सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 582, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशः परिच्छेदः ५२३ अरविन्दाक्ष ! हे सङ्कर्षण ! ये आगमों के भेद दिव्य, मुनि तथा पौरुष रूप से तीन प्रकार के कहे गये हैं । जो विशिष्ट अर्थों से युक्त होने के कारण (दृढ़) अकाट्य हो, स्वल्प एवं अल्पाक्षर हो, स्थित हो, ऐसा आज्ञासिद्ध मोक्षप्रद ईश्वर का वाक्य ‘दिव्य’ कहा जाता है । जो सिद्धियों का प्रशंसक हो, संसार में अथवा स्वर्ग में प्रवृत्त कराने वाला हो, सभी का रञ्जन करने वाला हो, गूढ (गुप्त रूप से कहा गया हो) जिससे निश्चय करने की क्षमता हो, ऐसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्षपरक वाक्यों को ‘मुनि वाक्य’ कहा जाता है ॥ ५२-५५ ॥ अनर्थकमसम्बद्धमल्पार्थं शब्दडम्बरम् । अनिर्वाहकमाद्योक्तेर्वाक्यं तत्पौरुषं स्मृतम् ॥ ५६ ॥ अर्थहीन, पूर्वापर विरुद्ध, अल्पार्थ, शब्दाडम्बर से परिपूर्ण दिव्यवाक्य का निर्वाह करने में अशक्य, ऐसे वाक्य को ‘पौरुष वाक्य’ कहा जाता है ॥ ५६ ॥ हेयं चानर्थसिद्धीनामाकरं नरकावहम् । प्रसिद्धाथानुवादं यत् संगतार्थं विलक्षणम् ॥ ५७ ॥ अपि चेत् पौरुषं वाक्यं ग्राह्यं तन्मुनिवाक्यवत् । यह पौरुषवाक्य अनर्थ सिद्धियों का समूह नरक प्रदान करने वाला है । किन्तु जो प्रसिद्ध अर्थों का अनुवाद करने वाला है, जिसका अर्थ संगत तथा विलक्षणता से परिपूर्ण है, ऐसा पौरुषवाक्य मुनिवाक्य के समान ग्राह्य है ॥ ५७-५८ ॥ एवमादेयवाक्योत्थ आगमो यो महामते ॥ ५८ ॥ सन्मार्गदर्शनं कृत्स्नं विधिवादं च विद्धि तम् । तत्रामाण्यात् तु यत्किञ्चित् समभ्यूह्य यथार्थतः ॥ ५९ ॥ पूर्वापराविरोधेन निर्वाहयति सर्वदा । भक्तानां चोदितस्त्वेवं पदवाक्यप्रमाणवित् ॥ ६० ॥ स्वमुद्रालङ्कृतश्चापि यः सदा चक्रधृक् चरेत् । स देशिको निबोद्धव्यः सर्वैः सामयिकैर्गुणैः ॥ ६१ ॥ इसी प्रकार हे महामते ! जो आगम उपादेय वाक्य वाला है, ऐसे सम्पूर्ण सन्मार्ग दर्शक वाक्य को विधिवाद जानो । भक्तों की प्रेरणा से विधिवाद से यथार्थता का ठीक-ठीक ज्ञान कर पूर्वापर का विरोध न करते हुए ऐसे वाक्यों का सर्वदा निर्वाह करे । आचार्य पद (व्याकरण), वाक्य (मीमांसा), प्रमाण (न्याय), शास्त्र का वेत्ता हो, जो मुद्रा से अलङ्कृत होकर चक्रधारण करते हुए, सञ्चरण करे । इस प्रकार जो सभी सामायिक गुणों से संयुक्त हो, उसे आचार्य समझना चाहिये ॥ ५८-६१ ॥