सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशः परिच्छेदः ६५१ से अभिमन्त्रित छह कलशों से स्वयं स्नान करावे । इस प्रकार एक सौ बार आवृत्ति कर मूल मन्त्र सहित परमन्त्र से स्नान करावे ॥ २३९-२४३ ॥ जितन्त इति वै सर्वांस्ततश्चास्त्रोदकेन च ॥ २४४ ॥ तदनन्तर देवाधिदेव का शिर आभरणादि रहित कर 'जितन्ते' इस सभी मन्त्रों से तत्पश्चात् अस्त्रोदक से स्नान करावे ॥ २४४ ॥ प्रासादसंशोधनकथनम् प्रासादं शोधयित्वा च स्नानवर्जं समाचरेत् । पूर्वोक्तमासनाद्यं यद् यागदानावसानिकम् ॥ २४५ ॥ सदक्षिणं विशेषेण गुरौ मूर्तिधरेषु च । देवं प्रणम्य विज्ञाप्य कर्मणा मनसा गिरा ॥ २४६ ॥ त्वमर्चान्तर्गतो देव मया यच्छयनादिषु । नीतोऽसि चाभिमुख्यं तु क्षन्तव्यं तन्ममाच्युत ॥ २४७ ॥ अथ प्रासादसंशोधनम्, स्नपनं विनाऽऽसनादिभिर्हविर्निवेदन्तैर्भोगैर्यथाविध्य- भ्यर्चनम्, कारिप्रदानम्, आचार्यादीनां दक्षिणादानम्, प्रणामम्, विज्ञापनम्, पुनः प्रणामादिकम्, “गुरुदेवाग्निविप्रेषु पृष्ठभागं न दर्शयेत्” इत्युक्तप्रकारेण भगवदभि- मुखमेव बहिर्निष्क्रमणम्, द्वारावरणदेवानां यथाविधि बलिदानम्, आचमनम्, पुन- र्भगवन्मन्दिरप्रवेशनं चाह—ततश्चास्त्रोदकेन चेत्यारभ्य यायाद् देवगृहं तत इत्यन्तम् ॥ २४४-२४८ ॥ अब प्रासाद संशोधन कहते हैं—स्नान के बिना आसनादि से आरम्भ कर भोग, दक्षिणा पर्यन्त वस्तुओं से प्रासाद की अर्चना करे । कार्यकर्त्ताओं को दान दें। आचार्यादि को दक्षिणा देवे, फिर देवाधिदेव को प्रणाम करे । तदनन्तर कर्मणा मनसा एवं गिरा देवाधिदेव से इस प्रकार निवेदन करे—हे भगवन्! मैंने अपने अर्च्यादि कार्यों के लिये शयनादि पर आपको पधरवा कर जो आपने प्रत्यक्ष किया है, हे अच्युत! उसे क्षमा कीजिये ॥ २४५-२४७ ॥ एवं प्रणम्य विज्ञाप्य क्षान्त्वा निष्क्रम्य सम्मुखम् । आचम्य च बलिं दत्त्वा यायाद् देवगृहं ततः ॥ २४८ ॥ इस प्रकार प्रणाम करे, निवेदन करे, अपराध क्षमा करावे, फिर भगवान् की ओर पीठ न दिखा कर उनके सामने बाहर निकले । तदनन्तर द्वार के आवरण करने वाले देवताओं को बलिदान प्रदान करे एवं आचमन करे । फिर भगवान् के मन्दिर में प्रवेश करे ॥ २४८ ॥ तत्रासनादिकैर्यष्ट्वा स्नानान्तैः पूर्ववत् प्रभुम् ।