भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 718, कुल 837 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 718

पञ्चविंशः परिच्छेदः ६५९ साधारमालयं पीठं भवाख्यं विभवात्मनाम् । देवानां मर्त्यधर्मस्थैः प्रतिष्ठायज्ञकर्मणि ॥ २९५ ॥ संसारदेवतानां च स्थापितानां तु वै पुरा । कृत्वा तु भगवद्विम्बमालये वा तदासने ॥ २९६ ॥ निवेशयति यो मोहाद् बिम्बेन सह तस्य वै । जायते च भयं घोरमिहामुष्मिकदोषदम् ॥ २९७ ॥ नाप्नोत्याराधकानां तु सकाशादर्चनं परम् । यथा बिम्बं तथा कर्ता नाप्नुयादुत्तमं फलम् ॥ २९८ ॥ विभवादेवानां प्रतिष्ठायज्ञे आधारालयपीठाद्यूक्तक्रमं विना केवलमर्त्यधर्मस्थैः सह स्वेच्छया विभिन्नमन्त्रतन्त्रलक्षणानि न कुर्यादिति, पूर्वं प्रतिष्ठितानां देवानामालये तदासने वा तेन बिम्बेन सह पुनस्तत्समभगवद्विम्बान्तरस्थापनं दोषावहमिति चाह— भिन्नमन्त्रक्रियारूपमित्यारभ्य नाप्नुयादुत्तमं फलमित्यन्तम् ॥ २९४-२९८ ॥ उनकी देखा-देखी अन्य लोग भिन्न मन्त्र एवं क्रिया रूप से प्रतिष्ठापना न करें । विभव देवताओं के प्रतिष्ठा यज्ञ में आधार, आलय एवं पीठ में उक्त क्रम को छोड़कर केवल मनुष्यों के साथ स्वेच्छापूर्वक विभिन्न मन्त्र-तन्त्रों वाला लक्षण न करें । पूर्व प्रतिष्ठित देवताओं के आलय में उनके आसन पर उस बिम्ब के साथ पुनः उनके समान अन्य भगवद्विम्ब का स्थापन दोषावह होता है । जो मोहवश पूर्व में स्थापित देवालय में उनके आसन पर अन्य बिम्बों का मोहवश स्थापन करता है उसे इस लोक में तथा परलोक में दोष उत्पन्न करने वाला महामोह होता है । ऐसा प्रतिष्ठित बिम्ब आराधकों के द्वारा किया गया अर्चन नहीं प्राप्त करता और जिस प्रकार बिम्ब निष्फल होता है उसी प्रकार कर्त्ता को भी कोई फल नहीं होता ॥ २९५-२९८ ॥ अर्चायामधिके पीठे ह्यपेक्षालक्षणोज्झिते । सकृद् विभवदेवानां स्थापनं न विरोधकृत् ॥ २९९ ॥ नान्यकाले न चान्यस्य नान्यमूर्तिनिवेशनम् । विहितं भगवत्पीठे निविष्टव्यत्ययं विना ॥ ३०० ॥ एकस्मिन् पीठे विभवदेवानां सकृत् स्थापनमविरुद्धम्, पुनरन्यकाले स्थापनम् अन्यस्य स्थापनम्, अन्यमूर्तिस्थापनं च न विहितमित्याह—अर्चायामिति द्वाभ्याम् । व्यत्ययं विनेत्यनेन पूर्वं स्थापनकाले स्थानाद्यव्यत्यये पुनर्यथाक्रमस्थापनं विहितमित्युक्तं भवति ॥ २९९-३०० ॥ यदि अर्चा में अपेक्षित लक्षण से पीठ का मान अधिक हो, तो उस एक पीठ पर उसी काल में एक विभव देव के साथ अन्य विभव देव का स्थापन