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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 527

४६८ सात्वतसंहिता सर्वात्मने च तदनु ततोऽध्वनिचयं हितम्। आ पादाग्राच्छिखान्तं च सर्वं ध्यात्वा स्वदेहगम् ॥ ६५ ॥ यथोद्दिष्टक्रमेणैव विभिन्नं त्रिविधं त्वपि। इसके बाद मूल मन्त्र के अन्त में 'नमः सर्वात्मने' यह पद पढ़कर चार आहुति प्रदान करे। ऐसा करने से समस्त अध्व समूह हितकारी हो जाते हैं। फिर उन अध्वा के शरीर में यथाक्रम पैर से लेकर शिखा पर्यन्त भिन्न-भिन्न स्वरूप वाले तीनों अध्वा की व्याप्ति का स्मरण करे ॥ ६५-६६ ॥ अधिभूताधिदैवाध्यात्मपदार्थविवरणम् रचनासन्निवेशो यः क्ष्मादीनां चाधिभूतता ॥ ६६ ॥ बोद्धव्यमधिदैवत्वं सामर्थ्यं यस्य यत् स्वकम्। तदधिष्ठातृमन्त्राणामध्यात्मत्वं विधीयते ॥ ६७ ॥ अधिभूताधिदैवाध्यात्मपदार्थविवरणमाह—रचनेति सार्धेन। तदधिष्ठातृमन्त्राणां पूर्वोक्तवराहादिमन्त्राणामित्यर्थः ॥ ६६-६७ ॥ जो रचना सन्निवेश है, वह अधिभूत है, इसलिये पृथ्व्यादिकों को अधिभूत कहा जाता है। जिसकी अपनी जितनी शक्ति है, उतने को अधिदैव समझना चाहिये। पृथ्व्यादि के अधिष्ठातृ मन्त्र (वराहादि मन्त्र) को अध्यात्म कहा जाता है ॥ ६६-६७ ॥ अथ मार्गद्वयं त्यक्त्वा द्वादशान्तं समाश्रयेत् । मूलमन्त्रमयो भूत्वा संव्रजेत् स्वधिया ततः ॥ ६८ ॥ ब्रह्मद्वारपदं शैष्यं ततस्तन्मध्यवर्त्मना। पार्थिवं पदमाक्रम्य कुर्यात् तच्छक्तिमात्मसात् ॥ ६९ ॥ बीजभूतां च हृन्मन्त्रसंरुद्धां संधिविग्रहाम्। नानाण्डबीजसंयुक्ताम् अनेकरचनान्विताम् ॥ ७० ॥ एवमादाय वै सर्वा बुद्धिनिष्ठास्तु शक्तयः। पृथक् पृथक् क्रमेणैव तस्मिन् हृन्मन्त्रसम्पुटे ॥ ७१ ॥ स्वेनाध्यात्मगुणेनैव परेण व्यापकात्मना। तद्देहं धारयन्तं च स्मरेत् तमुभयात्मकम् ॥ ७२ ॥ कालं भोगक्षयान्तं च तत्कालात् तु महामते। कृत्वैवं भूतशक्तीनां संहारं शिशुविग्रहात् ॥ ७३ ॥ सौत्रं देहमथाक्रम्य सम्यक् तेनैव वर्त्मना। प्रोल्लसंसदद् व्रजेत्तत्र व्यञ्जयेत् तु धियादिवत् ॥ ७४ ॥ आधायाध्यात्ममन्त्रांश्च भूतभूतान्वितानथ।

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