भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 683

६२४ सात्वतसंहिता यष्टी वाराहकर्णी चाप्यन्यस्मिन् गजपिप्पली । श्रीफलाद्यानि चान्यस्मिन् पावनानि फलानि च ॥ ७५ ॥ यष्टी और वाराहकर्णी अन्य कलश में तथा गजपिप्पली, श्रीफलादि एवं पावन फलों को किसी अन्य घट में स्थापित करे ॥ ७५ ॥ दधिक्षीराज्यकुम्भांश्च द्वौ मध्विक्षुरसान्वितौ । मूलान्यम्भोरुहाणां च नान्यन्यस्मिन् द्वये न्यसेत् ॥ ७६ ॥ द्रुमाणां पावनानां तु सक्षीराणां विशेषतः । पुष्पपत्रफलोपेतमेकस्मिन् मञ्जरीगणम् ॥ ७७ ॥ दधि, दूध तथा घी स्थापित किये जाने वाले तीन कुम्भ, मधु का कुम्भ, इक्षुरस का कुम्भ, कमल का मूल (कवलगट्टा), इन्हें पृथक्-पृथक् दो घड़ों में स्थापित न करे । क्षीर युक्त परम पवित्र वृक्षों का पुष्प, पत्र, फल और उनकी मञ्जरी अन्य कलशों में स्थापित करे ॥ ७६-७७ ॥ जात्यादिकमथैकस्मिन् कौसुमीयं लताचयम् । रोचनारजनीयुग्मं बला मोटा च पद्मकम् ॥ ७८ ॥ इति पञ्चकमेकस्मिन् दर्भान् दूर्वाङ्कुराणि च । सास्यं शाल्यङ्कुरचयं कलशेऽन्यत्र वै न्यसेत् ॥ ७९ ॥ सिद्धार्थकान् सिताद्यांस्तु प्रियङ्गुं गन्धसंज्ञकम् । अपरस्मिन् न्यसेत् कुम्भे सह वै नागकेसरैः ॥ ८० ॥ एक घड़े में फूलने वाले जात्यादि लताओं का समूह स्थापित करे । रोचना, रजनी, बला, मोटा और पद्मक इन पाँचों को किसी एक घड़े में स्थापित करे । कुशा, दूर्वाङ्कुर, सास्य, शालिधान्य का अङ्कुर समूह किसी अन्य कलश में स्थापित करे और सिद्धार्थक, सितादि, प्रियङ्गु, गन्ध इन्हें नागकेसर के साथ किसी अन्य कुम्भ में स्थापित करे ॥ ७८-८० ॥ ग्राम्याश्चौषधयः सप्त सप्तारण्या घटद्वये । बाह्लीकं चन्दनं चैव रसं कर्पूरसंयुतम् ॥ ८१ ॥ चतुष्कमेतदपरे त्वन्यस्मिन् धातवः शुभाः । ताम्रजाम्बूनदाद्यास्तु परे रत्नचयं महत् ॥ ८२ ॥ सात ग्राम्य औषधियाँ तथा सात अरण्य औषधियाँ दो कलशों में स्थापित करे । बाह्लीक, चन्दन, कपूर, संयुक्त रस इन चारों को किसी अन्य कलश में स्थापित करे । इसी प्रकार ताम्र, सुवर्णादि धातु किसी अन्य कलश में एवं रत्न समूह किसी अन्य घट में स्थापित करे ॥ ८१-८२ ॥