सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशः परिच्छेदः ६२५ न्यसेद् विद्रुमजालं च द्वयोर्मुक्ताफलानि च । अर्घ्योदकमथैकस्मिन् नदीतीर्थोदकं द्वये ॥ ८३॥ इसी प्रकार एक कलश में विद्रुम जाल तथा दूसरे में मुक्ता फल स्थापित करे । एक कलश में अर्घ्योदक, तथा नदी का जल एवं तीर्थ का जल, दो कलशों में अलग-अलग रखे ॥ ८३ ॥ सर्वौषधिघटं चैव सुशीताम्भोघटं ततः । सुगन्धपुष्पकलशं चत्वारिंशत् त्वमी स्मृताः ॥८४ ॥ एक कलश में सर्वौषधि, एक में सुशीत जल तथा एक कलश में सुगन्ध पुष्प स्थापित करे । यहाँ तक चालीस घटों में स्थापित किये जाने वाले द्रव्यों का विवरण कहा गया ॥ ८४ ॥ वामभागे तु देवस्य अग्निकोणादितो न्यसेत् । यातुधानपदं यावत् क्रमाद् द्विद्विकसंख्यया ॥ ८५ ॥ दशपङ्क्तिनियोगेन एवमन्ये तु पृष्ठतः । ईशकोणात् समारभ्य यावदाग्नेयगोचरम् ॥ ८६ ॥ शीताम्बुपूरितानां च घटानां केवलं न्यसेत् । पुनरीशानकोणात् तु शयने सप्तधा न्यसेत् ॥ ८७ ॥ गन्धोदकेन सम्पूर्णांस्तथा वायुपदावधि । सर्वाण्याधाररूढानि पूरितान्यमलाम्भसा ॥ ८८ ॥ मूलमन्त्रेण तदनु पूजयेद् द्वादशात्मना । संवेष्ट्य च पुरा सूत्रैश्छादयेत् तदनन्तरम् ॥ ८९ ॥ विधानैः सूत्रसम्बन्धैर्वस्त्रेणाच्छाद्य वै ततः । इसी प्रकार देवता के वामभाग में अग्निकोण से लेकर नैर्ऋत्यकोण पर्यन्त क्रमशः दो-दो की संख्या के अनुसार दश पङ्क्ति में कलश स्थापित करे । इसी प्रकार पीछे ईशानकोण से आरम्भ कर आग्नेयकोण तक केवल शीत जल पूरित कलश स्थापित करे । इसी प्रकार शयन स्थान में भी ईशानकोण से लेकर वायव्य कोण तक गन्धोदक से पूर्ण सात कलश स्थापित करे । तदनन्तर स्वच्छ जल से परिपूर्ण आधार पर स्थापित सभी कुम्भों की द्वादशाक्षर मन्त्र से पूजा करे । उन्हें प्रथमतः सूत्र से संवेष्टित करे । फिर वस्त्र से आच्छादित करे ॥ ८५-९० ॥ तदर्पणावसानेऽथ शयनं कल्पयेद् द्विधा ॥ ९० ॥ सर्वोपकरणोपेतमनन्तं तदधो यजेत् । प्रभावाप्यययोगेन तदूर्ध्वं सर्वगं प्रभुम् ॥ ९१ ॥