सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४६ सात्वतसंहिता संज्ञक, वासनामय, इस प्रकार आत्मशक्ति से विभाजित, सूत्रात्मक शरीर का निर्माण करे ॥ १७९-१८० ॥ बलमन्त्रेण संरुद्धं तदर्थं जुहुयात् ततः । उक्त्वा ओमात्मने स्वाहा द्विषट्कपरिसंख्यया ॥ १८१ ॥ बल मन्त्र से उसे संरुद्ध करे और उसके लिये होम करे । 'ओमात्मने स्वाहा' कहकर बारह बार होम करना चाहिये ॥ १८१ ॥ आदाय भाविनो बन्धान् व्यापकान् शुद्धभोगदान् । ज्ञानादयः समाश्रित्य येऽत्र तिष्ठन्ति सर्वदा ॥ १८२ ॥ स्वस्थानेषु स्वमन्त्रैभ्यस्तांस्तत्रैव च योजयेत् । यथाक्रमेणार्चितानां कृत्वा तेषां च तर्पणम् ॥ १८३ ॥ फिर शुद्ध भोग देने वाले व्यापक एवं भावी बन्धों को लेकर ज्ञानादि का आश्रय लेकर जो यहाँ सर्वदा रहते हैं, उन्हें स्व स्व मन्त्रों से स्व स्व स्थानों पर सन्निविष्ट करे । फिर यथाक्रम अर्चित देवताओं का तर्पण करे ॥ १८२-१८३ ॥ अथ संस्कारचक्रस्य तत्त्ववृन्दाश्रितस्य च । सर्वगस्यापि वै विद्धि स्थितिं नियतलक्षणाम् ॥ १८४ ॥ तदनन्तर तत्त्ववृन्द के आश्रित रहने वाले, सर्वत्र गमन करने वाले तथा संसार चक्र की नियत लक्षण वाली स्थिति का ज्ञान करे ॥ १८४ ॥ तत्त्वव्याप्तिच्छलेनैव शरीरे पाञ्चभौतिके । गुल्फजानुकटीवक्षःकर्णभ्रूकटावधि ॥ १८५ ॥ बुद्धयन्तानां धरादीनां क्रमादवनिसप्तकम् । अहङ्कारस्तदुत्थास्तु ये भेदा विविधा अपि ॥ १८६ ॥ चित्तजा अपि ये चान्ये तिष्ठन्ति मनसा सह । सकालोत्थास्तथा बौद्धास्तत्पूर्वास्त्वपरे च ये ॥ १८७ ॥ अनेकभेदभिन्नास्तु श्रिता आश्रित्य ते धियम् । द्विसप्तभुवनं विश्वमनेकरचनान्वितम् ॥ १८८ ॥ इस पाञ्चभौतिक शरीर में तत्त्व-व्याप्ति के बहाने गुल्फ, जानु, कटी, वक्ष, कान तथा भ्रुकुटि तक पृथ्वी से लेकर बुद्धयन्त क्रमशः अवनि सप्तक व्याप्त है इसी में अहङ्कार से उत्पन्न विविध भेद है, चित्त से लेकर मन तक उत्पन्न भी इसी के अन्तर्गत हैं, काल से उत्पन्न बुद्धि के आश्रित है । किं बहुना अनेक रचनाओं से युक्त यह सारा विश्व चौदह भुवनों सहित यह सारा विश्व पृथ्व्यादिक के अन्तर्गत है ॥ १८५-१८८ ॥