सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५० सात्वतसंहिता परिमित है, वह सभी भावितात्मा के लिये स्वयं आ जाता है । इस विद्या नामक आश्रय को जानना चाहिये । हे महामते! इस प्रकार वज्र के समान सम्पूर्ण, सूक्ष्मरूप से जीवों को स्वयं मोक्ष से अङ्गभाव प्राप्त है । जब शिष्य को दीक्षा देनी हो, तब इन सब बातों पर विचार करना चाहिये ॥ २०८-२१४ ॥ एवमेव विजानीयाद् भूयः सौत्रे तु विग्रहे । सप्तधा तु विभज्यादौ सन्धि वै कुङ्कुमादिना ॥ २१५ ॥ चित्रीकृत्य चतुर्देशात् प्रणवाद्यन्तगैस्ततः । स्वनामपदसंयुक्तो ग्रथनीयः स्वकारणैः ॥ २१६ ॥ इस प्रकार शिष्य के सौत्र विग्रह काम में भी विचार करना चाहिये । सूत्र को सात भागों में प्रविभक्त कर उसकी सन्धि को कुङ्कुमादि से चित्रित कर उसके चारों ओर आगे तथा अन्त में प्रणव लिखकर, अपने नाम से संयुक्त कर, उसके कारणों से ग्रथन करे ॥ २१५-२१६ ॥ एवं प्ताप्तिमयैर्भोगैर्हृदा पूर्णान्तिमे कृते । नीत्वा वै मण्डलस्थस्य विभोस्तं सन्निवेदयेत् ॥ २१७ ॥ इस प्रकार प्राप्तमय भोगों से हृदय पर्यन्त ग्रथनों को पूर्ण कर उसे अपने हाथ में लेकर मण्डल पर स्थित भगवान् को निवेदित करे ॥ २१७ ॥ वर्मणाच्छादितं कृत्वा निधाय कलशाग्रतः । सशिष्योऽथार्चनं कुर्यात् पुनर्विश्वात्मनो विभोः ॥ २१८ ॥ प्रदक्षिणैः प्रणामैस्तु नानास्तुतिपदैः सह । तत्रोपलिप्ते भूभागे मण्डलान्तर्गतं बहिः ॥ २१९ ॥ स्थानभेदस्थितं कृत्वा नेत्रहृन्मन्त्रमन्त्रिते । पञ्चगव्ये चरौ दन्तधावने विनियोज्य तम् ॥ २२० ॥ फिर उसे वर्म मन्त्र द्वारा आच्छादित कर, कलश के आगे रख कर, शिष्य के सहित उसका अर्चन करे । तदनन्तर विश्वात्मा विभु की प्रदक्षिण, प्रणाम एवं नाना स्तुति पदों के साथ अर्चन करे । फिर उसी उपलिप्त भू-भाग में मण्डल के भीतर किसी बाहरी स्थान में नेत्र एवं हृदय मन्त्र से अभिमन्त्रित पञ्चगव्य, चरु एवं दन्तधावन में स्थान भेद कर स्थापित करे ॥ २१८-२२० ॥ भुक्तोज्झिते दन्तकाष्ठे कुर्यात् सिद्धिविचारणम् । सौम्यवारुण ईशाने यदि पूर्वदिगाननम् ॥ २२१ ॥ तत्सिद्धिसूचकं विद्धि विपरीतमतोऽन्यथा । तद्ध्वंसनाय जुहुयाद् वीर्यमन्त्रेण वै शतम् ॥ २२२ ॥