सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१६ सात्वतसंहिता परि-त्याग कर देवे । केवल पाँच वेदी ही निर्माण करे । उसका प्रकार यह है— मध्य में मण्डल पीठ निर्माण करे । उसके दक्षिण दिशा में अव्यवहित धन स्थान (कुम्भानां स्थापनं धनम्' इस कोश के अनुसार धन का अर्थ कुम्भ है) उसके अनन्तर वाली वेदिका में स्नान कुम्भ स्थापन करे । इसी प्रकार मण्डल पीठ के वाम भागस्थ वेदिका में 'भोगानां मन्त्र तर्पणम्' (समिदादि हवन सामग्री) प्रधान कुण्ड स्थान पर्यन्त स्थापित करे । ऋग्यजुः-सामपूर्वक समस्त श्रुतियों को हवन के चारों कोणों पर स्थापित करे । नयनोन्मीलन शयन स्थान में स्थापित करे । किन्तु पृथक् शय्या बनाकर स्थापित करना हितकारी होता है । प्रासाद के आठों दिशाओं में स्थण्डिल में, अथवा चतुर्वेदमय श्रेष्ठ अपने कुण्ड में हवन करे ॥ ३३-३७ ॥ मूर्तिपकर्त्तव्यहोमस्य गतिकथनम् समस्मूर्तिपीयं वा स्वयमेव समाचरेत् । सामग्रीविरहाद् योग्यमूर्तिपानामभावतः ॥ ३८ ॥ एवं स्थलसंकोचादिनाऽष्टदिक्कुण्डानि विना यागगेहे निर्मिते सति तदानीं मूर्तिपकर्त्तव्यहोमस्य गतिमाह—समस्तेति । सामग्रीविरहाद् अनेकस्रुक्स्रुवाद्यभावात्, योग्यमूर्तिपानामभावत ऋत्विजामभावाद्रा हेतोः, समस्तमूर्तिपीयं मूर्तिपकर्त्तव्यं होमं स्वयमेव समाचरेत् । तत्तत्कुण्डसमीपं गत्वा स्वयमेव तत्तद्धोमं कुर्यादिति भावः ॥ ३८ ॥ तत्तद् ज्ञाताओं के द्वारा अथवा स्वयं मूर्तिप एवं शक्तियों के मन्त्र से हवन करे । इस प्रकार स्थल संकोच से आठों दिशाओं में कुण्ड निर्माण के बिना यागगृह निर्माण करने पर 'मूर्तिपकर्त्तव्य होम' की गति कहते हैं । अनेक स्रुक्- स्रुवादि के अभाव में योग्य मूर्तिप (होता, ऋत्विक्, उद्गाता और ब्रह्मा आचार्य) के अभाव में समस्त मूर्तिप कर्त्तव्य होम स्वयमेव करे ॥ ३८ ॥ सर्वोपकरणानां संप्रवेशकथनम् यश्च यत्रोपयोज्यस्तु तत्र तं सम्प्रवेशयेत् । मन्त्राणामुपदेष्टा तु आत्मतुल्यो महामतिः ॥ ३९ ॥ योक्तव्यः कर्मदक्षस्तु सर्वेष्ववसरेषु च । अथ प्रासादमध्ये कुम्भस्थापनप्रकारोक्तरीत्या सकलमङ्गलवैभवैः सहाचार्यस्य योगगेहप्रवेशं तत्र सर्वोपकरणानां सम्प्रवेशनं चाह—यश्चेत्यर्धेन । मन्त्रतन्त्रस्खालित्य- भिया तदुपदेष्टुरन्यस्याचार्यस्य नियोजनमाह—मन्त्राणामिति ॥ ३९-४० ॥ अब इसके बाद प्रासाद के मध्य में कुम्भ-स्थापन की तरह समस्त मङ्गल वैभव के साथ आचार्य का यागगृह में प्रवेश तथा सभी प्रकार के उपकरणों का प्रवेश कहते हैं—यागगृह में जहाँ जिसका उपयोग संभव हो, उसे उसी स्थान पर