सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशः परिच्छेदः ६३३ दुर्भिक्षक्षामशान्त्यर्थं परमान्नफलैर्युते । पाठयेदस्यवामीयम् ऋङ्मयांस्तदनन्तरम् ॥ १३१ ॥ तन्मयान् बलमन्त्रं तु दशार्धेति महामते । स्वयमाद्यन्तसंरुद्धं हृदा तु कवचं जपेत् ॥ १३२ ॥ द्वादशाक्षर मन्त्र का जप कर मुद्रा बनाकर प्रणाम करे । फिर समस्त प्राणियों में रहने वाले भगवान् से साष्टाङ्ग दण्डवत् करते हुये इस प्रकार प्रार्थना करे—हे भगवन्! आप यही मूर्ति धारण कर संप्रति अतत्त्वज्ञ नागर जनों को समाह्लादित कीजिये । जिस आप के स्वरूप के अन्तःकरण में प्रवेश मात्र से स्वल्प काल में ही मनुष्य अपने सहस्त्र जन्मों में किये गये पापों से मुक्त हो जाता है । लोक पर अनुग्रह करने वाले भगवान् से मात्र इतनी ही प्रार्थना करे । फिर अपना दोनों हाथ भगवान् के चरणों में स्थापित कर ऋङ्मय मन्त्रों का पाठ करावे । फिर सुयन्त्रित दूध, घी, दही और ओदन से युक्त स्थिर दुर्भिक्ष बुभुक्षादि की शान्ति के लिये खीर तथा फलों से संयुक्त स्थिर ब्रह्मरथ पर भगवान् को 'उत्तिष्ठ' इस मन्त्र से पधरावे । ऋङ्मय मन्त्रों का तथा पाँच बल मन्त्रों का पाठ करावे और स्वयं कवच का पाठ करे ॥ १२६-१३२ ॥ भ्रामयेद् बलिदानं तु क्रियमाणं तु सर्वदिक् । रत्नकाञ्चनवस्त्राणां पूर्ववत् क्षेपमाचरेत् ॥ १३३ ॥ दिव्याद्यायतनानां च कार्या पूजा यथोदिता । पञ्चरात्रविदां चैव यतीनां ब्रह्मचारिणाम् ॥ १३४ ॥ षट्कर्मनिरतानां च दानं दीनजनेष्वपि । रथस्थे मन्त्रबिम्बे तु यावत् पदशतं व्रजेत् ॥ १३५ ॥ स रथस्तूर्यघोषेण तावत् क्रतुफलं बहु । आप्नोत्याराधकः शश्वत् सकामो नियतव्रतः ॥ १३६ ॥ तदनन्तर किये जाने वाले बलिदान को सभी दिशाओं में घुमावे । रत्न, काञ्चन और वस्त्रों को लुटावे । शास्त्र पद्धति के अनुसार दिव्यादि आयतनों की पूजा करे । पञ्चरात्र वेत्ताओं को, यतियों को, ब्रह्मचारियों को, षट्कर्म में निरत लोगों को एवं दीन जनों को दान देवे । रथ पर स्थित मन्त्र बिम्ब को स्थापित कर जब तक एक सौ पग चले, उसे उतने ही दूरी में, उस रथ के तुर्य घोष से नियत व्रतवाला सकामी आराधक अनेक यज्ञों का फल प्राप्त करता है ॥१३३-१३६॥ ततस्तोरणदेशस्थं रथं कृत्वाऽर्चयेत् प्रभुम् । पाद्यार्घ्यपुष्पधूपैस्तु नमस्कृत्य च पाठयेत् ॥ १३७ ॥ उत्तिष्ठेति द्विषट्कार्णं सजितन्तं तु चाखिलम् । सा० सं० - 44