सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 715, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ें६५६ सात्वतसंहिता अपनी शक्ति रूप वर्ण दण्ड में स्थित रहने वाला है । अत्यन्त चण्ड भास्कर के समान तेजस्वी है । उस चक्र में 'वर्णाध्वा' युक्त चक्र मन्त्र स्थापित करे । वही वर्णाध्वा गति आगति के प्रयोग से चक्र का प्रमेय जन्य लक्षण है ॥२७१-२७३॥ तान्यथावत् पुरा ज्ञात्वा द्रव्यमूर्तित्वमागतम् । कुर्यात् ततोर्ध्वसन्धानं नान्यथा तु महामते ॥ २७४ ॥ उन मन्त्रों को यथावत् द्रव्यमूर्ति रूप में जब जान लेवे, तभी प्रासाद शिखर के ऊपर चक्र का स्थापन करे, अन्यथा नहीं ॥ २७४ ॥ अमलं शान्तसंज्ञं वै तथा शान्तोदितोदितम् । एकमेव हि तन्मूर्तिं यश्चक्रं वेत्ति तत्त्वतः ॥ २७५ ॥ सोऽस्मिन् संसारचक्रे तु सर्वाश्रमनिवासिनाम् । सर्वधर्मरतानां च चक्रवर्तित्वमाप्नुयात् ॥ २७६ ॥ अमल, शान्त एवं शान्तोदित तथा उदित भेद से चक्र के चार भेद हैं । उन सभी को जो एक मूर्ति स्वरूप में देखता है, वही ठीक प्रकार से चक्र को जानता है । वह इस संसार चक्र में धर्मरत सर्वाश्रम निवासियों के मध्य में चक्रवर्तित्व प्राप्त करता है ॥ २७५-२७६ ॥ यच्छब्दब्रह्ममूर्त्यैव सिद्धमाक्षं निराश्रयम् । अन्तर्बहिस्थं सर्वेषां मोक्षदं चामलं स्मृतम् ॥ २७७ ॥ दोनों प्रकार के अनुसंधानों को एक कर सामान्य लक्षण बनावे—(१) जो शब्द-ब्रह्म मूर्ति होने से सिद्ध है, आक्ष (आश्रययुक्त) है, निराश्रय (आश्रयरहित) है, सबके भीतर और बाहर विद्यमान है, मोक्ष देने वाला है, वह 'अमल चक्र' कहा जाता है ॥ २७७ ॥ क्षीरोदार्णवतुल्यं यत् सहस्रादित्यसन्निभम् । निरङ्गं तीक्ष्णधारं वै तच्छान्ताख्यं हि योगदम् ॥ २७८ ॥ (२) जो क्षीर समुद्र के समान है और सहस्रों आदित्य के समान देदीप्यमान है, अङ्ग रहित तथा तीक्ष्ण धारा वाला है और योग देने वाला है उस चक्र का नाम 'शान्त' है ॥ २७८ ॥ यत्तु नानाङ्गभावेन स्वातन्त्र्यात् स्वयमेव हि । सर्वदिक्प्रसृतां कृत्वा स्वात्मवृत्तिं हि वर्तते ॥ २७९ ॥ ईषद्वलयवन्नाभेरराणामन्तरेखवत् । शान्तोदितं च तद्विद्धि चक्रमिच्छाप्रदं च यत् ॥ २८० ॥