहिये । साधक दीक्षा में व्रत के लिये शुद्ध उपवास करे
अथवा रात में नक्त (दिन के अष्टम भाग में) एक बार भोजन करे ॥ ५७-५८ ॥
एवं संस्कारसंशुद्धं कृत्वा वर्णगणं पुरा ॥ ५८ ॥
साङ्गेन विभुना कुर्यात् तत्प्रायश्चित्ततर्पणम् ।
सदशांशं सहस्रं तु यथा चानुक्रमेण तु ॥ ५९ ॥
गत्वाऽभ्यर्च्य च कुम्भेशं सूत्रमादाय तत्स्थितम् ।
ऋजुभूतं शिशुं कृत्वा तद्वत् सूत्रं प्रसार्य च ॥ ६० ॥
दीक्षाव्रतार्थं शुद्धोपोषhost/शुद्धोपोषhost -> दीक्षाव्रतार्थं शुद्धोपोषhost? No, दीक्षाव्रतार्थं शुद्धोपोषणं नक्तभोजनं वा विहितमित्याह—नक्तमित्यर्धेन ।
एवं ब्राह्मणादीनां संस्कारानन्तरं वर्णानुक्रमेण साङ्गमूलमन्त्रैः सदशांशसहस्र-
एकोनविंशः परिच्छेदः ४६७ संख्यया प्रायश्चित्तहोमं कुम्भस्थितभगवदभ्यर्थनपूर्वकं तत्समीपस्थापितमायासूत्र- ग्रहणम् ऋजुभूतस्य शिष्यस्या पादाच्छिखान्तं तत्सूत्रप्रसारणं चाह—एवमिति सार्ध- द्वाभ्याम् ॥ ५८-६० ॥ सूत्रप्रसारणम् व्यक्तस्वरूपं च मन्त्रेशं संस्मरेदग्निमध्यगम् । पश्येद् विभौ शिशौ सूत्रे स्वात्मन्यध्वानमञ्जसा ॥ ६१ ॥ अग्निमध्ये व्यक्तस्वरूपं भगवन्तं संस्मृत्य तस्मिन् भगवति शिशौ सूत्रे स्वात्मनि चाध्वानं स्मरेदित्याह—व्यक्तेति ॥ ६१ ॥ इस प्रकार आचार्य ब्राह्मणादिकों के संस्कार हो जाने के उपरान्त वर्णानुक्रम से साङ्गमूल मन्त्र द्वारा दशांश सहित सहस्र संख्या में प्रायश्चित्त होम करे । फिर कुम्भ स्थित भगवान् की प्रार्थना कर उनके समीप में स्थापित सूत्र ग्रहण करे । सर्वप्रथम सीधे खड़े हुए शिष्य के पैर से लेकर शिरोभाग पर्यन्त सूत्र को प्रसारित करे और शरीर के नाप के अनुसार उसे पहनावे । तदनन्तर अग्नि के मध्य में स्थित प्रत्यक्ष मन्त्ररूप से स्थित मन्त्रेश का स्मरण करे । फिर भगवान् में, शिष्य में, सूत्र में तथा अपने में अकस्मात् अध्वा का दर्शन करे ॥ ५८-६१ ॥ तत्राध्यात्मस्वरूपं च संस्मरेन्मन्त्रदेहगम् । अधिदैवस्वभावं च तत्स्वात्मन्यवतार्य च ॥ ६२ ॥ अधिभूतमयं सूत्रे त्रिविधं शिष्यविग्रहे । अध्वस्मरणक्रममाह—तत्रेति सार्धेन । त्रिविधम् अध्यात्मादिदैवाधिभूतभेद- भिन्नस्वरूपमित्यर्थः ॥ ६२-६३ ॥ मूलमन्त्रावसाने तु सनमस्कं परात्मने ॥ ६३ ॥ पदं कृत्वा तु जुहुयादाहुतीनां चतुष्टयम् । तथा सूक्ष्मात्मने चोक्त्वा ततः स्थूलात्मने तु वै ॥ ६४ ॥ तेषां सन्तर्पणमन्त्रानाहुतिसंख्यां ततस्तेषां स्वशरीरे आ पादाच्छिखान्तं यथाक्रमं व्याप्तिस्मरणं चाह—मूलमन्त्रेति त्रिभिः ॥ ६३-६६ ॥ मन्त्र देह धारण करने वाले अध्वा को अध्यात्म स्वरूप से देखे और मन्त्र स्वामी को उतार कर अध्वा को अधिदैव स्वभाव में देखे । सूत्र में अध्वा को अधिभूत देखे और शिष्य के शरीर में अध्यात्म अधिदेव तथा अधिभूत स्वरूप तीनों अध्वा का दर्शन करे । इसके बाद मूल मन्त्र के अन्त में 'नमः परमात्मने' यह पद पढ़कर चार आहुती प्रदान करे । इसके बाद मूल मन्त्र के अन्त में 'नमः सूक्ष्मात्मने' पढ़कर चार आहुती देवे । इसी प्रकार मूल मन्त्र के अन्त में 'नमः स्थूलात्मने' पढ़कर चार आहुति देवे ॥ ६२-६४ ॥