भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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४७२ सात्वतसंहिता विरक्तं भावयेच्छिष्यं चिन्तयन्तमिदं धिया ॥ ९७ ॥ इदं तत्पार्थिवं तत्त्वं मुधा वै दुःखपञ्जरम् । भावतत्त्वगतं चास्य सुमहत्त्वं च साम्प्रतम् ॥ ९८ ॥ कथमत्र त्वहं चासं यस्य मे न तत इमाः । प्रकाशनेन विरक्तस्य शिष्यस्य चिन्तनप्रकारमाह— विरक्तमिति द्वाभ्याम् ॥ ९७-९९ ॥ उस प्रकाश से शिष्य का चित्त विरक्त हो जाता है और वह सोचने लगता है कि यह दुःख से परिपूर्ण पिंजरा वाला मेरा पार्थिव शरीर व्यर्थ है । इसका महत्त्व तो भावतत्त्व की प्राप्ति में है । इतने दिनों तक मै इस पार्थिव शरीर में किस प्रकार रहा? मुझे अब तक उस परतत्त्व की प्राप्ति क्यों नही हुई? ॥ ९८-९९ ॥ विमुक्तः पञ्जराद् यद्वत् सुखमास्ते विहङ्गमः ॥ ९९ ॥ ऊर्ध्वपाती तदारूढस्त्वेवं मन्त्रबलाच्छिशुः । इतः परं शिष्यस्य पञ्जरविमुक्तविहङ्गमसादृश्यमाह—विमुक्त इति । शिष्य- चैतन्यस्य मन्त्रबलात् क्ष्मातत्त्वविमुक्तत्वेऽपि तदारूढत्वाद् विहङ्गमस्यापि पञ्जरोर्ध्वा- रूढत्वमुक्तम् ॥ ९९-१०० ॥ जिस प्रकार पञ्जर विमुक्त विहङ्गम सुख पूर्वक रहता है, उसी प्रकार मुझे भी इस पार्थिव तत्त्व से विमुक्त होकर सुखी होना चाहिये । किन्तु आश्चर्य है? जो मैं पार्थिव पञ्जर से विमुक्त होकर भी अभी उस विहङ्गम के समान इसी पार्थिव शरीर पर आरूढ़ हूँ, जो पञ्जर से विमुक्त होकर भी उसी पर आरूढ़ रहता है ॥ ९९-१०० ॥ मन्त्रसमूहविज्ञापनं तत्प्रकारकथनम् समूहमथ विज्ञाप्य तत्प्रभुत्वेन यः स्थितः ॥ १०० ॥ सन्निरुद्धो भवत्वस्य सर्वतः सर्वदैव हि । युष्मत्प्रसादसामर्थ्याद् यथावत् पार्थिवो गुणः ॥ १०१ ॥ क्ष्मातत्त्वस्थितपातालशयनादिमन्त्रसमूहविज्ञापनं तत्प्रकारं चाह—समूहमिति सार्धद्वाभ्याम् ॥ १००-१०२ ॥ इस प्रकार चिन्तित शिष्य को देख कर आचार्य क्ष्मातत्त्व स्थित पाताल शयनादि मन्त्र समूहों से तथा उनके प्रभुत्व रूप से जो देवता स्थित हैं उनसे विज्ञापन करे । हे मन्त्रसमूहों ! आप लोगों के प्रसाद के सामर्थ्य से इस शिष्य में सर्वत्र सर्वदा पार्थिव गुण यथावत् रूप से सन्निरुद्ध रहें ॥ १०१ ॥ देहान्तं गन्धतन्मात्रं भवेदासीनमस्य वै ।