भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 682

पञ्चविंशः परिच्छेदः ६२३ पाद्यार्घ्याचमनीयार्थद्रव्यैः पूर्वोदितैस्त्रयम् । नागाद्याद्यन्तमध्येभ्यो नदीमृत्तीर्थसम्भवा ॥ ६७ ॥ ह्रदाद् वल्मीकशिखराद् गजदन्तक्षतीकृतात् । हलोत्था वृषशृङ्गोत्था शालिक्षेत्रेषु सम्भवा ॥ ६८ ॥ तथैव पद्मषण्डोत्था त्वेकस्मिन् गोमयं परे । वनदाहसमुद्भूतं तथैव च महानसात् ॥ ६९ ॥ त्रेताग्निभस्म त्वपरे विनिवेश्यं घटान्तरे । अन्यस्मिन् पञ्चगव्यं तु कुशोदकसमन्वितम् ॥ ७० ॥ पूर्व में कहे गये पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय द्रव्यों को तीन कलश में स्थापित करे । पहाड़ के आदि, मध्य और अन्त में होने वाली मृत्तिका, नदी की मिट्टी, तीर्थ की मिट्टी, ह्रद (तालाब) की मिट्टी, वल्मीक के शिखर (ऊपरी भाग की मिट्टी), हाथी के दाँत से उखाड़ी गई मिट्टी, हल की मिट्टी, बैल के सींग से उखाड़ी गई मिट्टी, धान के खेत की मिट्टी, कमल की मिट्टी, इतनी मिट्टी एक कलश में स्थापित करे । अन्य कलश में केवल गोमय स्थापित करे । वनदाह का भस्म, रसोई का भस्म और त्रेताग्नि भस्म अन्य घट में स्थापित करे । अन्य कलश में कुशोदक युक्त पञ्चगव्य स्थापित करे ॥ ६७-७० ॥ सघृतं तैलकुम्भं तु चमसीवारिपूरितम् । पलाशखदिराश्वत्थशमीलोहितचन्दनम् ॥ ७१ ॥ कषायोदकमन्यस्मिन् परस्मिंस्त्रिफलोदकम् । वचा शतावरी कन्या व्याघ्री सिंही कृताञ्जलिः ॥ ७२ ॥ गोलोमी सिंहलोमी च कुष्ठं भूतजटा तथा । महागरुडवेगा च कलशेऽन्यत्र लाङ्गलिन् ॥ ७३ ॥ चमसी (मल निकालने वाला सुगन्धित द्रव्य विशेष) के जल से पूर्ण सघृत तैल अन्य कलश में और पलाश, खदिर, अश्वत्थ, शमी, लालचन्दन एवं कषायोदक किसी अन्य कलश में स्थापित करे । इसके बाद त्रिफलोदक युक्त कलश, वचा, शता- वरी कन्या, व्याघ्री, सिंही, कृताञ्जलि, गोलोमी, सिंहलोमी, कुष्ठ, भूतजटा तथा महा- गरुडवेगा, हे लाङ्गलिन् (सङ्कर्षण) किसी अन्य कलश में स्थापित करे ॥ ७१-७३ ॥ महानीला गलूची च सहदेवी शतावरी । विष्णुक्रान्ता च कार्कोटा साह्रा वह्निशिखाऽपरे ॥ ७४ ॥ महानीला, गलूची, सहदेवी, शतावरी, विष्णुक्रान्ता, कार्कोटा, साह्रा तथा वह्निशिखा अन्य घट में स्थापित करे ॥ ७४ ॥