भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 696

पञ्चविंशः परिच्छेदः ६३७ नाभेराकर्णतः क्षीरमा कर्णादा शिरो मधु । संमेल्य जुहुयात् सर्वं स्पृष्ट्वा देहं तु चाखिलम् ॥ १६७ ॥ मध्य कुण्ड में तथा दिक् कुण्ड में सात समिधाओं के द्वारा भगवान् का सन्तर्पण करे । अपनी-अपनी मूर्त्ति के समीप स्थापित कुम्भों से बिम्ब का सेचन करे । फिर आज्यादि से सपरिवार मन्त्रनाथ का सन्तर्पण करे । फिर प्रभूत घृतादि से पूर्णाहुति करे । बिम्ब रूप से प्रगट होने वाले क्ष्मादि अङ्ग रूप वाले भगवान् के पाद पर्यन्त पूर्ण होने पर भी पिण्डीभाव के लिये और आरम्भ से ही होने वाले छिद्रों की शान्ति के लिये तथा मन्त्रों के आप्यायन के लिये द्रव्य से होम करे । चार द्रव्यों में एक-एक द्रव्य से बारह आहुति इस प्रकार देवे । भगवान् के पैर से लेकर जानु पर्यन्त शरीर का भाग स्पर्श कर घी की बारह आहुति देवे । जानु से लेकर नाभि पर्यन्त शरीर का भाग स्पर्श कर बारह आहुति दधि से देवे । नाभि से लेकर कर्ण तक शरीर का भाग स्पर्श कर दूध की बारह आहुति देवे । फिर कर्ण से लेकर शिर पर्यन्त शरीर का स्पर्श कर बारह आहुति मधु से देवे तथा सभी चारो द्रव्यों को मिला कर सभी अङ्ग का स्पर्श कर बारह आहुति प्रदान करे ॥ १६१-१६७ ॥ संस्कृत्य बिम्बवत् पीठं भिन्नं ब्रह्मशिला तथा । प्राणाभिमानदेवं वा यस्य यो विहितस्तु वै ॥ १६८ ॥ अथ पीठब्रह्मशिलयोः संस्कारानाह—संस्कृत्य बिम्बवत् पीठमित्यारभ्य प्रणवा- न्तेन लाङ्गलिन्नित्यन्तम् । पीठब्रह्मशिलयोरपि भवद्विम्बत्वाकारेणैव स्मरणमेकः पक्षः, तत्तत्पीठाभिमानदेवत्वेन स्मरणमन्यः पक्षः । पीठाभिमानदेवश्चानन्तकूर्ममीनेष्वन्यतमः, तत्त्रयं वा । यस्य यो विहितः “अष्टलोहमयं चक्रम्” ( २५।२०५) इत्यादिभिर्वक्ष्य- माण इत्यर्थः । पारमेश्वरव्याख्याने तु—“प्राणाभिमानदेवमनन्तम्” इति केवलमनन्तं प्रतिपादितम् । तन्मन्दम्, यस्य यो विहित इति वाक्यविरोधात् ॥ १६८-१७२ ॥ अब पीठ एवं ब्रह्म शिला का संस्कार कहते हैं—पीठ तथा उससे भिन्न ब्रह्म शिला का बिम्ब के समान ही संस्कार करे । कोई-कोई पीठ और ब्रह्म शिला दोनों को भगवद् बिम्बाकार मानते हैं यह प्रथम पक्ष है । कोई-कोई तत्तत्पीठा- भिमानी देवता मानते हैं यह दूसरा पक्ष है, ये पीठाभिमानी देवता अनन्त, कूर्म एवं मीन में से कोई एक है, अथवा तीनों है, अथवा कोई इन्हें प्राणाभिमानी देवता मानते हैं । इस विषय में जिसका जैसा विचार हो, वह उसी रूप में उनका स्मरण कर पूजन करे ॥ १६८ ॥ वेष्टयित्वाऽम्बरैश्चित्रैश्चक्रमन्त्रेण वै ततः । कार्यो ब्रह्मशिलाहोमः शताष्टाधिकसंख्यया ॥ १६९ ॥ सर्वप्रथम चित्र वर्ण के वस्त्रों से चक्र मन्त्र द्वारा उनको वेष्टित करे तदनन्तर एक सौ आठ मन्त्रों से ब्रह्म शिला होम करे ॥ १६९ ॥