सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५८ सात्वतसंहिता स्वयंकृतानां बिम्बानां मयेदं सम्प्रकाशितम् ॥ २८७ ॥ प्रतिष्ठापनमब्जाक्ष स्वतन्त्रेष्वयनेषु च। साङ्कर्येण विना त्वेवं कृतं भवति सिद्धिदम् ॥ २८८ ॥ अन्यथाऽसिद्धिदं विद्धि नृणां व्यामिश्रयाजिनाम्। स्वयं कल्पितबिम्बानामेवं प्रतिष्ठादिकमुक्तम्। स्वयं व्यक्तादिष्वप्येवमेव मन्त्र- तन्त्रबिम्बाद्यसाङ्कर्येणार्चनादिकं सिद्धिदम्, अन्यथा दोषावहमित्याह—स्वयंकृतानामिति द्वाभ्याम् ॥ २८७-२८९ ॥ यह क्रिया अपने द्वारा संस्थापित बिम्ब में प्रकाशित की गई है। स्वयं व्यक्त बिम्ब में इसी प्रकार मन्त्र, तन्त्र एवं बिम्बादि का साङ्कर्य रहित अर्चनादि सिद्धिप्रद होता है अन्यथा साङ्कर्य से किया गया अर्चनादि दोषावह होता है ॥ २८७-२८९॥ एकस्मिन्नासने स्थाने चतुस्त्रिद्व्यादिमूर्तिना ॥ २८९ ॥ व्यक्तीभूतं यथा लोके लोकानुग्रहकाम्यया। स्वयं नानास्वरूपेण स्वर्गादौ स्थापनं तथा ॥ २९० ॥ न कार्यं मनुजैर्वर्णधर्मज्ञैर्नैकभावनैः। तथा वै समबुद्धिस्थैः कृपया सम्प्रवर्तकैः ॥ २९१ ॥ क्रियाभेदरतैः शुद्धैर्नानाविबुधयाजकैः। प्रणवैकप्रलापस्थैः शान्तचित्तैरमत्सरैः ॥ २९२ ॥ मन्त्रमुद्राक्रमध्यानसम्भूतिलयलक्षकैः । तथा तत्संकरोत्पन्नदोषाणां ध्वंसनक्षमैः ॥ २९३ ॥ प्रस्थापितस्तु वै सम्यग् ज्ञानमूर्तिर्जगद्गुरुः। लोके एकस्मिन् स्थाने एकस्मिन्नेवासने चतुस्त्रिद्व्यादिरूपेण यथा भगवान् स्वयं व्यक्तीभूतस्तथा सामान्यैर्मनुजैः स्था(प)नं (न)कार्यम्, अपि तु सम- बुद्धिस्थत्वादिविशिष्टैर्विशेषाधिकारिभिस्तथा स्थापनं कार्यमित्याह—एकस्मिन्निति पञ्चभिः ॥ २८९-२९४ ॥ लोक में जिस प्रकार एक ही आसन पर चार, तीन तथा दो रूपों से भगवान् व्यक्त होते हैं। सामान्य मनुष्य वैसा एक ही आसन पर न करे। अपितु समदर्शी विशिष्ट-विशिष्ट अधिकारी क्रिया-भेदरत, शुद्ध, अनेक देवता का यज्ञ कराने वाले, केवल प्रणव का जप करने वाले, शान्त चित्त, मत्सरता रहित, मन्त्र मुद्रा क्रम स्थान सम्भूति एवं लय के लक्षणों को जानने वाले एवं साङ्कर्य से उत्पन्न दोषों के ध्वसन में सक्षम ऐसे महात्मा ही इस प्रकार के ज्ञानमूर्त्ति जगद्गुरु की स्थापना करे ॥ २९०-२९४ ॥ भिन्नमन्त्रक्रियारूपं न कुर्यात् तदपेक्षया ॥ २९४ ॥