भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 689

६३० सात्वतसंहिता पवित्रमन्त्रं तदनु इदं विष्णुर्विचक्रमे । ततो विभवमन्त्रैस्तु सर्वैः संमन्त्रितेन च ॥ ११५ ॥ समस्त मूर्त्तियों के द्वारा पावमानी चतुष्टय का पाठ करावे । इन सबके अन्त में श्रेष्ठ पवित्र 'व्यूहीय मन्त्र' 'भगवानिति' का पाठ करावे । इसके बाद पवित्र मन्त्र 'इदं विष्णुर्विचक्रमे' का तथा इसके बाद सभी एक में मिलकर विभव मन्त्र का पाठ करे ॥ ११४-११५ ॥ कुम्भेन सेचयित्वा तु व्यूहमन्त्रैः परेण तु । स्नापयित्वाऽर्चयित्वा तु जुहुयात् साधिकं शतम् ॥ ११६ ॥ तदनन्तर अन्य कलश से व्यूह मन्त्र द्वारा स्नान कराकर अर्चन करे । फिर एक सौ आठ आहुति प्रदान करे ॥ ११६ ॥ यथावत् प्रणवेनाथ व्याप्तिं कृत्वा च पाठयेत् । मा प्रकामेति ऋग्वेदानाग्नेनायुर्यजुर्मयान् ॥ ११७ ॥ प्राणापानं हि यत्साम ततः प्राणाय वै नमः । यातव्येति परं मन्त्रं विप्रानेकायनांस्ततः ॥ ११८ ॥ अथ प्रणवेन बिम्बे भगवद्व्याप्तिस्मरणपूर्वकम्ऋगादिचतुर्वेदेष्वेकायने च प्राण- प्रतिष्ठामन्त्रपाठनमाह—यथावदिति द्वाभ्याम् ॥ ११७-११८ ॥ तदनन्तर प्रणव (ॐ) मन्त्र से भगवान् की व्याप्ति का स्मरणपूर्वक 'मा प्रकाम' ऋगादि और 'अग्नेनायुः' आदि यजुः तथा 'प्राणापानं हि यत्' आदि साम एवं 'यातव्य' आदि चारो वेदों में तथा एकायन में आये हुए मन्त्रों द्वारा बिम्ब में प्राण-प्रतिष्ठा करे ॥ ११७-११८ ॥ ध्यानयुक्तो धिया सम्यक् पठेदाराधकस्ततः । ॐ आवाहयाम्यमरवृन्दनताङ्घ्रियुग्मं लक्ष्मीपतिं भुवनकारणमप्रमेयम् । आद्यं सनातनतनुं प्रणवासनस्थं पूर्णेन्दुभास्करहुताशसहस्ररूपम् ॥ ११९ ॥ ततस्त्वावाहनश्लोकचतुष्टयं स्वयं पठेद्दिति । तच्चाह— ध्यानेत्यादिभिः ॥ ११९-१२२ ॥ फिर आराधना करने वाला यजमान आवाहन के इन चार श्लोकों का (ॐ आवाहयामि............मदनुग्रहकाम्ययाद्य पर्यन्त) स्वयं पाठ करे । अर्थ इस प्रकार है—जो लक्ष्मीपति समस्त भुवनों के कारण अप्रमेय आद्य