भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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५१८ सात्वतसंहिता प्रसाद्य विधिवत् पृच्छेदबुद्धमथ विस्मृतम् ॥ २२ ॥ विज्ञातमथवा ज्ञातमाचार्यैः परिचोदितः । क्लृप्तां तेषां स्वकां मुद्रां गुप्तां कृत्वा प्रकाशयेत् ॥ २३ ॥ संस्कृतश्रुतपाठाभ्यां स्वगुरुं प्रार्थयेत् ततः । भगवद्यागपूर्वं तु पुत्रकाख्यं परं पदम् ॥ २४ ॥ असन्निधानात् स्वगुरोः प्रार्थयेत् तत्प्रतिष्ठितम् । तदभावात् तु वै चान्यं क्रमात् सद्धैष्णवो हि यः ॥ २५ ॥ नान्यदर्शनसंस्थं तु गुरोर्यस्मादवैष्णवात् । गुरु के द्वारा आदेश प्राप्त कर अन्य गुरु सदृशों का पादाभिवन्दन करे । उनसे ऐसी कोई जिज्ञासा न करे जिससे वे अप्रसन्न हों । जिस विषय का अपने को ज्ञान न हो, अथवा जिसका विस्मरण हो गया हो, उस पदार्थ की जिज्ञासा करके उन्हें प्रसन्न कर करे । आचार्य के द्वारा आज्ञा प्राप्त कर उनसे ज्ञात अथवा अज्ञात पदार्थ पूछे । गुरुओं द्वारा बताई गई मुद्रा गुप्त रूप से भी प्रकाशित न करे । संस्कृत के विषय में तथा श्रुतपाठ के विषय में (ज्ञान के लिये) गुरु से प्रार्थना करे । गुरु के सन्निधान में न रहने पर उनके स्थान पर भगवद् यागपूर्वक प्रतिष्ठित 'पुत्रक' नामक शिष्य से प्रार्थना करे । पुत्रक के अभाव में अन्य से और इसी प्रकार क्रमशः जो सद् वैष्णव हो उससे प्रार्थना पूर्वक पूछे ॥ २१-२६ ॥ कर्मतन्त्रं समन्त्रं च द्रव्यसामान्यजं फलम् ॥ २६ ॥ नूनं वैफल्यमायाति तस्मात् तं परिवर्जयेत् । द्रव्यमन्त्रक्रियाभावभेदात् फलमनश्वरम् ॥ २७ ॥ जायते कर्मिणां शश्वदभेदाद् वै ह्यकर्मिणाम् । सर्वत्र समबुद्धीनामात्मन्यभिरतात्मनाम् ॥ २८ ॥ लोकाचारवियुक्तानां यज्ञविग्रहिणां तु वै । ज्ञात्वैवं सह वै यस्य सम्बन्धः सफलो भवेत् ॥ २९ ॥ अवैष्णव गुरु से अथवा अन्य दर्शन से समन्त्रक कर्मतन्त्र तथा द्रव्य- सामान्यज फल नहीं होता । निश्चय ही ऐसे लोगों द्वारा कराये गये समन्त्रक कर्मतन्त्र निष्फल हो जाते हैं । इसलिये उनका परिवर्जन करे । भगवान् की आराधना में निरत भक्तों को द्रव्य मन्त्र क्रिया तथा भाव भेद से उसका अनश्वर फल होता है इसी प्रकार सर्वत्र समबुद्धी रखने वाले, अपनी आत्मा में निरत, लोकाचार रहित, यज्ञ विग्रह वाले महात्माओं को उनमें अभेद बुद्धि से उनका अनश्वर फल होता है । इस प्रकार जान कर जिसका जिस प्रकार उनमें सम्बन्ध होता है वही सफल होता है ॥ २६-२९ ॥