सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५२ सात्वतसंहिता फिर श्वेत वर्ण के सूत्र से वर्म मन्त्र के द्वारा चार बार वेष्टित कर स्वयं मण्डप से बाहर निकल आवे ॥ २२९ ॥ दन्तकाष्ठादिकं कर्म विनिष्पाद्य स्वयं स्वपेत् । भूतले दर्भशय्यायां कृत्वा दक्षिणतः शिरः ॥ २३० ॥ संस्पृशन् स्वाङ्घ्रियुग्मेन शिशुं शयनसंस्थितम् । भगवन्तं हि मनसा प्रार्थयन्नपवर्गदम् ॥ २३१ ॥ तदनन्तर स्वयं दन्तकाष्ठ आदि कर्म सम्पादन कर पृथ्वी पर कुशा की शय्या पर दक्षिण दिशा में शिर कर शयन पर सोये हुए उस (शिष्य रूप) शिशु को अपने चरण से स्पर्श करते हुए स्वयं भी शयन करे और मोक्ष देने वाले भगवान् से अपने मन से यह प्रार्थना करे ॥ २३०-२३१ ॥ ओमादिशं जगन्नाथ सर्वज्ञ हृदयेशय । तत्राहं योजयाम्येनं कर्मिणं त्वत्परायणम् ॥ २३२ ॥ हे जगन्नाथ! हे सर्वज्ञ! हे दशो दिशाओं में तथा सभी के हृदय में रहने वाले प्रभो ! मैं आपके में परायण इस कर्मकारी शिष्य को आपके कार्य में लगा रहा हूँ। आज्ञा कीजिये ॥ २३२ ॥ प्राप्तानुज्ञस्तु शिष्याणां कुर्याद् वै तत्र योजनम् । यत्र तत्र च तत् तेषामवश्यं शाश्वतं भवेत् ॥ २३३ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायामधिवासदीक्षाविधिर्नाम अष्टादशः परिच्छेदः ॥ १८ ॥ — 𑁍 — इस प्रकार आज्ञा लेकर शिष्यों को भगवत् कार्यों में योजित करे । जहाँ-जहाँ इस प्रकार शिष्यों का संयोजन किया जाता है, वहाँ-वहाँ अवश्य ही शिष्यों का शाश्वत कल्याण होता है ॥ २३३ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के अधिवासदीक्षाविधि नामक अठारहवें परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ १८ ॥ — 𑁍 —