सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३६ सात्वतसंहिता पाठयेद् ब्राह्मणान् धातर्यध्यक्षेति च मन्त्रराट् ॥ १५७ ॥ यो विश्वतश्चक्षुरिति ध्यातव्यो भवतीति च। द्वा सुपर्णेति तदनु अतो देवेति वै पुनः॥ १५८ ॥ ऋङ्मयान् पौरुषं सूक्तं ततः परतमा त्विति। ततोऽर्चयित्वा मन्त्रेशं शयने बिम्बवृत्तिगम्॥ १५९ ॥ नित्यसन्निधिसिद्ध्यर्थमा समाप्तिं तु मण्डले। संरोध्य सन्निधीकृत्य महता विभवेन तु॥ १६० ॥ अनेकत्व होने के कारण उस मन्त्र का प्रसार अपने आप हो जाता है। वही चिद् बीज निचय नित्यानित्यमय होने के कारण, गहन अज्ञान के कारण, अमूर्त्त बलवान् भेद के कारण, कभी निष्प्रभ हो जाता है। इस प्रकार बिम्ब के हृत्पद्म में ज्ञानादि षट् शक्ति युक्त मूल मन्त्र का स्मरण करे। फिर नृसिंह कल्पोक्त रीति से पाञ्चभौतिक शरीर के उपसंहार का चिन्तन करे। अमल मन्त्रमय मूर्त्ति की उत्पत्ति का ध्यान करे। जब वह अमल मूर्त्ति भगवान् मन्त्र रूप से सर्वथा स्वतन्त्र है तब उनके वाचक मन्त्र 'सहस्र शिरसं देवम्' इस मन्त्र का पाठ करने के लिये अथर्ववेदी को प्रेरित करे। 'धातर्यध्यक्षेति' मन्त्र का पाठ करने के लिये ब्राह्मणों को प्रेरित करे। इसी प्रकार 'यो विश्व तश्चक्षुः' इस मन्त्र का स्वयं ध्यान करे। इसके बाद 'द्वा सुपर्णा' इस मन्त्र का, पुनः 'अतो देवेति' मन्त्र का, पुनः ऋग्वेद के मन्त्रों का, फिर पुरुष सूक्त का पाठ करे। फिर शयन पर बिम्ब रूप धारण किये हुये मन्त्रेश का अर्चन करे। उनकी नित्य सन्निधि की सिद्धि के लिये समाप्ति पर्यन्त मण्डल में ही महान् विभव से उनका संरोधन करे, सन्निधान करे ॥ १४९-१६० ॥ साङ्गं सन्तर्प्य विधिवत् सह मूर्तिधरैस्ततः। स्वमूर्तिकुम्भान्मन्त्रेण जलमुद्धृत्य भाजने ॥ १६१ ॥ बिम्बमूर्ध्नि क्रमाद् देयं सर्वैरेकायनादिकैः। सन्तर्पयित्वा तदनु मन्त्रं सपरिवारकम् ॥ १६२ ॥ आज्यादिना प्रभूतेन दत्वा पूर्णाहूतिं ततः। बिम्बात्मना प्रयातानां क्ष्मादीनामङ्गरूपिणाम् ॥ १६३ ॥ आपादानेऽपि पूर्णत्वात् पिण्डीभावार्थमेव च। आरम्भादेव जातानां छिद्राणां शमने तु वै ॥ १६४ ॥ आप्यायनार्थं मन्त्राणां द्रव्यैर्होमं समाचरेत्। द्विषट्केणाहुतीनां तु एकैकेन चतुर्ह्रदा ॥ १६५ ॥ आ चाङ्घ्रेर्जानुपर्यन्तं स्पृष्ट्वाऽऽज्यं होमयेत् पुरा। आ नाभिजानुदेशाच्च तथैव जुहुयाद् दधि ॥ १६६ ॥