सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशः परिच्छेदः ६३१ सनातन शरीर वाले हैं, जो प्रणवासन पर संस्थित है, सहस्रों चन्द्रमा, सहस्रों सूर्य तथा सहस्रों अग्नियों के समान जाज्वल्यमान स्वरूप वाले हैं, जिनके चरणों में समस्त अमर वृन्द नमस्कार करते हैं, हम उन परमात्मा का इस मूर्ति में आवाहन करते हैं ॥ ११९ ॥ ध्येयं परं सकलवेदविदां च वेद्यं वाराहकापिलनृकेसरिसौम्यमूर्तिम् । श्रीवत्सकौस्तुभमहामणिभूषिताङ्गं कौमोदकीकमलशङ्खरथाङ्गहस्तम् ॥ १२० ॥ समस्त वेदविदों से वेद्य, वाराह, कपिल तथा नृसिंह के समान सौम्य मूर्ति धारण करने वाले, श्रीवत्स, कौस्तुभादि महामणियों से विभूषित अङ्ग वाले तथा कौमोदकी (गदा), कमल, शङ्ख और चक्र हाथ में लिये हुये उन परमाराधनीय देवाधिदेव का मैं इस बिम्ब में आवाहन करता हूँ ॥ १२० ॥ सर्वत्रगोऽसि भगवन् किल यद्यपित्वा- मावाहयामि हि यथा व्यजनेन वायुम् । गूढो यथैव दहनो मथनादुपैति आवाहितोऽपि हि तथा त्वमुपैषि चाऽर्चाम् ॥ १२१ ॥ हे भगवन् ! यद्यपि आप सर्वज्ञ हैं, आपको आवाहन की कोई आवश्यकता नहीं है फिर भी जैसे व्यजन (पङ्खा) से वायु का आवाहन किया जाता है उसी प्रकार मैं आप का आवाहन करता हूँ । जिस प्रकार काष्ठ में रहने वाली अग्नि मन्थन से उत्पन्न होती है उसी प्रकार आप आवाहन से प्रकट होकर अर्चा ग्रहण करते हैं ॥ १२१ ॥ मालाधराच्युत विभो परमात्ममूर्ते सर्वत्र नाथ परमेश्वर सर्वशक्ते । आगच्छ मे कुरु दयां प्रतिमां भजस्व पूजां गृहाण मदनुग्रहकाम्ययाऽद्य ॥ १२२ ॥ हे मालाधर !, अच्युत !, विभो !, परमात्ममूर्ते !, हे सर्वत्र !, हे नाथ !, हे परमेश्वर !, हे सर्वशक्ते ! आप आइये और मेरे ऊपर दया कीजिये । इस प्रतिमा में निवास कीजिये और मुझ पर अनुग्रह करने की कामना से मेरी पूजा ग्रहण कीजिये ॥ १२२ ॥ ततो विमृज्य वस्त्रेण भोगैः पूर्वोदितैर्यजेत् । अर्घ्याद्यैर्दक्षिणान्तैस्तु पाठयेद् ऋङ्मयांस्ततः ॥ १२३ ॥