सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३४ सात्वतसंहिता सम्पठन् पौरुषं सूक्तं यागवेश्म प्रवेशयेत् ॥ १३८ ॥ फिर तोरण स्थान पर रथ स्थिर कर प्रभु की पाद्य, अर्घ्य, पुष्प, धूप से अर्चना करे, नमस्कार करने के बाद 'उत्तिष्ठ' इस द्वादश अक्षर का मन्त्र तथा समस्त जितन्त स्तोत्र का एवं पुरुष सूक्त का पाठ करते हुये यागगृह में भगवान् का प्रवेश करावे ॥ १३७-१३८ ॥ हृदा शयनगं कृत्वा यात्राहोमं समापयेत् । ततस्तच्छिरसो देशे चक्राधारस्थिते घटे ॥ १३९ ॥ पूर्वोक्तलक्षणे नेत्रमन्त्रसम्पुटितं जपेत् । पूजयित्वाऽर्घ्यपुष्पाद्यैः शयनस्थं च वै पुनः ॥ १४० ॥ वर्मणाऽऽच्छाद्य वस्त्रेण ततोऽङ्घ्रिनिकटे विभोः । स्थित्वा लाञ्छनमन्त्रांस्तु यथास्थानगतान् न्यसेत् ॥ १४१ ॥ हृदय में शयन स्थित भगवान् का स्मरण करते हुये यात्रा होम समाप्त करे । फिर भगवान् के शिरःप्रदेश में चक्राधार पर स्थित घट की अस्त्र सम्पुटित नेत्र मन्त्र द्वारा पूजा करे । फिर दूसरी बार शयनस्थ भगवान् की अर्घ्य पुष्पादि द्वारा पूजन करे । वस्त्र से कवच मन्त्र द्वारा आच्छादन करे । पुनः रथोत्सव इस प्रकार शय्याधिवासन के बाद भगवान् के सन्निकट स्थित होकर उनके शरीर में यथा स्थान स्थित लाञ्छन मन्त्रों से न्यास करे ॥ १३९-१४१ ॥ पादाद् वै द्वादशाङ्गेषु ततो दामोदरादिकान् । तच्छक्तिकांस्तथा मन्त्रान् भास्वद्व्यापकलक्षणान् ॥ १४२ ॥ ऐश्वरेणाथ बीजेन यथावस्थेन भावयेत् । पादादितन्मयेनैव तद्धन्मन्त्रवरेण तु ॥ १४३ ॥ लाञ्छन मन्त्र के न्यास के बाद दामोदरादि का, महिमादि तच्छक्तियों का, विशाखयूप बीज का, तत्तन्मूर्त्ति बीजों का, प्रणव का तथा मूल मन्त्र का पादादि मूर्द्धान्त संहार क्रम से न्यास करे ॥ १४२-१४३ ॥ प्राग्वदप्यययुक्त्या तु अन्तर्ज्योतिर्मयात्मना । विभुना वाक्स्वरूपेण तदेवाथ परं पदम् ॥ १४४ ॥ सुशान्तं सर्वगं बुद्ध्वा निस्तरङ्गमिवोदधिम् । विद्यां गदामित्याद्यं यत् पाठयेत् पाञ्चरात्रिकान् ॥ १४५ ॥ देहसाञ्न्यासिकं मन्त्रं धारणाख्यमनन्तरम् । जीमूतस्येति ऋग्वेदान्नासदासीच्च पाठयेत् ॥ १४६ ॥ क्रमेणानेन हुत्वा तु पादार्धशतसंख्यया ।