सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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इसके बाद आचार्य उपवीत धारण करने योग्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन
तीन वर्णों को नूतन यज्ञोपवीत धारण करावे । यतः तत्त्वतः दास भाव को प्राप्त
होने वाले, मद्यपान रहित वंश में उत्पन्न हुए, लोकधर्म से बाहर हुए, किन्तु आप्त
के समान ब्रह्मनिष्ठ होने वाले कर्मतन्त्र में निरत शूद्र को दक्षिणा दान की विधि
नहीं है इसलिये वह गोदान का अधिकारी है । दक्षिणादि दान का अधिकारी नहीं
है । उसे वौषट्, स्वाहा, वषट्कार का अधिकार भी नहीं है इसलिये वह कार्य
प्राप्त होने पर मन्त्रों को नमस्कार मात्र करे । शूद्र द्वारा लाया गया पुष्पादिक भक्ति
युक्त होने के कारण कर्मार्ह हो जाता है ॥ ५१-५६ ॥
अतोऽन्येषां तु भक्तानां विहिता यागसाधने ॥ ५६ ॥
सम्यक् सत्त्वनिवृत्तिः प्राग् दर्शनप्रोक्षणान्वितम् ।
एवं त्रैवर्णिकानामपि यागसाधनद्रव्येषु स्वीयत्वाभिमाननिवृत्तिर्विहितेत्याह—
अतोऽन्येषामिति त्रिभिः पादैः ॥ ५६-५७ ॥
इसी प्रकार त्रैवर्णिकों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) द्वारा लाये गये यज्ञ साधन
द्रव्यों के दर्शन एवं प्रोक्षण से युक्त हो जाने पर उनके द्वारा स्वत्वाभिमान की
निवृत्ति भी विहित है ॥ ५६-५७ ॥
पुष्पाञ्जलिसमर्पणम्
मूर्तौ वा मण्डलाग्रे तु पुष्पक्षेपं महामते ॥ ५७ ॥
नक्तं वा परिपीडं च व्रतार्थं त्वेकमेव हि ।
शिष्यैः पुष्पाञ्जलिसमर्पणं बिम्बाग्रे मण्डलाग्रे वा कार्यमित्याह—दर्शनेति त्रिभिः
पादैः । दर्शनं नेत्रमन्त्रेणावलोकनमित्यर्थः । अनेन दीक्षाकाले मण्डलबिम्बयोरन्य-
तरार्चनं सूच्यते ॥ ५७ ॥
हे महामते ! शिष्य को पुष्पाञ्जलि समर्पण बिम्ब के अग्रभाग में अथवा मण्डल
के अग्रभाग में करना चाहिये । साधक दीक्षा में व्रत के लिये शुद्ध उपवास करे
अथवा रात में नक्त (दिन के अष्टम भाग में) एक बार भोजन करे ॥ ५७-५८ ॥
एवं संस्कारसंशुद्धं कृत्वा वर्णगणं पुरा ॥ ५८ ॥
साङ्गेन विभुना कुर्यात् तत्प्रायश्चित्ततर्पणम् ।
सदशांशं सहस्रं तु यथा चानुक्रमेण तु ॥ ५९ ॥
गत्वाऽभ्यर्च्य च कुम्भेशं सूत्रमादाय तत्स्थितम् ।
ऋजुभूतं शिशुं कृत्वा तद्वत् सूत्रं प्रसार्य च ॥ ६० ॥
दीक्षाव्रतार्थं शुद्धोपोषhost/शुद्धोपोषhost -> दीक्षाव्रतार्थं शुद्धोपोषhost? No, दीक्षाव्रतार्थं शुद्धोपोषणं नक्तभोजनं वा विहितमित्याह—नक्तमित्यर्धेन ।
एवं ब्राह्मणादीनां संस्कारानन्तरं वर्णानुक्रमेण साङ्गमूलमन्त्रैः सदशांशसहस्र-