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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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अष्टादशः परिच्छेदः ४४९ प्राक्संख्यासु च तिष्ठन्ति सर्वाः सर्वासु सर्वदा । स्मृत्वा ह्यभेदभावेन षट्कर्मोदकवत् पुरा ॥ २०६ ॥ शिखान्तं क्ष्मादिना तेन सर्वं व्याप्तं विचिन्तयेत् । चतुरात्मानमव्यक्तं शब्दमूर्तिं निराकृतिम् ॥ २०७ ॥ गुणमात्रैर्विभिन्नं च खवत् तत्रैव भावयेत् । अग्राह्येणाथ वपुषा स्वस्वभावमयेन च ॥ २०८ ॥ इसी क्रम से सर्वत्र मन से व्याप्त होने का ध्यान करे । इसी प्रकार अनिरुद्धादि से लेकर सङ्कर्षण पर्यन्त षडध्व का संक्रमित कर स्थित है, जो अध्व से परे है, वह बुद्धिगामी है । आत्मतत्त्व से लेकर प्राग्वत् मूर्त्तता पर्यन्त ये सभी मूर्तियाँ व्यापिका हैं । जो भक्ति परायणों से पृथक् असंख्य उसी आकार में सर्वत्र पृथ्वी में व्याप्त हैं । जो पहली बार कही गई संख्या में सभी सबमें सर्वदा रहती हैं । षट् कर्मोदक भाव से शिखान्त अभेदभाव द्वारा इनका स्मरण कर उन क्ष्मादि से व्याप्त उनका स्मरण करे । फिर उसी में गुण मात्र से विभिन्न निराकृति किन्तु शब्दमूर्त्ति अव्यक्त चतुरात्मा का आकाश के समान ध्यान करे ॥ २०३-२०८ ॥ संक्रान्तेन तु वै बुद्धौ सर्वदैवोदितेन तु । स्वशक्त्या वै ह्यनिच्छातो जीवमादाय सोर्ध्वगम् ॥ २०९ ॥ स्वसामर्थ्यं स्वशक्त्या तत् शान्तात्मास्ते विलाप्य च । शुद्धाशयानां भक्तानां तत्पादैकाभिलाषिणाम् ॥ २१० ॥ तत्सामर्थ्यानुविद्धानां सर्वत्र व्यक्तिमेति च । अतस्तु यद्यत् संवेद्यं हेयं परिमितं त्वपि ॥ २११ ॥ तत्तत् तदात्मनाभ्येति सर्वदा भावितात्मनाम् । इत्यादौ सर्वसामान्यो नित्यो विद्याख्य आश्रयः ॥ २१२ ॥ बोद्धव्यः सोऽपि तदनु ह्यसामान्यतया गतः । आ मोक्षादङ्गभावं च जीवानां स्वयमेव हि ॥ २१३ ॥ वज्रवत् सूक्ष्मरूपेण सम्पूर्णेन महामते । दीक्षाकाले तु शिष्याणां परिज्ञेयं यथोदितम् ॥ २१४ ॥ इसके बाद स्व स्व भावमय अग्राह्य शरीर सर्व दैवोदित बुद्धि में संक्रान्त अपनी शक्ति के अनुसार ऊपर की ओर जाने वाले जीव को लेकर अपनी सामर्थ्य एवं अपनी शक्ति के अनुसार शान्तात्मा में विलीन करे । ऐसा करने से भगवान् के चरण कमलों की अभिलाषा रखने वाले शुद्धाशय भगवत्सामर्थ्य से अनुविद्ध भक्तों के लिये वह सर्वत्र प्रगट हो जाता है । इस कारण जो-जो संवेद्य है, हेय है,

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