सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१४ सात्वतसंहिता जो शिष्य सुप्रसन्न मन से यथावत् कालुष्यरहित होकर नियमों का पालन करते हैं वे सुख के समुद्र में स्नान करते हैं। ऐसे हितैषी साधक की आत्मा सर्वथा प्रसन्न रहती है ॥ ६५ ॥ नूनं कालुष्यमुक्तानां स्थितानामिह सत्पथे। समयिसाधकाचार्यपुत्रकाणां भवेच्छुभम् ॥ ६६ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां समयविधिर्नाम एकविंशः परिच्छेदः ॥ २१ ॥ — ❦ — अतश्चतुर्विधशिष्याणामपि मनःकालुष्यरहितानामेव शुभं भवेदित्याह— नूनमिति ॥ ६६ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये एकविंशः परिच्छेदः ॥ २१ ॥ — ❦ — ऐसा करने से कालुष्यरहित एवं सत्पथ में स्थित चारों प्रकार (साधक, सामयिक, पुत्रक और आचार्य) के साधकों का शुभ होता है ॥ ६६ ॥ . ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के समयविधि नामक इक्कीसवें परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ २१ ॥ — ❦ —