सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशः परिच्छेदः ४५१ दन्तधावन करने के पश्चात् जब उसे किसी दिशा में फेंके, तब उससे अपनी सिद्धि का विचार करे । यदि उस दन्तधावन का मुख उत्तर-पश्चिम तथा दक्षिण में हो तो उसे सिद्धि-सूचक समझना चाहिये । यदि उससे विपरीत हो तो अन्यथा फल होता है । उस अन्यथा फल को विनष्ट करने के लिये सौ की संख्या में वीर्यमन्त्र से आहुति प्रदान करे ॥ २२१-२२२ ॥ धूपानुलेपनादीनि रजांसि घटिकादयः । साज्यानि च तिलादीनि योग्यान्यन्यानि लाङ्गलिन् ॥ २२३ ॥ उद्धृत्योत्तरतः कृत्वा वर्मजप्तेन वाससा । अभुक्तेनाहतेनैव त्वाच्छाद्य सुसितेन च ॥ २२४ ॥ समभ्यर्च्यस्त्रमन्त्रेण पुष्पधूपानुलेपनः । क्षान्त्वा स्थलस्थितं देवमग्नौ व कलशे न्यसेत् ॥ २२५ ॥ फिर धूप, अनुलेपनादि चूर्ण घटिकादि (छोटे-छोटे घड़े) घृतयुक्त तिलादि और भी जो उचित हो । हे लाङ्गलिन् सङ्कर्षण ! उसे निकाल कर उत्तर की ओर स्थापित कर कवच मन्त्र से अमुक्त एवं अनाहत, जो पहना हुआ न हो और जो कहीं से कटा-फटा न हो । ऐसे श्वेत वस्त्र से पुष्प, धूप, अनुलेपन द्वारा अर्चना कर क्षमा माँगे । फिर उन सब वस्तुओं को देवता के आगे अग्नि में, अथवा कलश पर स्थापित करे ॥ २२३-२२५ ॥ अथ शुद्धे च भूभागे हृन्मन्त्रितकुशास्तरे । कृत्वा प्राङ्मस्तकं शिष्यं बलजप्ताङ्कुशेन तु ॥ २२६ ॥ हृदाऽवगुण्ठिततनुं मुख्यमन्त्रमनुस्मरन् । स्वापयेत् स्वप्नलाभाय ततो हृन्मन्त्रितैस्तिलैः ॥ २२७ ॥ सिद्धार्थकयुतैस्तस्य निदध्यात् परितो बहिः । सबर्हिः(र्हि)पक्ष्मन्त्रेण प्राग्वद् दिक्ष्वष्टकं न्यसेत् ॥ २२८ ॥ इसके बाद उपलेपनादि से संशुद्ध भू-भाग पर जहाँ हृन्मन्त्र से अभिमन्त्रित कर कुशा का शयन लगाया गया है, बल मन्त्र से जपे गये अङ्कुश के द्वारा उस शिष्य को पूर्वाभिमुख करे । वहाँ मुख मन्त्र का स्मरण करते हुए, उसके शरीर को हृन्मन्त्र से चारों ओर से घेर देवे तथा उसके स्वप्न के लिये चारों ओर बाहर हृदय मन्त्र से अभिमन्त्रित सिद्धार्थक युक्त तिल रख देवे । फिर उसके आठो दिशाओं में मन्त्र से अभिमन्त्रित मोर का पङ्ख रख देवे ॥ २२६-२२८ ॥ प्रदक्षिणेन तच्चापि सितसूत्रेण वर्मणा । चतुर्धा वेष्टयित्वा तु मण्डपान्निष्क्रमेद् बहिः ॥ २२९ ॥