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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 571

५१२ सात्वतसंहिता संयुक्तानपि पूर्वोक्तैरेतांश्च समयान् सदा ॥ ५७ ॥ निर्वाहियाणां भक्तानां प्रयच्छेत् सततं गुरुः । एतान् समयान् निर्वाहियाणां शिष्याणामुपदिशेदित्याह—संयुक्तनिति। पूर्वोक्तैः श्रीनृसिंहकल्पोक्तैः समयैरित्यर्थः ॥ ५७-५८ ॥ अब चातुर्मास्य व्रत के अनुष्ठान का स्थान और समय कहते हैं— पुण्यक्षेत्र, महातीर्थ, श्रेष्ठ सिद्धाश्रम, विष्णु के पार्षद के स्थान, भगवान् के अवतार के स्थान, इन स्थानों को प्राप्त कर वहाँ मण्डल निर्माण करे, अथवा द्वादशार चक्र का निर्माण करे । हे महामते ! वहाँ विधिवत् चातुर्मास्य व्रत का अनुष्ठान करे, अथवा घर पर ही नियमपूर्वक रहते हुए भीत पर नीलपीतादि चारों रङ्ग से चक्र का निर्माण करे, अथवा प्रतिमा के आगे चक्र निर्माण कर चातुर्मास्य व्रत का अनुष्ठान करे । गुरु इस प्रकार वैष्णव धर्म निर्वाहक नियम समयज्ञों के लिये तथा नृसिंह कल्पोक्तादि में कथित समय-धर्म के पालन करने वाले भक्तों के लिये उपदेश करे । इस प्रकार समय-धर्म के निर्वाह करने वाले शिष्यों की योग्यता देखकर उन्हें उन-उन धर्मों का उपदेश गुरु करे ॥ ५४-५८ ॥ ज्ञात्वा निर्वाहकं भक्तं तस्यादौ देशिकेन तु ॥ ५८ ॥ समुद्दिश्यास्तु ते सर्वे निर्वहन्त्यथ येषु वै। तेषु तेषु नियोक्तव्यो तथा न च्यवते पुनः ॥ ५९ ॥ पूर्वं शिष्यस्य निर्वाहकतां ज्ञात्वा तस्य समया उपदेष्टव्याः । ततस्तस्य येषु येषु निर्वाहः संभवति, स तेषु तेषु समयेषु पुनर्यथा समयच्युतो न भवेत्, तथा नियोजनीय इत्याह—ज्ञात्वेति सार्धेन ॥ ५८-५९ ॥ वे जिस प्रकार इन-इन समय-धर्मों का ठीक से पालन करें, प्रच्युत न हों, ऐसा समझ कर ही उन्हें उन-उन धर्मों में नियुक्त करे ॥ ५८-५९ ॥ धावन्ति समयघ्नस्य सविघ्नास्तु विनायकाः । विमुखाः सिद्धयो यान्ति ह्यापदो हि भवन्ति च ॥ ६० ॥ ज्ञातवैवं सावधानेन निर्वक्तव्यं हि तान् प्रति । समयभ्रष्टस्यानिष्टपरम्परा संभवति, अतः सावधानं समयाः पालनीया इत्याह— धावन्तीति सार्धेन । विनायका = दुष्टग्रहविशेषा इत्यर्थः । “भूतप्रेतपिशाचाश्च यक्षरक्षोविनायकाः” (१०।६।२७) इति श्रीभागवते । समयघ्नस्य धावन्ति = समयघ्नं प्रति धावन्तीत्यर्थः ॥ ६०-६१ ॥ जो शिष्य समय-धर्म का ठीक-ठीक तरह से पालन नहीं करते, उनके पीछे-पीछे विघ्न सहित विनायकगण दौड़ते रहते हैं । उनको सिद्धि की बात तो दूर उल्टे आपत्तियाँ ही घेर लेती हैं । उस समय धर्म से परिभ्रष्ट शिष्य के अनिष्ट

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