सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशः परिच्छेदः ४४५ उसके बाद मोक्ष रूप एक फल देने वाला धर्म ग्रहण करे । जिससे विविध रूप वाले अच्युत का साक्षात् दर्शन होता है और जिससे भीतर छिपा हुआ समस्त अज्ञान विनष्ट हो जाता है । इसके अनन्तर लाल वर्ण का सूत्र लेकर उसको अनेक गुणित करे और नेत्र मन्त्र से उसका निरीक्षण करे, अस्त्रमन्त्र से अभिमन्त्रित जल से उसका परिशोधन करे । फिर उस परिगुणित सूत्र से अंगूठे से लेकर शिखा के अन्त तक पहनावे । उसी को सभी दुःखों तथा सभी प्रकार के सम्बन्धों का आस्पद समझे । फिर देवयान से शिशु के चेतना के सम्बन्ध तक पहुँचे । फिर पितृवर्त्म से ‘हुँ फट्’ इस मन्त्र से शिर में न्यास करे तथा प्रणवादि नाम को पितृवर्त्म से एवं हन्मन्त्र से सम्पुटित करे ॥ १७०-१७४ ॥ आनीय सह सूत्रेण नयेन्नेत्रेण साम्यताम् । अभ्यर्च्यर्घ्यादिनावेष्ट्य कवचेन महात्मना ॥ १७५ ॥ फिर सूत्र लाकर नेत्र के बराबर उसे नापे उसका अर्चन कर अर्घ्यादि से तथा कवच से आवेष्टित करे ॥ १७५ ॥ ॐ हं अदन्यै हं स्वाहेत्यनेनाकृतिसप्तकम् । हुत्वास्त्रमन्त्रजप्तेन सितेन रजसा ततः ॥ १७६ ॥ सन्ताड्य शैशवं कायं विशेत् तदवधिं तथा । विश्लेषयाऽमुकं ब्रूयात् पदं वीर्यपदानुगम् ॥ १७७ ॥ फिर ‘ॐ हं अदन्यै हं स्वाहा’ इस मन्त्र से सातों आकृतियों का हवन करे, तदनन्तर अस्त्र मन्त्र के जप से अभिमन्त्रित सफेद रज से शिशु के शरीर का सन्ताडन करे और उसकी अवधि तक प्रवेश करे । फिर ‘वीर्य’ पद कहकर ‘अमुकं विश्लेषय’ ऐसा कहे ॥ १७६-१७७ ॥ तं ज्ञानवाचकेनाथ त्वाद्यन्तेन विकृष्य च । स्वबुद्ध्याऽनुगतं कृत्वा ध्यात्वा नक्षत्रगोलवत् ॥ १७८ ॥ फिर उसे ज्ञानवाचक शब्द से आदि तथा अन्त में विकर्षण कर अपने बुद्धि के अनुगत कर नक्षत्रगोलक के समान ध्यान करे ॥ १७८ ॥ सन्धायाभ्यन्तरे सूत्रे हंसार्णेन सबिन्दुना । नतिप्रणवगर्भेण रूढशक्तिं च विग्रहे ॥ १७९ ॥ वासनामयमित्येवमातिवाहिकसंज्ञकम् । सूत्रात्मकं वपुः कृत्वा आत्मशक्त्या विभावितम् ॥ १८० ॥ फिर बिन्दु सहित हंस मन्त्र (हं) से भीतर के सूत्र में उसे स्थापित करे । विग्रह में ‘नमः’ और ‘प्रणव’ के बीच उसे रूढ़ शक्ति बनावे । यही अतिवाहिक