सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशः परिच्छेदः ६५७ (३) जो अपनी वृत्तियों को स्वयं अपनी स्वतन्त्रता से अनेक प्रकार के अङ्ग भाव से सारे दिशाओं में फैला कर वर्तमान रहता है । जो ईषद् वलय वाले नाभि के भीतर रेखा के समान अराओं से संयुक्त है उस चक्र को 'शान्तोदित' समझना चाहिये । वह इच्छा (कामना) प्रदान करने वाला है ॥ २७९-२८० ॥ यच्छान्तमूर्त्तौ सम्बुद्धः सर्वं कृत्वाऽवतिष्ठते । प्रवृत्तं नाभिपूर्वं तु उदिताख्यं हि चक्रराट् ॥ २८१ ॥ (४) जो शान्तमूर्त्ति में जागरूक होकर सब कुछ करके स्थित रहता है, नाभि से पूर्व प्रवृत्त रहता है, वह 'उदित' नामक चक्रराट् कहा जाता है ॥ २८१ ॥ तस्मिन्नाराधितो मन्त्रस्तद्वै सम्पूजितं स्मृतम् । जप्तं सन्तर्पितं भक्त्या सर्वेषां सर्वमृच्छति ॥ २८२ ॥ उसी में मन्त्रों की आराधना की जाती है, वही पूजित कहा जाता है और उसी का भक्तिपूर्वक किया गया जप सभी को सब प्रकार की कामना प्रदान करता है ॥ २८२ ॥ एवं चाभिमतं चक्रं सर्वविघ्नक्षयङ्करम् । प्रतिष्ठाप्य समभ्यर्च्य तस्यैव समनन्तरम् ॥ २८३ ॥ त्र्यंशेन शिखरादुच्चं खगराट्परिभूषितम् । संस्कृत्य ध्वजदण्डं च शिखामन्त्रेण विन्यसेत् ॥ २८४ ॥ इस प्रकार का अभिमत चक्र समस्त विघ्नों का क्षय करता है । इस प्रकार के चक्र की प्रतिष्ठापना कर वैष्णव अर्चना करे । पुनः उसी के साथ शिखर के उच्च भाग में तीसरे अंश में खगराट् (गरुड़) को सुशोभित करे । तदनन्तर ध्वजदण्ड का संस्कार करे और शिखा मन्त्र से न्यास करे ॥ २८३-२८४ ॥ ततो विविधवर्णं च किङ्किणीगणभूषितम् । ध्वजाग्राच्छिखरार्धं च यावद् दीर्घमकृत्रिमम् ॥ २८५ ॥ दैर्घ्याद् द्वादशमांशेन द्विनवांशेन वा ततम् । कृत्वाऽस्रसन्निधिं तस्मिन् लाञ्छनाख्ये पुरा पटे ॥ २८६ ॥ निवेश्य ध्वजदण्डाग्रे गन्धाद्यैरर्चयेत् ततः । इसके बाद विविध वर्ण की किंकिणियों से युक्त ध्वजा के अग्रभाग से शिरारार्ध पर्यन्त चौड़ा, अकृत्रिम चौड़ाई का बारह गुना, अथवा अट्ठारह गुना लम्बा, उस लाञ्छन पट को ध्वजदण्ड के अग्रभाग में सन्निविष्ट कर गन्धादि से अर्चित करे ॥ २८५-२८७ ॥