सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 576, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वांविंशः परिच्छेदः ५१७ रहने वाले, निरन्तर सत्कर्म में लगे हुए, नित्य दैन्य रहित, सत्त्ववान, क्षमाशील, धैर्यशाली, दयालु, साधुओं का उपकार करने वाले, स्वच्छ वस्त्र सदैव धारण करने वाले, शुक्लवर्ण युक्त, प्रियवक्ता, प्रसन्नचित्त, दूसरे के द्रव्य से घृणा करने वाले, दूसर की स्त्री की स्पृहा से सर्वथा मुक्त, सद्विवेक का आश्रय लेने वाले, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र जाती में उत्पन्न, मद्य, मांस में लम्पटता रहित, शौच स्वाध्याय में निरत, सन्तुष्ट, सतत उद्योग शील, उच्छिष्ट वर्जन करने वाले, सर्वदा चक्र से अङ्कित शरीर वाले, मान, सात्सर्य एवं कार्पण्य का परित्याग करने वाले, महान दैव पित्र्य कार्य में सदा तत्पर, दम्भ से रहित सभी अकर्मण्य द्रव्यों का परिहार करने वाले, माता-पिता के तथा सद् बन्धुओं के वत्सल कही हुई बातों का पालन करने वाले, नित्य निर्भय, विनम्र, सभी से ऊपर रहकर स्थिति तथा काम में परायण, वंशोद्धारक, रूप सुन्दर बुद्धि से अलङ्कृत, अथवा गुरु के प्रसाद से अन्यत्र गुरु गृह में अथवा अपने गृह में दर्शन मात्र से सन्तुष्ट, मन्त्र मूर्ति के दर्शन से सन्तुष्ट, मण्डल दर्शन से सन्तुष्ट, गुरु के नेत्र द्वारा देखे जाने पर, अथवा उनके प्रोक्षण मात्र से संस्कृत, मात्र इतने से ही अपने को कृतार्थ समझने वाले, शिष्यता को प्राप्त काल से सन्तुष्ट रहने वाले, आचार्य से पढ़कर अथवा पाठ सुन कर जो एकान्त में निर्जन में निरन्तर पाठ का अनुशीलन करे, जो सम्पूर्ण पाठ याद कर कभी अभिमान न करे, जो क्षुब्ध होकर स्वार्थ सिद्धि के लिये किसी दूसरे को पाठ न पढ़ावे । (क्षोभरहित होकर दूसरे को पाठ पढ़ावे) ॥ २-१७ ॥ नोद्ग्राहयति शास्त्रार्थमभ्यर्थयति योऽनिशम् । न विक्रियामवाप्नोति ह्याक्षिप्तोऽप्यथ संसदि ॥ १८ ॥ न मन्यते तदा सम्यग् विजेष्यामीति वादिनः । कुण्डमण्डलमुद्रास्त्रपीठबिम्बालयेषु च ॥ १९ ॥ समन्त्रेषु च बुद्धिस्थं नित्यं कुर्याच्च संग्रहम् । अयनादिषु कालेषु प्रत्यहं त्वस्य सम्भवात् ॥ २० ॥ देवमर्चापयेत् कुर्यात् स्वयं वा मान्त्रमर्चनम् । जो निरन्तर शास्त्रार्थ का स्वयं अभ्यास करे और वैष्णवातिरिक्त को शास्त्रार्थ न बतावे । सभा में आक्षिप्त होकर भी विक्रिया (मलीनता, असन्तोष) प्राप्त न करे। 'मैं वादी पर विजय प्राप्त करूँगा' जो इस विचार को अच्छा नहीं समझता, समन्त्रक, कुण्ड, मण्डल, मुद्रा, अस्त्र, पीठ, बिम्ब तथा देवालय बुद्धि में जानकारी रखे । उत्तरायणादि काल उपस्थित होने पर देवाधिदेव की अर्चा करावे और स्वयं मन्त्र द्वारा अर्चन करे ॥ १८-२१ ॥ गुर्वादिष्टो गुरूणां च कुर्यात् पादाभिवन्दनम् ॥ २१ ॥ कार्या तेषां न जिज्ञासा यया यान्त्यप्रसन्नताम् ।