भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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एकोनविंशः परिच्छेदः ४६७ संख्यया प्रायश्चित्तहोमं कुम्भस्थितभगवदभ्यर्थनपूर्वकं तत्समीपस्थापितमायासूत्र- ग्रहणम् ऋजुभूतस्य शिष्यस्या पादाच्छिखान्तं तत्सूत्रप्रसारणं चाह—एवमिति सार्ध- द्वाभ्याम् ॥ ५८-६० ॥ सूत्रप्रसारणम् व्यक्तस्वरूपं च मन्त्रेशं संस्मरेदग्निमध्यगम् । पश्येद् विभौ शिशौ सूत्रे स्वात्मन्यध्वानमञ्जसा ॥ ६१ ॥ अग्निमध्ये व्यक्तस्वरूपं भगवन्तं संस्मृत्य तस्मिन् भगवति शिशौ सूत्रे स्वात्मनि चाध्वानं स्मरेदित्याह—व्यक्तेति ॥ ६१ ॥ इस प्रकार आचार्य ब्राह्मणादिकों के संस्कार हो जाने के उपरान्त वर्णानुक्रम से साङ्गमूल मन्त्र द्वारा दशांश सहित सहस्र संख्या में प्रायश्चित्त होम करे । फिर कुम्भ स्थित भगवान् की प्रार्थना कर उनके समीप में स्थापित सूत्र ग्रहण करे । सर्वप्रथम सीधे खड़े हुए शिष्य के पैर से लेकर शिरोभाग पर्यन्त सूत्र को प्रसारित करे और शरीर के नाप के अनुसार उसे पहनावे । तदनन्तर अग्नि के मध्य में स्थित प्रत्यक्ष मन्त्ररूप से स्थित मन्त्रेश का स्मरण करे । फिर भगवान् में, शिष्य में, सूत्र में तथा अपने में अकस्मात् अध्वा का दर्शन करे ॥ ५८-६१ ॥ तत्राध्यात्मस्वरूपं च संस्मरेन्मन्त्रदेहगम् । अधिदैवस्वभावं च तत्स्वात्मन्यवतार्य च ॥ ६२ ॥ अधिभूतमयं सूत्रे त्रिविधं शिष्यविग्रहे । अध्वस्मरणक्रममाह—तत्रेति सार्धेन । त्रिविधम् अध्यात्मादिदैवाधिभूतभेद- भिन्नस्वरूपमित्यर्थः ॥ ६२-६३ ॥ मूलमन्त्रावसाने तु सनमस्कं परात्मने ॥ ६३ ॥ पदं कृत्वा तु जुहुयादाहुतीनां चतुष्टयम् । तथा सूक्ष्मात्मने चोक्त्वा ततः स्थूलात्मने तु वै ॥ ६४ ॥ तेषां सन्तर्पणमन्त्रानाहुतिसंख्यां ततस्तेषां स्वशरीरे आ पादाच्छिखान्तं यथाक्रमं व्याप्तिस्मरणं चाह—मूलमन्त्रेति त्रिभिः ॥ ६३-६६ ॥ मन्त्र देह धारण करने वाले अध्वा को अध्यात्म स्वरूप से देखे और मन्त्र स्वामी को उतार कर अध्वा को अधिदैव स्वभाव में देखे । सूत्र में अध्वा को अधिभूत देखे और शिष्य के शरीर में अध्यात्म अधिदेव तथा अधिभूत स्वरूप तीनों अध्वा का दर्शन करे । इसके बाद मूल मन्त्र के अन्त में 'नमः परमात्मने' यह पद पढ़कर चार आहुती प्रदान करे । इसके बाद मूल मन्त्र के अन्त में 'नमः सूक्ष्मात्मने' पढ़कर चार आहुती देवे । इसी प्रकार मूल मन्त्र के अन्त में 'नमः स्थूलात्मने' पढ़कर चार आहुति देवे ॥ ६२-६४ ॥