भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 503

४४४ सात्वतसंहिता होम द्वारा सम्पात होम सम्पन्न होता है। यह सम्पात-होम मन्त्र माहात्म्य से अखिल संस्कार युक्त होकर करे ॥ १६२-१६४ ॥ साम्प्रतं चाणिमादीनां गुणानामुत्तरत्र तु। विभोराराधनात् सम्यग् योगाभ्यासाच्च भाजनम् ॥ १६५ ॥ कृते सम्पातभवने आज्येनाथ सकृत् सकृत् । मन्त्राणां तर्पणं कृत्वा सार्चनं श्रावयेद् विभुम् ॥ १६६ ॥ अस्य कर्मात्मतत्त्वस्य कर्मपिण्डं सवासनम् । यदनेकप्रकारं तु त्वच्छक्त्या स्तम्भितं मया ॥ १६७ ॥ प्रायश्चित्तनिमित्तं तु जुहुयात् तदनन्तरम् । बीजेनान्तर्निरुद्धेन स्वाङ्गेनाकृतिकाष्ठकम् ॥ १६८ ॥ तत्काल अणिमादिकों के, उसके बाद गुणों के, उसके बाद विभु के योगाभ्यास से शिष्य मन्त्र के योग्य पात्र बनता है। घृत द्वारा सकृत् सकृत् सम्पात होम कर लेने पर तर्पण करे। फिर अर्चन कर विभु परमात्मा को सुनावे। हे प्रभो! इस शिष्य के अनेक प्रकार के कर्म तत्त्वों के जो वासना सहित कर्म पिण्ड थे, उसको मैंने आपकी शक्ति से रोक दिया है। इसके बाद प्रायश्चित्त के लिये स्वाङ्ग अन्तर्निरुद्ध बीज से काष्ठ का होम करे ॥ १६५-१६८ ॥ एतावता महाबुद्धेर्जन्तर्जन्माश्रितस्य च। याति व्यामिश्ररूपस्य हेयरूपस्य संक्षयः ॥ १६९ ॥ हे महाबुद्ध! केवल इतने मात्र से जीव के जन्म-जन्म से आश्रित उसमें मिला हुआ समस्त हेयरूप दोष नष्ट हो जाता है ॥ १६९ ॥ मोक्षैकफलदो धर्म उपादेयस्त्वनन्तरम् । योऽसौ साम्मुख्यमायाति विविधस्तस्य वाच्युतः ॥ १७० ॥ येनान्तर्लीनमभ्येति ह्यज्ञानं सहसा क्षयम् । अथादायारुणं सूत्रं कृत्वा नैकगुणं पुरा ॥ १७१ ॥ निरीक्षितं दृशा चास्त्रवारिणा परिशोधितम् । तदङ्गुष्ठावधिं यावत् शिखान्तात् सम्प्रधार्य च ॥ १७२ ॥ संस्मरेत् सर्वदुःखानां सम्बन्धानां तदास्पदम् । संविश्य देवयानेन शिशुचैतन्यसन्निधिम् ॥ १७३ ॥ हुंफडन्तं च शिरसि नाम च प्रणवादिकम् । हन्मन्त्रसम्पुटस्थं च कृत्वा वै पितृवर्त्मना ॥ १७४ ॥