सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशः परिच्छेदः ४७१ शिष्यदेहे निरुद्धस्य व्यक्तिक्रोडीकृतस्य च । स्वशक्तिपरिपूरस्य क्ष्माबीजस्य त्वथोपरि ॥ ९५ ॥ विरेच्य शक्तिमन्तं च व्यस्तधर्मेण पूर्ववत् । शिष्यचैतन्यस्य स्वहृदि सङ्कर्षणम् अग्निस्थस्य व्यक्तिनिरस्तस्य क्ष्माबीजस्य चाकर्षणं तस्य शिष्यहृत्कमले स्थापनं शिष्यचैतन्यस्याग्नौ क्ष्मातत्त्वान्तःशक्तित्वेन स्मरणं शक्तिमत्त्वेन पुनस्तस्य तद्विग्रहरेचनं क्ष्माबीजजपध्यानरूपे समये नियोजनम् ॐ ज्ञानाय हृदयाय नमस्य इत्यस्य सूक्ष्मदेहतां सम्पादय स्वाहेति वा, सम्पादय नम इति वा, सम्पादय नमः स्वाहेति वा मन्त्रेण होमैः सूक्ष्मदेहतानयनं तथैव तदधिकारादिहोमं तद्विश्लेषणार्थं होमं ततः शक्तिमतः शक्त्याश्च पुनरात्मसात्करणं क्ष्मातत्त्वस्य शान्त्यर्थं होमं सकर्मसूत्रपार्थिवांशखण्डेन सह पूर्णाहुति पुनः शिष्यदेहे तच्छक्तिभुवनाध्व- नोर्जलविन्दुपद्मपत्रयोरिव सम्बन्धं तथैव शक्तिवत् क्ष्माबीजयोरपि सम्बन्धं चाह— पूरकेण समाकृष्येत्यारभ्य व्यस्तधर्मेण पूर्ववदित्यन्तम् ॥ ८०-९६ ॥ शिष्यायभुवनाध्वादीनामुपदेशः तत्क्षणे बीजसंस्थं तु अध्वानं तु यथास्थितम् ॥ ९६ ॥ प्रकाशयन्ति कृपया तन्नाथास्तस्य सिद्धये । तदानीं भुवनाध्वाद्यधीशास्तद्बीजस्थितमध्वानं यथास्थितं कृपया शिष्याय प्रकाशयन्तीत्याह—तत्क्षण इति ॥ ९६-९७ ॥ दीक्षा प्रयोग—इसके बाद आचार्य शिष्य के चैतन्य को अपने हृदय में आकर्षण करे । इसी प्रकार अग्नि के अप्रकट रूप से स्थित क्ष्माबीज का आकर्षण करे । उस क्ष्माबीज को शिष्य के हृत्कमल में स्थापित करे । फिर शिष्य के चैतन्य को अग्नि में क्ष्मातत्त्व की अन्तःशक्ति के रूप में स्मरण करे । इस प्रकार क्ष्मातत्त्व के शक्तिमान होने के कारण उसे शिष्य के शरीर में डाल देवे । उस क्ष्माबीज को जप एवं ध्यान रूपी समय में इस प्रकार नियोजन करे । 'ॐ ज्ञानाय हृदयाय नमस्य इत्यस्य सूक्ष्मदेहतां सम्पादय स्वाहा' अथवा 'सम्पादय नमः इति वा सम्पादय नमः स्वाहेति वा' इस मन्त्र से सूक्ष्मदेहता का आनयन करे । उसी प्रकार उसके अधिकारी का भी होम करे । फिर उससे अलग होने का भी होम करे । फिर शक्तिमान् और शक्ति के साथ उसको आत्मसात् करे । तदनन्तर क्ष्मातत्त्व की शान्ति के लिये होम करे । फिर सकर्मसूत्र का पार्थिवांश खण्ड के साथ पूर्णाहुति करे । फिर शिष्य के देह में उस शक्ति तथा भुवनाध्व का जलबिन्दु और पद्मपत्र के समान सम्बन्ध स्थापित करे । उसी प्रकार शक्तिमान् और क्ष्माबीज का भी सम्बन्ध करे ॥ ८०-९६ ॥ ऐसा करने से उसी समय भुवनादि अध्वा के अधिष्ठातृ देवता भुवनादि बीज स्थित अध्वा को वह जैसा है, उसी प्रकार कृपापूर्वक शिष्य के मनोरथ की सिद्धि के लिये प्रकाशित कर देते हैं ॥ ९६-९७ ॥