भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 539

४८० सात्वतसंहिता इस प्रकार विचार करने पर जहाँ स्पष्ट रूप से छः अध्वा को विश्राम मिलता है वही वासुदेव नामक अव्यय 'तत्' पद वाच्य ब्रह्म है ॥ १४० ॥ अम्बरं परमाणूनां बहूनामास्पदं यथा। तथाऽनाद्यबुद्धानां जीवानां हि निकेतनम्॥ १४१ ॥ विज्ञेयं भुवनानां च पदानामन्तरं हि यत्। भुवनपदाध्वद्वयमप्यसंख्यातचेतनास्पदमित्याह—अम्बरमिति सार्धेन ॥ १४१ - १४२ ॥ जिस प्रकार यह बृहदाकाश बहुत परमाणुओं का आस्पद है उसी प्रकार अनादि काल से अज्ञानी जीवों का यह भुवनाध्वा तथा पदाध्वा निकेतन है। उसी के आकाश में अपूर्ण इच्छा वाले अज्ञानी जीवों से सुख-दुःख का अनुभव कराते हुए उनसे ये मन्त्र क्रीडा करते हैं ॥ १४१-१४२ ॥ विनेश्वरेच्छया तेषां मन्त्रा वै क्रीडयन्ति च ॥ १४२ ॥ मायीयेऽध्वद्वये तस्मिन् सुखदुःखमयैः फलैः। ईश्वरेच्छानुविद्धानां भक्तानां परमेश्वरे ॥ १४३ ॥ तत्राम्बरे इच्छाविधुरान् जीवान् सुखदुःखफलानुभवैर्मन्त्राः क्रीडयन्तीत्याह— विनेति। मायीये प्राकृत इत्यर्थः ॥ १४२ - १४३ ॥ गुरूणां दीक्षितानां चाप्याराधनरतात्मनाम्। भवन्त्यध्वद्वयोर्ध्वस्था मन्त्राश्चाज्ञाप्रतीक्षकाः ॥ १४४ ॥ ईश्वरेच्छानुविद्धानां तु स्वयं वश्या भूत्वा तान् भोगार्थं स्वस्थाने नयन्तीत्याह— ईश्वरेति सार्धद्वाभ्याम् ॥ १४३ - १४५ ॥ ये दोनों अध्वा मायिक हैं जो सुख दुःख रूप दो फलों से संयुक्त हैं। ईश्वर की इच्छा करने वाले परमेश्वर में भक्ति रखने वाले गुरुओं तथा दीक्षित जनों की आराधना में तत्पर रहने वालों की भुवनाध्वा तथा पदाध्वा इन दो अध्वों से ऊपर रहने वाले मन्त्र आज्ञा की प्रतीक्षा करते रहते हैं ॥ १४३ - १४४ ॥ नयन्ति कर्मिणः सम्यग् मायीयाध्वद्वयाद् बलात्। स्वस्थानमणिमादीनां भोगानां प्राप्तये तु वै ॥ १४५ ॥ ये मन्त्र ईश्वरेच्छानुविद्ध भक्तों के वशीभूत हो कर उन्हें अणिमादि के भोग के लिये भुवनाध्वा तथा पदाध्वा से ऊपर स्वयं अपने स्थान में ले जाते हैं ॥ १४५ ॥ विरक्तस्य च तद्भोगात् स्वशक्त्या प्रेरयन्ति च। स्वव्यापारवशेनार्पि तत्त्वाध्वन्यमृतोपमे ॥ १४६ ॥ यत्राणिमादि मन्येत तृणानीव च संस्थितः।

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