भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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पञ्चविंशः परिच्छेदः ६५५ और आवाहनादि समस्त कार्य करे । फिर प्रासाद मध्य में कुम्भ सहित बिम्ब सन्निविष्ट करे ॥ २५९-२६५ ॥ हृदाद्यन्तनिरुद्धेन मूलमन्त्रेण लाङ्गलिन्। तत्राद्यमनुसन्धानमेकं कृत्वा परान्वितम्॥ २६६ ॥ सामान्यलक्षणं पश्चात् पूर्वोक्तं वै कलात्मकम्। सम्पूज्य वाससाच्छाद्य सुधया व्यक्तां नयेत्॥ २६७ ॥ हे सङ्कर्षण! हृदादि तथा हृदान्त मन्त्र से सम्पुटित मूल मन्त्र से परान्वित अनुसंधान एवं आद्य अनुसन्धान को एक कर पूर्वोक्त ज्ञानादि लक्षण कलात्मक को भी सामान्य लक्षण बनावे । उनकी पूजा करे, वस्त्र से आच्छादित करे और सुधालेप से उसे अभिव्यक्त करे ॥ २६६-२६७ ॥ ततः पिण्डे तदूर्ध्वे तु साङ्गं कुर्याद्यथोदितम्। प्रासादं स्थापयेत् पश्चात् पूर्वोद्दिष्टेन वर्त्मना॥ २६८ ॥ समालभ्यार्चयित्वा च स्त्रगाद्यैर्मण्डयेत् ततः। पूर्ववत् पाठयेद् विप्रान् तत्प्रतिष्ठापने तु वै॥ २६९ ॥ इसके बाद पिण्ड में फिर उस के ऊपर पूर्वोक्त की भाँति साङ्ग पूजा करे, उनका आलम्भन (स्पर्श) करे, अर्चन करे, मालादि से भूषित करे, तदनन्तर उनकी प्रतिष्ठा में ब्राह्मणों से पाठ करावे ॥ २६८-२६९ ॥ संरोध्य वर्ममन्त्रं तु तत्र ध्यानधिया स्वयम्। पूर्णान्तमखिलं कृत्वा विधिनानेन वै पुनः॥ २७० ॥ आरोहेति तु वै साम पाठयेत् सामगांस्तु वै। उसमें ध्यान करते हुये कवच मन्त्र अवरुद्ध करे । फिर पूर्णाहुति करे तथा इसी विधि से सामगों से 'आरोह' इस साम मन्त्र का पाठ करावे ॥ २७०-२७१ ॥ चक्रमामलसारस्य मध्यतः सन्निवेशयेत्॥ २७१ ॥ यथाभिमतरूपं तु दिग्वक्त्रं वाऽम्बराननम्। स्वशक्तिवर्णदण्डस्थं चण्डमार्ताण्डभास्वरम्॥ २७२ ॥ चक्रमन्त्रं न्यसेत् तस्मिन् वर्णाध्वानं पुरोदितम्। गत्यागतिप्रयोगेण प्राक् प्रमेयजलक्षणम्॥ २७३ ॥ अब प्रसङ्गात् अमल शान्त शान्तोदित एवं उदित चार प्रकार के चक्रों का लक्षण विवरण कहते हैं—आराधक इसके बाद अमलसार का चक्र मध्य में सन्नि- विष्ट करे । वह चक्र अपनी इच्छानुसार वस्त्ररहित हो अथवा वस्त्रसहित हो । वह