भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 703

६४४ सात्वतसंहिता फलितोऽर्थः । चक्रस्य प्रतिष्ठायां तदधः पीठगर्तेऽनन्तं तस्यानन्तस्याधस्तनमीनकूर्मौ मीनस्याधस्तात् कूर्मानन्तौ तस्य कूर्मस्याधस्तान्मीनानन्तौ च न्यसेत् । सर्वस्य चक्रादीनां सर्वेषामपि पद्मं च विहितम् । तस्य पद्मस्य प्रतिष्ठायां तु तदधोऽनन्तं न्यसेत् । मण्टपे तु खगेशस्य स्थापनकर्मणि चक्रं न्यसेदिति चोक्तं भवति । पूर्णान्तिकं तर्पणं कृत्वेत्यत्र चक्रादिमन्त्रैरिति ज्ञेयम् । दर्भोदकक्रिया चात्र गर्भगेहादिप्रोक्षणार्थमिति ज्ञायते ॥ २०६-२११ ॥ हे महामते! इसके बाद उस पीठ पर अष्टलोहमय चक्र स्थापित करे । इसके बाद अनन्तादि द्विषट्(१२) विभव देवों में जो जिसका आधार हो, उसे स्थापित करे । जैसे अनन्तादि द्वादश विभव देवों के कूर्म आधार हैं । मीनादि द्वादश के मीन आधार हैं । चातुरात्म्य स्थापन प्रक्रिया में चक्र, अनन्त, कूर्म, मीन और पद्म आधार हैं । इस प्रकार अनन्त, कूर्म एवं मीन से व्यतिरिक्त अन्य विभव देवताओं की प्रतिष्ठा में पीठ गर्त्त में प्रथम चक्र, उसके ऊपर तत्तद् द्विषटकाधार अनन्त, कूर्म एवं मीन में किसी एक की स्थापना कर उसके ऊपर पद्म प्रतिष्ठापित करे । इस प्रकार चक्र, उसके ऊपर अनन्त, कूर्म मीन में कोई एक, उसके ऊपर केवल पद्म, इन तीन को ही स्थापित करे । चक्र की प्रतिष्ठा में उसके नीचे वाले पीठ गर्त्त में अनन्त, उस अनन्त के नीचे मीन एवं कूर्म की, मीन के नीचे कूर्मानन्त की और कूर्म के नीचे मीन अनन्त की स्थापना करे । सभी चक्रादि की प्रतिष्ठा में पद्म विहित है । अतः पद्म की प्रतिष्ठा में उसके नीचे अनन्त को स्थापित करे । मण्डप में जहाँ खगेश (गरुड़) का स्थापन करना हो उसके नीचे चक्र स्थापित करे । फिर चक्रादि मन्त्रों से पूर्णाहुति प्रदान करे । तदनन्तर दर्भोदक से गर्भ गेहादि का प्रोक्षण करे । इसी प्रक्रिया को दर्भोदक क्रिया कहते हैं ॥ २०६-२११ ॥ ततः प्रबोधयेद् देवमर्चयित्वा इदं पठेत् । मन्त्रात्मन् रूपमात्मीयमाग्नेयमुपसंहर ॥ २१२ ॥ समाश्रयस्व सौम्यत्वं स्थित्यर्थं परमेश्वर । नमस्तेऽस्तु हृषीकेश उत्तिष्ठ परमेश्वर ॥ २१३ ॥ मदनुग्रहहेत्वर्थं पीठभूमिं समाश्रय । उद्घाट्य हृदयेनाथ त्यक्तनिद्रं तु मन्त्रराट् ॥ २१४ ॥ उत्थाप्य मूर्तिमन्त्रेण सह मूर्तिधरैर्बलात् । तोरणेन च निष्क्रम्य प्रदक्षिणचतुष्टयम् ॥ २१५ ॥ ततः प्राप्ते लग्ने भगवत्प्रबोधनमर्चनम्, मन्त्रात्मन्नित्यादिविज्ञापनम्, त्यक्तनिद्रस्य भगवतः समुद्धरणम्, ऋत्विग्भिः सह समुत्थापनम्, तोरणद्वारेण बहिर्निष्क्रमणम्, मन्दिरप्रदक्षिणचतुष्टयम्, प्रासादद्वारे पाद्याद्यभ्यर्चनम्, अन्तःप्रवेशनम्, चतुश्चक्रेत्यादि-