भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 572, कुल 837 में से

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पृष्ठ 572

परम्परा का वारापार नहीं होता । अतः समय-धर्म के परिपालन में प्रमाद न करे । ऐसा विचार कर गुरु बड़ी सावधानी से शिष्यों को समय-धर्म का उपदेश करे ॥ ६०-६१ ॥ सारमादाय वै बुद्ध्या निर्मथ्य नियमो दधिम् ॥ ६१ ॥ कृपया गुरुणा देयं समयानां तु पञ्चकम् । भक्तिरग्नौ गुरौ मन्त्रे शास्त्रे तदधिकारिणि ॥ ६२ ॥ एतेषु समयेषु सारभूतमग्निभक्तिगुरुभक्त्यादिपञ्चकं विशेषेणोपदेष्टव्यमित्याह —सारमिति सार्धेन ॥ ६१-६२ ॥ इन समयों में गुरु स्वयं नियमरूप दधि का निर्मन्थन करे । फिर अपनी बुद्धि से कृपापूर्वक उसका सारभूत अग्निभक्ति, गुरुभक्ति मन्त्र एवं शास्त्र आदि पाँचों का विशेष रूप से अधिकारी को उपदेश करे ॥ ६१-६२ ॥ नियतं पञ्चकस्यास्य यथावत् परिपालनात् । अनुष्ठानात् तु नान्येषां स्वातन्त्र्येण यथेच्छया ॥ ६३ ॥ भव्यानां मनसोऽभीष्टाः प्रवर्तन्ते हि सिद्धयः । एतत्समयपञ्चकस्य परिपालनादन्येषां समयानामननुष्ठानेऽपि मनोऽभीष्टसिद्धि- मान् भवतीत्याह—नियतमिति सार्धेन । अथवा गुर्वादिचोदनां विनाऽन्येषां कर्मणां स्वच्छन्दस्वातन्त्र्येणानुष्ठानाभावाच्चेत्यर्थः । यद्वा (आनन्दः?) क्रियापदेनान्वये परि- पालनादिति ‘ल्यब्लोपे पञ्चमी’ ॥ ६३-६४ ॥ इस समयपञ्चक के यथावत् परिपालन से अन्य समयों के अनुष्ठान में भी मन अभीष्ट सिद्धि युक्त हो जाता है । इतना ही नहीं ऐसा साधक गुरु आदि के उपदेश के बिना किसी अन्य अनुष्ठान में स्वेच्छा से स्वतन्त्र नहीं रहता ॥ ६३-६४ ॥ येऽनिर्मलेन मनसा उपरोधात् तु कुर्वते ॥ ६४ ॥ पालनं समयानां च ते मज्जन्त्यसितेऽध्वनि । सुप्रसन्नेन मनसा यथैतत् परिपाल्यते । तथा प्रसादमभ्येति स्व आत्मा तु हितैषिणाम् ॥ ६५ ॥ एवं समयपरिपालनं कुर्वतामपि मनःकालुष्ये सति नैष्फल्यं तदभावे साफल्यं चाह—य इति द्वाभ्याम् । अनिर्मलेनेति पदच्छेदः ॥ ६४-६५ ॥ समय धर्म के परिपालन करने वाले जिस साधक का मन कालुष्य से परिपूर्ण रहता है उस साधक का अनुष्ठान निष्फल रहता है । अनुष्ठान में सिद्धि तो तब होती है जब उसका मन कालुष्य रहित होता है ॥ ६४-६५ ॥

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