भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पञ्चविंशः परिच्छेदः ६४१ की प्रतिष्ठा में ब्रह्मशिला नामक मध्यम पद उपयुक्त है। उसे गर्भगत मध्यपद के ऊपर पृष्ठदेश से एक अंश छोड़कर दो शिला के अन्त में प्रयत्नपूर्वक योजित करे। बिम्ब के आगे दो भाग के ऊपर वेदी बनानी चाहिये ॥ १८५-१८७ ॥ चतुरश्रायतस्यैतत् पीठस्य स्थापने हितम् । एवं हि चतुरश्रस्य विधानं किन्तु लाङ्गलिन् ॥ १८८ ॥ सञ्चार्या त्वग्रतो वेदिर्नित्यमाराधनार्थतः । पीठोपर्यथवा देवं यस्त्वाराधयते सदा ॥ १८९ ॥ निवेशनीया वै तेन मध्यदेशेन सा शिला । एवमाराधनवशात् तथा फलवशात् तु वै ॥ १९० ॥ सपीठानां च बिम्बानां कार्यं सम्यङ् निवेशनम् । देवमानुषभागाच्च ऐहिकामुष्मिकं भवेत् ॥ १९१ ॥ विबुधब्रह्मभागाच्च ऐहिकं तु गुणाष्टकम् । अपवर्गे तु सामान्यमकामानामयं विधिः ॥ १९२ ॥ चौकोर पीठ पर बिम्ब को स्थापित करना हितकारी कहा गया है। यद्यपि स्थापना में चौकोर पीठ का विधान है। किन्तु हे लाङ्गलिन्! नित्य आराधना के लिये बिम्ब के आगे वेदी बनाना आवश्यक है। जो आराधक पीठ पर स्थित देवाधिदेव का नित्य आराधन करता है उसे वह शिला मध्य देश में ही स्थापित करनी चाहिये। अतः पीठ सहित बिम्ब का सन्निवेश ठीक तरह से करे। दैव और मानुष भाग पर स्थापित करने से इस लोक और उस लोक में भी फल होता है विबुध भाग तथा ब्रह्मभाग पर स्थापित करने से आठ गुना ऐहिक फल होता है। मोक्ष में बिम्ब के स्थापन का सामान्य नियम है। इस प्रकार कामना रहितों के लिये यही विधि है ॥ १८८-१९२ ॥ भिन्नेऽपेक्षावशान्मध्ये सति भूयः समाचरेत् । गालितेऽस्राम्बुना लिप्ते हृदा वै चन्दनादिना ॥ १९३ ॥ श्वभ्रेऽथ घटरुद्धानां मन्त्राणां च निरोधनम् । पूर्वोक्तेन विधानेन धिया स्वे स्वेऽयने तथा ॥ १९४ ॥ कृत्वाऽर्चनं यथोद्दिष्टं पूर्णान्तं तत्र विन्यसेत् । बाहुल्येन तु षट्पञ्चचतुर्गोलिकसंमिताम् ॥ १९५ ॥ पीठाद् विनिर्गतां किञ्चिद् भूतये सुस्थिरां शिलाम् । ग्रस्तां पीठेन मुक्त्यर्थं नवरन्ध्रकृतां पुरा ॥ १९६ ॥ सुमन्त्रेण तु तत्रापि प्रतिष्ठाऽसीति पाठयेत् ।